‘तो ये थीं खबरें आज तक, इन्तजार कीजिए कल तक.' एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था. 4 दिसंबर, 1948 को जन्में एसपी, पत्रकारिता में निर्भिकता और अपने उम्दा संपर्कों के लिए जाने जाते थे. वह अपने दौर में सबसे युवा उम्र में संपादक बनने वाले पत्रकारों में शुमार थे. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े जिन लोगों ने उन्हें नहीं देखा, उनके लिए भी वह एक खासा जाना-पहचाना नाम हैं.
उन पर छपी एक किताब दि रियल मीडियामैन में उनके साथ काम कर चुके एक पत्रकार-संपादक ने लिखा था, सुरेंद्र प्रताप सिंह और एम जे अकबर की जोड़ी ने पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार नौजवानों की साख बढ़ाई. रविवार और संडे ने ही खोजी पत्रकारिता की नींव डाली. पहली बार हिंदी में लिखने वाले पत्रकारों की रिपोर्ट्स अंग्रेजी में न केवल छपीं, बल्कि उन पर हंगामा भी हुआ. पहली बार एक घटना को पांच-पांच पत्रकारों ने एक साथ कवर किया. यह वह दौर था, जब घटना घट जाती थी, दैनिक अख़बार उसे छाप देते थे, पर लोग रविवार और संडे का इंतज़ार करते थे. हवा में तैरती घटनाओं को सूंघना और उन्हें बड़ी रिपोर्ट में तब्दील कर देना एसपी का अद्भुत गुण था.
दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम ‘आज तक’ के संपादक रहते हुए एसपी सिंह सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर बाद में किसी भी संपादक के लिए टीवी के परदे पर दिखाना मुश्किल था. इसकी अपनी वजहें हो सकती हैं. तकनीक, बदलता समाज, उग्र होती सियासत और पत्रकारिता पर पूंजी का प्रभाव. पर एसपी केवल ‘आज तक’ के संपादक भर नहीं थे. अपने दमखम के लिए याद की जानेवाली रविवार पत्रिका के पीछे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह की ही दृष्टि थी.
दिनमान की विचार पत्रकारिता को रविवार ने खोजी पत्रकारिता और स्पॉट रिपोर्टिंग से नया विस्तार दिया. राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अंदाज़ा लगाना और सरल, समझ में आनेवाली भाषा में साफगोई से उसका खुलासा करके सामने रख देना उनकी पत्रकारिता का स्टाइल था.
एक पूरे दौर में पाखंड और आडम्बर से आगे की पत्रकारिता एसपी के नेतृत्व में ही साकार हो रही थी. शायद इसी वजह से उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और कहा जा सकता है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के पहले सुपरस्टार थे. एसपी सिंह अपने लेखन से साम्प्रदायिक, पोंगापंथी, जातिवादी और अभिजन शक्तियों को लगातार असहज करते रहे. बारीक राजनीतिक समझ और आगे की सोच रखनेवाले इस खांटी पत्रकार का लेखन आज भी सामयिक है. 'पत्रकारिता का महानायक: सुरेंद्र प्रताप सिंह' उनकी रचनाओं का पहला संचयन है, जिसे आर अनुराधा ने संपादित किया है. आज उनकी जयंती पर इसी पुस्तक से एक अंशः
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पत्रकारिता ने जातीयता बढ़ाई है, कम नहीं की है
पत्रकारिता के शोधार्थी और अब दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉक्टर श्योराज सिंह बेचैन ने रुहेलखंड विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. करने के दौरान एक प्रश्नावली कई पत्रकारों को भेजी थी जिनमें सुरेंद्र प्रताप सिंह भी थे. प्रश्न इस तरह थे-
स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता का स्वर जितना अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध है, उतना वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा के प्रति क्यों नहीं?
हिंदी पत्रकारिता पर हिंदू पत्रकारिता का आरोप कहां तक सही है?
क्या मंदिर-मंडल आंदोलन के मुद्दे पर पत्रकारिता तटस्थ और निष्पक्ष रह पाई?
अखबारों की कार्यशालाओं और प्रशिक्षण संस्थानों में दलितों की लोकतांत्रिक भागीदारी क्यों नहीं है?
इस वर्ग में क्या प्रतिभा का संकट है? संपादक के नाते आपने दलित विषयक प्रश्नों को किस रूप में लिया?
दलित साहित्य की कोई भी विधा गैर दलित अखबारों में क्यों नहीं छप रही है, इत्यादि.
जो लोग पत्रकारिता के शीर्ष पर बैठे थे उस जाति, वर्ग से आए थे जिसे पिछड़ी और दलित जातियों का समान अस्तित्व स्वीकार नहीं था. आर्यसमाज व हिंदू संगठनों ने थोड़े-बहुत उदारवादी आंदोलन चलाए, उनके पीछे उनका विचार यह नहीं था कि जात-पांत संबंधी स्वयं में बुराइयां हैं और उन्हें दूर किया जाए बल्कि उनकी मुख्य चिंता यह थी कि दलित जातियां उनके भेदभावपूर्ण रवैए से तंग आकर कहीं ईसाई या मुसलमान न बन जाएं. यही कारण था कि सुधारवादी आंदोलन जल्दी ही विफल हो गया.
पत्रकारिता में दलितों की भागीदारी क्यों नहीं?
