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'नाज है मुझको मेरे होने पर, आपका नाम मिला है मुझको' राहत इंदौरी के नाम बेटे की गजल

साहित्य आजतक 2022 में रविवार की शाम एक ख़ास मुशायरे के नाम रही. बीते सालों में, अपनी गजलों से साहित्य के इस महाकुंभ के मंच को रौशन करने वाले राहत साहब की याद में ये मुशायरा आयोजित किया गया. इसमें राहत इंदौरी के बेटे सतलज राहत ने पहली बार एक बड़े मंच से दुनिया के सामने अपने शेर पढ़े और एक ख़ास गजल से अपने पिता को याद किया.

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शीन काफ निजाम, नवाज देवबंदी
शीन काफ निजाम, नवाज देवबंदी

दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में साहित्य का महाकुंभ, साहित्य आजतक 2022 चल रहा है. साहित्य और संगीत के इस जश्न में कई बड़े नामों ने शिरकत की और जनता ने उन्हें पूरे सम्मान के साथ सुना. लेकिन इस बार साहित्य के इस मंच की शोभा बढ़ाने वालों की लिस्ट में, जिस एक नाम की गैरमौजूदगी लोगों को खली, वो हैं स्वर्गीय राहत इंदौरी.

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भारत के मशहूर शायरों में शुमार इंदौरी साहब ने कई बार साहित्य आजतक के मंच को अपनी मौजूदगी से गुलजार किया और अपने सुनने वालों को गजलों और नज्मों के जादू में सराबोर किया. मगर 11 अगस्त 2020 को कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया. दो साल के ब्रेक के बाद लौटे साहित्य आजतक 2022 में राहत साहब की याद में रविवार की शाम एक ख़ास मुशायरा हुआ जिसमें वसीम बरेलवी, नवाज देवबंदी, राजेश रेड्डी और शीन काफ निजाम जैसे बड़े नामों ने शिरकत की. मगर इस इवेंट की हाईलाईट एक नया शायर रहा. 

राहत इंदौरी के बेटे का डेब्यू 
स्वर्गीय राहत साहब के बेटे सतलज इंदौरी ने पहली बार किसी बड़े मंच से बतौर शायर अपना डेब्यू किया और उनकी एक गजल ने जनता को इमोशनल भी किया और वो किया जिसे अदब की दुनिया में 'मुशायरा लूटना' कहते हैं. सतलज ने बताया कि वो अपने पिता के साथ तमाम मंचों पर जाते रहे, जिनमें साहित्य आजतक के पिछले एडिशन भी शामिल हैं.

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राहत साहब के निधन के बाद ही, 38 साल की उम्र में सतलज ने अपने शेर कहने शुरू किए. साहित्य आजतक 2022 के मुशायरे में सतलज ने अपने पिता को याद करते हुए कुछ शेर पढ़े, जिनपर जनता ने उनका खूब हौसला बढ़ाया. शेर कुछ इस तरह हैं:

दिल ए नाकाम मिला है मुझको 
इश्क का दाम मिला है मुझको
 
नाज है मुझको मेरे होने पर 
आपका नाम मिला है मुझको  

सतलज ने कहा की उन्हें पहली बार इतना बड़ा मंच मिलने की खुशी भी है, मगर राहत साहब की कमी से एक खालीपन भी महसूस हो रहा है. मुशायरे में सतलज के पढ़े शेरों पर भी जनता ने भरपूर तालियां बजाकर हौंसला बढ़ाया. उनके शेर कुछ इस तरह हैं:

दिल को सबके लिए पत्थर बना के रखा है 
बस मेरी याद को जेवर बना के रखा है
जिसको तुम लड़की समझते हो, जादूगरनी है 
न जाने कितनों को कबूतर बना के रखा है 

जिद्दी लहरों को फटकार लगाई है, ये कश्ती भी उसने पार लगाई है 
इस लड़की के साथ ही जीवन गुजरेगा, जिसकी कार के पीछे कार लगाई है 

नफरत तो बन्दूक की गोली होती है 
और मोहब्बत स्लोली स्लोली होती है
दीवाना हूं और यहां दीवाने का 
महल नहीं होता है, खोली होती है

