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'बाजार आबाद हो रहा है, किसान बर्बाद हो रहा है', वरिष्ठ लेखकों ने यूं बयां किया विस्थापन और किसानों का दर्द

भारत की संस्कृति और कला के रंग से सराबोर साहित्य आजतक के दूसरे दिन विस्थापन का दर्द और किसानों की मजबूरी और जिंदगी के विभिन्न पहलुओं से लेखकों ने रूबरू कराया. कार्यक्रम में अलका सरावगी, हृषिकेश सुलभ और मधु कांकरिया ने हिस्सा लिया.

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मंच पर अलका सरावगी, हृषीकेश सुलभ, मधु कांकरिया
मंच पर अलका सरावगी, हृषीकेश सुलभ, मधु कांकरिया

साहित्य आजतक के मंच पर 'जब लेखक बोलते हैं' नाम के सेशन में कई वरिष्ठ लेखकों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम में अलका सरावगी, हृषिकेश सुलभ और मधु कांकरिया ने हिस्सा लिया. आजतक के वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पांडे जी ने मंच संभालते हुए भारत के इन जाने-माने लेखकों से बात की.

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उन्होंने लेखिका अलका सरावगी से उनकी किताब 'कुलभूषण' के बारे में सवाल किया. अलका जी ने अपने उपन्यास के चरित्र कूलभूषण की व्याख्या की और बताया कि वह एक ऐसा शक्स है, जो दुबला पतला सा, काफी बदसूरत सा है. जो बंग्लादेश के कुष्ठिया नाम के शहर का बाशिंदा है. आज वह कोलकाता की गलियों में डेढ़ चप्पल पहने घूमता है. 

अलका सरावगी का यह उपन्यास एक रिफ्यूजी होने की यातना पर लिखा गया है. ये कहानी है कूलभूषण की, जिसकी जिंदगी दंगों से गुजरती कैसे बीतती है उस पर है. आजादी के 17 साल बाद हुए दंगा, हजरत बल और हिंदू मुस्लिम दंगों में फंसे इंसान अपनी जिंदगी कैसे जी रहे हैं. यह उपन्यास उन रिफ्यूजियों की एक कहानी है. उनसे सवाल किया गया कि उनकी लेखनी में विस्थापन का दर्द ही क्यों है? इसका जवाब देते हुए उन्होंने जानकी दास तेजपाल मेंशन का उदाहरण देते हुए कहा कि आजकल अपनी स्मृतियों से भरे घर को एक नया रूप देने के लिए तोड़ देते हैं और नए शीशे से बने घर में विस्थापित हो जाते हैं. 

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मंच पर बैठे हृषिकेश सुलभ, हिन्दी के समकालीन शीर्ष लेखकों में से हैं, जो कि कहानी और नाटक-लेखन की विधाओं के लिये जाने जाते हैं. उन्होंने 'दाता पीड़' किताब लिखी है, जो मध्यम वर्ग के जीवन पर आधारित है. 'दाता पीड़' पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हम जिस समय में जी रहे हैं वो बहुत कठिन है, धर्म जो हमारे जीवन पद्धति में शामिल था, आज वो बहस, गहरे मतभेत और हिंसा का कारण बन गया है. यह उपन्यास एक पड़ताल की तरह है. क्या यह एक राजनीतिक परपंच है या इंसानियत को कुछ हो गया. इसलिए किसी कोनों में जहां कहीं भी प्रेम छुपा हुआ है, उन जगहों की खोज करने के बारे में लिखा गया है. साथ ही, कहा कि यह उपन्यास एक रस की तलाश करता है और अमीना और साबिर के प्रेम के जरिए उस रस को ढ़ुंढ़ता है. उन्होंने कबीर की एक पंक्ति भी सुनाई जो इस तरह थी- आग आंच सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार, नेह निबाहन एक रस, महा कठिन व्यवहार.

साहित्य आजतक के महाकुंभ में शामिल लेखिका मधु कांकरिया ने भी अपने उपन्यास के बारे में बताया. उनकी रचना 'ढलती सांझ का सूरज' किसान की पीड़ाओं पर आधारित एक कहानी है. इस रचना में आधुनिकता और अतीत को जोड़ते किसानों की पिड़ा को लिखा गया है.  

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मधु कांकरिया ने एक वाकिए को याद करते हुए बताया कि नाना पटेकर की एक अपील पढ़ी कि मुंबई की सड़कों पर कोई भिखारी मिल जाए, तो खाली हाथ मत लौटाना, हो सकता है वह कोई किसान हो. इस अपील से वो बहुत मर्माहत हुईं और अपने एक गुरु के साथ किसानों की पीड़ा को समझने निकल गईं और इस तरह उन्हें 'ढ़लती सांझ का सूरज' लिखने की प्रेरणा मिली. कार्यक्रम के अंत में उन्होंने अपने दर्द को कुछ यूं बयां किया- 'बाजार आबाद हो रहा है, किसान बर्बाद हो रहा है.'

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