यह तथ्य आंकड़ों से स्पष्ट है कि स्थापित पत्रों, पत्रकारिता संस्थानों व तमाम व्यावसायिक पत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों यानी संपादकों या सहसंपादकों में कोई दलित जाति से हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है. अपने निजी पत्रों के अलावा प्रमुख पत्रों व हिंदी साहित्य में जब पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या ही नगण्य है तो दलितों की सहभागिता की तो शुरुआत भी नहीं. यथास्थिति के समर्थक कहेंगे कि क्योंकि दलितों में शिक्षा ही नहीं है, वे पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए ये स्थिति है. सवाल उठता है कि उन्हें पत्रकार बनाने के क्या प्रयास किए गए? क्यों नहीं किए गए? मैं इस आरोप का सौ फीसदी समर्थन करता हूं कि हिंदी साहित्य व पत्रकारिता को जान-बूझकर सवर्ण पत्रकारिता व सवर्ण साहित्य रखा गया है और आज भी रखा जा रहा है.
मंडल विरोधी आंदोलन की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारिता बिल्कुल निष्पक्ष तटस्थ और वस्तुपरक नहीं रही. इसलिए कि समाचार तंत्र पर सवर्ण जातियों का पूरी तरह कब्जा कायम है. बहुत सारे अखबारों ने भड़काऊ भूमिका निभाई. सवर्ण छात्र-छात्राओं की उत्तेजना को जलने-मरने को, आत्मबलिदान, आत्मयज्ञ, आत्मशहादत, देश के लिए कुर्बानी देने की बात कही गई, जो पक्षपातपूर्ण और निंदनीय है.
प्रशिक्षण संस्थानों में उनकी नगण्य संख्या व प्रतिभा के संकट के बारे में मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा. पिछले सत्र में मैं भारतीय जन संचार संस्थान के साक्षात्कार मंडल में था. मुझसे पहले ही कहा गया कि चूंकि एस.सी., एस.टी के छात्रों के आने से हमारा स्तर गिरता है, परंतु हमारे यहां रिजर्वेशन है इसलिए इन्हें लेना ही पड़ता है. साक्षात्कार में आए छात्रों में मैंने ऐसे छात्र पाए जो योग्य तो थे ही, अपितु बिना आरक्षण के भी दाखिला पाने के लायक थे. मैंने ऐसी प्रतिभाओं के पक्ष में अनुशंसा की. यह मैं नहीं जानता कि उन्हें दाखिला मिला या नहीं, यह मेरा निजी अनुभव है.
हिंदी पत्रकारिता की दलितों से संबंधित भूमिका की जांच कौन करेगा और क्यों करेगा? ऊपर के स्तर पर पत्रकारिता में जब दलित विरोधी जातियों के लोग बैठे हैं तो वे क्या अपनी ही जांच करेंगे? मेरा मानना है कि वे नहीं करेंगे बल्कि यथास्थिति को ही न्यायसंगत ठहराएंगे. यही वे कर रहे हैं.
महिलाओं से संबंधित बलात्कार जैसे अपराधों की रिपोर्टिंग हो या आदिवासी दलितों पर ज्यादतियों के बारे में, मनोरंजन करने का कारण पत्रकारों के मन का ओछापन है. यह दलित स्त्री ही नहीं, स्त्री मात्र के प्रति ओछापन है और यह पत्रकारिता की विफलता या कमजोरी है. जिनके दिलों में इन तबकों के प्रति सहानुभूति नहीं है, वही शीर्ष पर बैठे हैं तो यह कम नहीं हो सकता.
पत्र-पत्रिकाओं में दलित साहित्य सामग्री कविता, कहानी या लेख आदि प्रकाशित न होने के कारणों का जवाब भी वही है, जो पहले प्रश्न का है. हिंदी पत्रकारिता जातीयता या सांप्रदायिकता कम कर रही है या बढ़ा रही है, इस प्रश्न पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि पिछड़ी या दलित जातियां अपने अधिकारों के लिए प्रयास करती हैं तो तब सवर्ण पत्रकारिता कहती है कि जातीयता बढ़ रही है, ऐसा खुला प्रचार करती है. उसे दो यादवों का मुख्यमंत्री बनना लगता है कि सारे यादव मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन बारह ब्राह्मण मुख्यमंत्री हों तो कुछ नहीं लगता.
नरसिंह राव व राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द रहने वाले तमाम सलाहकार वरिष्ठ आफिसर ब्राह्मण हैं, पर वह नहीं दिखते. किंतु पिछड़ों और दलितों की योग्यता के बावजूद भी अवसर नहीं देंगे. पत्रकारिता ने जातीयता बढ़ाई है, कम नहीं की है. जब उनके स्वार्थों पर आ बनती है तो उन्हें जातीयता दिखाई पड़ने लगती है. यथार्थ में वही पत्रकारिता चलती है जो बिकती है और वही चलेगी जो बिकेगी. सवर्ण पत्रकारिता बलात्कार और दूसरी दलित विषयक खबरें इसलिए नहीं छापते कि उन्हें इनके प्रति मानवीय सहानुभूति है बल्कि बलात्कार बिकता है, हिंसा बिकती है, इसलिए वह छपती है. ये व्यावसायिक कारण हैं. मराठी के दलित साहित्य का हिंदी, अंग्रेजी में इसलिए अनुवाद नहीं हुआ कि उन्हें इज्जत देनी है, इसलिए कि वह भी अब बिकने लगा है.
(डॉ. श्योराज सिंह बेचैन की किताब ‘हिंदी की दलित पत्रकारिता पर पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव’ से साभार.)
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किताब: पत्रकारिता का महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह
संकलन और संपादन: आर. अनुराधा
पृष्ठ संख्या: 460
विधा: लेख संकलन
मूल्य: 250/- पेपरबैक