Sahitya AajTak 2022: साहित्य आजतक के मंच पर राजनेता, साहित्यकार और समाजसेवी डॉ. महुआ मांझी ने कहा कि विकास का पश्चिमी मॉडल प्रकृति के लिए खतरनाक है. उन्होंने कहा कि हमें प्रकृति को जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए, न कि लोभ और लालच के हिसाब से. आज कार्यक्रम में दूसरे दिन 'जंगल, जमीन और किरदार' सेशन की शुरुआत लोक गीत पधारो म्हारे देश से हुई.
साहित्य के जरिए लड़ रही आदिवासियों की लड़ाई
झारखंड के आदिवासी समुदाय पर बात करते हुए राज्यसभा सांसद महुआ मांझी ने कहा कि जहां-जहां यूरेनियम की खदानें हैं, वहां रेडिएशन शुरू हो जाता है. यूरेनियम की खदानें सभी जगह आदिवासी इलाकों में ही हैं. चाहे वो भारत हो, अमेरिका हो या कोई और देश. झारखंड का आदिवासी समुदाय भी इससे पीड़ित है. इसलिए मैंने आदिवासियों की लड़ाई साहित्य के माध्यम से शुरू की, जो अब राजनीतिक भी हो गई है.
यूरेनियम एक खतरनाक सांप
सांसद और साहित्यकार महुआ मांझी ने कहा कि यूरेनियम एक ऐसा खतरनाक पदार्थ है, जो एक बार जमीन से बाहर आने के बाद लाखों साल तक नुकसान करता रहता है. उन्होंने कहा कि इसीलिए आदिवासी कहते हैं कि यह एक ऐसा सांप है, जिसे जमीन के अंदर पड़े रहने दो. अगर बाहर निकालोगे तो यह जहरीला सांप डस लेगा. महुआ मांझी ने कहा कि आज झारखंड की खदानों से निकला यूरेनियम पूरे देश में सप्लाई किया जा रहा है.
आदिवासी हमसे ज्यादा शिक्षित
देश में आदिवासियों के वर्तमान हालात और प्रकृति से उनके जुड़ाव पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए महुआ मांझी ने कहा कि
"हम सोचते हैं कि हम सबसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं, जबकि मुझे लगता है कि आदिवासी ही सबसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं, क्योंकि उनके पूर्वजों ने जो मौखिक रूप से ज्ञान दिया है, वो हमारे पास नहीं है.
महुआ मांझी ने कहा कि आदिवासियों के पास प्रैक्टिकल ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा है. वो जानते हैं कि किस तरह प्रकृति के बीच और प्रकृति के साथ मिलकर रहना है . उनके पूर्वजों ने लोकगीत और लोककला के माध्यम से कई तरह के भौतिक ज्ञान का हस्तांतरण किया है." उन्होंने कहा कि हमें प्रकृति का इस्तेमाल करना है, उस पर अति नहीं.
समुद्र मंथन की कहानी से प्रेरित है उपन्यास 'टमरंग गोड़ा नीलकंठ'
महुआ मांझी ने अपने उपन्यास 'टमरंग गोड़ा नीलकंठ' पर बात करते हुए कहा कि इसके नाम पर हमेशा सवाल होता रहा है. इस उपन्यास का नाम समुद्र मंथन की कहानी से प्रेरित है. जिस तरह से समुद्र मंथन के बाद अमृत असुरों ने पिया और विष को नीलकंठ शिव ने पिया, उसी तरह आज हम सभी असुर हैं.
महुआ मांझी ने कहा कि इस प्रकृति से प्राप्त अमृत तो हम पी ले रहे हैं, जबकि विष को आदिवासियों के लिए छोड़ दे रहे हैं. हम अपनी सुविधाएं और ऐशो आराम के लिए हजारों गांवों को उजाड़ देते हैं. इस तबाही का हम अंदाजा भी नहीं लगाते हैं. हमें हमेशा अमृत का ही नहीं, बल्कि हमें विष का भी पान करना चाहिए.