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चाहे किस्मत में दाल रोटी हो 
मेरे अल्लाह हलाल रोटी हो 
धर्म का जिक्र बाद में करना 
सबसे पहला सवाल रोटी हो 

अच्छा खासा दाम लिया जा सकता है 
अब जख्मों से काम लिया जा सकता है 
कोई ठिकाना चाहे जितना अच्छा हो 
कितने दिन आराम लिया जा सकता है 
तुझसा कोई मिला नहीं की सोचूं मैं 
इसके साथ में जाम लिया जा सकता है 

वसीम बरेलवी और नवाज देवबंदी ने पढ़ी नई नज्में 
भारत के सबसे सीनियर शायरों में से एक वसीम बरेलवी ने अपनी एक नई नज्म 'अमानत' पहली बार साहित्य आजतक 2022 में पढ़ी. देहात से, अलग-अलग सिलसिलों में शहर आए लोगों की यादों से जुडी इस नज्म को लोगों ने बहुत सब्र के साथ सुना और वसीम बरेलवी साहब को दाद दी. उन्होंने मुशायरे में कई गजलें भी पढ़ीं और सर्दी की शाम को और रूमानी बना दिया. इस मुशायरे में वसीम बरेलवी ने जो ग़जलें पढ़ीं उनमें से कुछ ये हैं:

घुटन बढ़ने का खतरा हो तो दर खोला नहीं जाता 
जहां खामोश रहना हो वहां बोला नहीं जाता
तो फिर कैसे बचेगी साख बाजार ए मोहब्बत की?
तुझे परखा नहीं जाता, मुझे तौला नहीं जाता 
जहां बेकार की बहसों का कारोबार चलता हो 
वहां हर बात को मेयार पर तौला नहीं जाता
हवा के तेज हमलों से जिधर टकराव का डर हो 
घरों की खिडकियों को उस तरफ खोला नहीं जाता

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आंखों को मूंद लेने से खतरा न जाएगा 
वो देखना पड़ेगा जो देखा न जाएगा 
पैमाना भर चला है मोहब्बत के सब्र का 
झूठी तसल्लियों से सम्भाला न जाएगा 
जलना है कब्र पर कि जलाना है बज्म में 
ये भी किसी चिराग से पूछा न जाएगा 
लाख आसमां खरीद के जेबों में डाल लो
फिर भी जमीं का कर्ज उतारा न जाएगा 
ये कह के भिड़ गए हैं सभागार के किवाड़
बोलेगा जो खिलाफ वो ज़िंदा न जाएगा 

मुशायरा 'याद-ए-राहत' में बरेलवी साहब ने कुछ शेर भी पेश किए:

तीर अपनी तेज रफ्तारी से कब जाने गए 
मैं ही जब आया निशाने पर तो पहचाने गए  
कौन सी सूरत बदल दी जिंदगी की मौत ने 
लोग मिट्टी ही को तो मिट्टी में दफ़नाने गए
फातिहे तूफां बने तूफां गुजर जाने के बाद 
वो जो एक टूटी हुई कश्ती से पहचाने गए 

जरूर आप दिए तो जलाना जानते हैं 
पर आंधियों से भी इनको बचाना जानते हैं?
हवाएं चाहे जहां तक इन्हें उड़ा ले जाएं 
परिंदे लौट के शाखों पे आना जानते हैं
मैं ऐसे लोगों से बचता हूं, बच नहीं पाता
जो मेरे नाम से मुझको बुलाना जानते हैं 

जो ख़्वाब देखना जानें न ख्वान देखने दें 
हम ऐसी सोचों की नींदें उड़ाना जानते हैं 
किसी की जीत से निस्बत न हार से मतलब
ये लोग वो हैं जो शर्तें लगाना जानते हैं 
जनाब आज के बच्चों के पास वक़्त कहां
बुजुर्ग अब भी कहानी सुनाना जानते हैं 

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नवाज देवबंदी ने भी अपनी एक नई नज्म 'मोहब्बत' पहली बार इस मंच से पढ़ी. उनकी गजलों की एनर्जी और अंदाज-ए-बयां पर जनता का रिस्पॉन्स भी उसी एनर्जी के साथ आया. उनके पढ़े कुछ शेर इस तरह हैं:

