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लोगों को नहीं पता आर्मी जवान का बच्चा घर पर क्या सोचता है...? शहीद की बेटियों ने सुनाई दास्तां

Sahitya Aaj Tak 2022: दिल्ली में 18 नवंबर से शुरू हुए सुरों और अल्फाजों का महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2022' का आज तीसरा और अंतिम दिन है. साहित्य के सबसे बड़े महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2022' के तीसरे दिन सैनिकों के परिवार सह लेखकों ने भाग लिया. इस दौरान इन्होंने सेना के परिवार होने का दास्तां साझा किया.

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कार्यक्रम में उपस्थित नेहा द्विवेदी और दीक्षा द्विवेदी.
कार्यक्रम में उपस्थित नेहा द्विवेदी और दीक्षा द्विवेदी.

Sahitya AajTak 2022: साहित्य आजतक के मंच पर तीसरे और आखिरी दिन 'दास्तां ए फौज' सेशन में सैनिक परिवार से ताल्लुक रखने वाली लेखिकाओं ने जिंदगी की दास्तां बयां की. इस दौरान आर्मी ऑफिसर की पत्नी और लेखिका स्वप्निल और आर्मी अफसर की बेटी दीक्षा द्विवेदी और नेहा द्विवेदी ने शामिल हुईं. 

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इस दौरान स्वप्निल पांडे ने कहा कि लोगों को सोल्जर के जीवन के बारे में तो पता होता है, लेकिन उन्हें हमारे बारे में या कोई और जवान के परिवार के जीवन के बारे में नहीं पता होता है. सोल्जर्स के लिए स्पेशल वार मेमोरियल है, लेकिन उनके पीछे उनके परिवार पर क्या बीतता है, इसका अंदाजा नहीं लगा सकते.

कार्यक्रम में उपस्थित स्वप्निल पांडे, नेहा द्विवेदी और दीक्षा द्विवेदी.

देश की सुरक्षा के लिए शहादत जारी रहेगी

लेखिका और आर्मी ऑफिसर की पत्नी स्वप्निल पांडे ने कहा कि देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए परिवार बिखरते रहेंगे, लेकिन यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है.

अपनी किताब 'द फोर्स विहांइड द फोर्सेज' पर बात करते हुए स्वप्निल ने कहा कि यह किताब एक दुख भरी कहानी है. इसमें प्यारे-प्यारे पल तो हैं, लेकिन इसकी हैप्पी एडिंग नहीं है. अपनी किताब और शहीद परिवार पर बात करते हुए स्वप्निल की आंखें नम हो गईं.

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जवानों के पीछे होता है उनके परिवार का प्यार

जवानों की जिंदगी पर बात करते हुए स्वप्निल ने कहा कि भारतीय सेना दुनिया की सबसे बेहतरीन सेना है. इनका मोरल सबसे हाई होता है. ये जवान माइनस 42 डिग्री तापमान में भी डटे रहते हैं, क्योंकि इनके साथ इनके बच्चों की यादें होती हैं,  प्रेमिका की याद या पत्नी का प्यार होता है. उन्होंने कहा कि मैं अपने पति आर्मी जवान की विहाइंड द फोर्स हूं और इसके लिए मुझे गर्व है.

दीक्षा और नेहा ने भी शेयर की दास्तां

 

कार्यक्रम में उपस्थित स्वप्निल पांडे, नेहा द्विवेदी और दीक्षा द्विवेदी.

शहीद पिता की बेटी और लेखिका दीक्षा और नेहा द्विवेदी ने भी अपनी दास्तां सुनाई. उन्होंने कहा कि मेरे पिता की शहादत की बहुत बातें दब गई थीं. मेरे परिवार को कारगिल विजय दिवस में नहीं बुलाया जाता था. इसी आक्रोश में मैंने किताब लिखी. उन्होंने कहा कि इस किताब के बाद उन्हें 2016 में कारगिल विजय दिवस सामारोह में बुलाया गया.

उन्होंने कहा कि एक पिता जो पूरे देश की रक्षा का भार उठाता है, लेकिन लोगों को यह पता नहीं होता कि उस जवान का बच्चा रात को घर पर क्या सोचता है. नेहा ने कहा कि जब भी कोई शहादत की खबर आती थी तो डर लगता था कि कहीं उसमें एक नाम पिताजी का न हो. और एक दिन वो दिन भी आ गया.

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अपनी किताब 'द लोन वुल्फ अनटोल्ड स्टोरी' पर बात करते हुए नेहा ने कहा कि किताबें तो एक माध्यम हैं, लेकिन हम सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपनी बात लिखते रहते हैं.


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