साहित्य आजतक के मंच पर मशहूर लेखक जूही चतुर्वेदी ने फिल्म लेखन के कई टिप्स दिए. उन्होंने अपने करियर के अनुभवों का जिक्र करते हुए फिल्म लेखन के बारे में बताया. साथ ही उन्होंने इस दौरान आने वाली परेशानियों पर भी ध्यान दिया और बताया कि एक सामान्य व्यक्ति किस तरह से फिल्म के लिए लिख सकता है.
कहानी लिखने के बारे में कभी नहीं सोचा था
जूही चतुर्वेदी ने बताया कि वो पहले लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लेख लिखती थी, लेकिन कभी लेखक बनने के बारे में सोचा नहीं था. उस वक्त सोचा था कि शादी से बचने के लिए नौकरी करना है और दिल्ली आ गई. वहां के लिए इजाजत मिल गई थी. उसके बाद एड फिल्म लिखनी शुरू कर दी और बाद में मुंबई गई. जहां मुझे एक फिल्म के डायलॉग लिखने के लिए सरकार का ऑफर मिला. उस वक्त मैं सोच रही थी कि आखिर मुझे क्यों चुना गया.
आपके पास कंटेट होना चाहिए
उन्होंने बताया, 'फिल्म कोई भी हो, बस ये ध्यान रखना होता है आपके पास कहने को कुछ होना चाहिए. इसके माध्यम से आपको विचार को दूसरों के दिमाग में उतारना होता है. ये ध्यान रखना होता है कि क्या आप भावात्मक हैं या नहीं? दरअसल भाव लेख पर काफी असर डालता है.
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आइडिया कोई अजूबा नहीं
उन्होंने बताया, 'आइडिया कोई अजूबा नहीं है. आप रोजमर्रा के जीवन से कुछ पकड़ लेते हैं, जिसे पकाया जा सकता है और वो खास होता है. यह एक इमोशन या भाव हो सकता है. इसमें गहरी बात है एक क्षमता है, जो बड़ी बात कह सकता है.' उन्होंने कहा, 'पहले एक सतह होती है, इसमें से कैरेक्टर आदि निकाले जाते हैं. कई बार आइडिया अच्छे होते हैं और लिखते हैं जब पता चलता है इसमें दम नहीं है. वहीं कई बार दिमाग में कुछ आता है और आप उसे इग्नोर कर देते हैं लेकिन वो बार बार परेशान करता है.
शुरू में खोने का डर नहीं होता
जब उनसे पूछा गया कि क्या शुरू में रिजेक्ट होने का डर होता है, तो उन्होंने कहा, 'मैंने पहले कुछ काम नहीं किया था और जो काम कर चुके होते हैं, उनके स्टेज पर बहुत कुछ होता है, लेकिन मेरे साथ शुरू में ऐसा नहीं था. शुरुआत में कोई डर नहीं था. मगर उससे पहले भी कई लोग हो चुके हैं, जिन्होंने बहुत अच्छा लिखा है. लिखना मुश्किल होता है, कई बार टाइम बीत जाता है, लेकन कुछ नहीं लिख पाते.
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दबाव में नहीं लिखा जा सकता
फिल्म लेखन को लेकर चतुर्वेदी ने कहा, 'कभी भी लिखने का दबाव नहीं डाला जा सकता है. अपने आइडिया और लेखक के बीच एक रिलेशन होता है. यह आपके मन से होता है.' अपने बारे में उन्होंने बताया कि वो कभी फिल्म लिखते हुए सिनोप्सिस नहीं लिखती हैं और एक पैटर्न पर कभी भी राइटिंग नहीं करती. उन्होंने बताया, 'कहानी को आसान रखना ही होता है. जिस तरह एक दादी-नानी एक सिंपल तरीके से कहानी बताती हैं, वैसे ही कहानियां बताई जाती है.
पीकू लिखते वक्त रोई थीं
उन्होंने बताया, 'पीकू लिखते समय भास्कर की डेथ हुई तो मैंने लिखा कि वो मर गए हैं. उसके बाद पीकू ऊपर आती है और नब्ज देखी. ये सीन लिखने के बाद मैंने लेपटॉप बंद किया और मैं बहुत रोई. उसके बाद मैं कई दिनों तक परेशान रही और उससे बाहर नहीं आ पाई'.
खुद पर असर डालना चाहिए
कहानी लिखने के बारे में उन्होंने बताया कि जब तक लेखन आपको असर ना करें, तो समझ लिजिए वो किसी को असर नहीं होगा. कोई भी लेखन से आपको हंसी या रोना आना चाहिए. लेकिन कई बार अपने लिए नहीं लिखते हैं और दूसरों के लिए लिखते हैं. आप इसे महसूस कीजिए और उसमें घुस जाइए. बता दूं कि दिमाग के दो हिस्से होते हैं, उसमें एक क्रिएटिव और एक क्रिटिक पर काम करता है.
निर्देशन चुनें
उन्होंने बताया, 'कई बार फिल्म के लिए आप सब कुछ रोक देते हैं और एक दो साल उसमें लगा देते हैं. लेखक के लिए आपको चुनना होता है कि कौन निर्देशित अच्छा कर सकेगा. इसलिए आपको डिसाइड करना होगा कौन ठीक रहेगा... इसके लिए आपको अपनी कहानी के आधार और निर्देशक की पुरानी फिल्मों के आधार पर इसका चयन करवा होगा.
कैरेक्टर का ध्यान रखें
कैरेक्टर चयन को लेकर जूही ने बताया कि लेखन में कैरेक्टर जरूरी है. कभी भी कहानी में खुद को मत बांधिए कि कैरेक्टर आपको डिलीवर नहीं कर सके. कैरेक्टर को ध्यान में रखें और उसके आधार पर काम करें. लेखक का सबसे अच्छा फ्रैंड कैरेक्टर होता है.
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