कहानी भी हकीकत हो गयी क्या, मेरे ऊपर इनायत हो गई क्या 
शिकायत पर शिकायत कर रहे हो, तुम्हें मुझसे मुहब्बत हो गयी क्या 

पसंद आए अगर दिल खरीदने वाला 
तो दिल के सौदे को महंगा नहीं किया जाता 
ये अस्पताल नहीं कूचा ए मोहब्बत है 
यहाँ मरीज को अच्छा नहीं किया जाता 

चश्म ए बेख्वाब कोई ख़्वाब दिखाने से रही 
सुबह होने को है अब नींद तो आने से रही 
आंख ही बह गई खुद आँख से आंसू बनकर 
जिंदगी इससे ज्यादा तो रुलाने से रही 
हम समझते हैं मगर भीगने आ जाते हैं 
ऐसी बारिश में तो वो बाल सुखाने से रही 

राजेश रेड्डी के सुर से सजी शाम 

डॉक्टर राजेश रेड्डी ने तरन्नुम में यानी सुर के साथ अपनी गजल 'अब क्या बताएं टूटे हैं इतने कहां से हम' गाकर श्रोताओं का दिल जीता. उनके शेर और गजल पेश हैं:

किसी दिन जिंदगानी में करिश्मा क्यों नहीं होता 
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ, जिन्दा क्यों नहीं होता 

शाम को जिस वक़्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं 
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं 

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यूं देखिए तो आंधी में बस एक शजर गया 
लेकिन न जाने कितने परिंदों का घर गया 

अब क्या बताएं टूटे हैं कितने कहां से हम
खुद को समेटते हैं, यहां से वहां से हम 
क्या जाने किस जहां में मिलेगा हमें सुकूं
नाराज हैं जमीं से, खफा आसमां से हम 
अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास
लेने लगे हैं कौम यकीं का गुमां से हम 
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं 
गायब हुए हैं जबसे तेरी दास्तां से हम 
ग़म बिक रहे थे मेले में खुशियों के नाम पर 
मायूस हो के लौटे हैं हर इक दुकां से हम 

शीन काफ निजाम ने साहित्य आजतक 2022 के मुशायरे में अपनी शुरुआत नज्मों से की और छोटी छोटी नज्मों से महफ़िल को गुलजार किया:

पहुंच ही जाती है मिलने, ढूंढती 
जिसे वो चाहती है
नदी के सामने नक्शा कहां है

बहार में फूल, खिजा में पत्ते 
मौसम कोई भी हो 
पेड़ को तो कुछ न कुछ खोना ही पड़ता है 

मुशायरे में शीन काफ निजाम के पढ़े शेर और गजल देखें:

तेरी आंखें खुदा महफूज़ रक्खे
तेरी आंखों में हैरानी बहुत है 
मुबारक उनको सुल्तानी अदब की 
मुझे तो उसकी दरबानी बहुत है 

मेरे अल्फाज में असर रख दे
सीपियां हैं तो फिर गौहर रख दे 
चंद लम्हे तो कोई सुस्ता ले 
राह में एक तो शजर रख दे 
गर शजर में समर नहीं मुमकिन 
उसमें साया ही शाख भर रख दे 
मंजिलें भर दे आंख में उसकी
उसके पैरों में फिर सफ़र रख दे 
कल के अख़बार में तू झूठी ही 
एक तो अच्छी सी खबर रख दे 
तू अकेला है बंद है कमरा 
अब तो चेहरा उतार कर रख दे 

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शिखा अवधेश के इश्क भरे शेर भी खूब पसंद किए गए. उनके पढ़े शेर कुछ इस तरह हैं:

पथरीली जमीनों पे नदी बनके बहूंगी, फिर मिल के समंदर से मुहब्बत में मरूंगी 
ये मेरा सफ़र है तो रहे शर्त भी रहे मेरी, मैं अपना खुदा खुद अपनी ही मर्जी से चुनुंगी 

लड़का खालिस है, लड़कों जैसा ही, जौक है शौक है शरारत है
मेरी तस्वीर खींचकर बोला, फोन में कैद अब क़यामत है 

मैं दिल की हसरतें गिनवा रही हूं, उसे लगता है मैं बहला रही हूं 
उसे बस ख़्वाब में छूने की खातिर, चढ़ा है दिन मैं सोए जा रही हूं  

 

 

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