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Sahitya Aaj Tak 2022: जब बच्चों को बिना छीले केला खाते देख रो पड़े थे कैलाश सत्यार्थी

दिल्ली में साहित्य का सबसे बड़ा मेला चल रहा है. साहित्य आजतक के तीन दिन के कार्यक्रम में सिनेमा, संगीत, सियासत, संस्कृति और थिएटर से जुड़े जाने-माने चेहरे हिस्सा ले रहे हैं. साहित्य के मंच पर शिरकत की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और समाज सेवक कैलाश सत्यार्थी ने. उन्होंने बताया कि साहित्य का उनके जीवन में क्या महत्व है.

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कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता, समाज सेवक
कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता, समाज सेवक

दो साल बाद शब्द-सुरों का महाकुंभ साहित्य आजतक एक बार फिर लौट आया है. साहित्य का ये मेला तीन दिन का है, जो 18 से 20 नवंबर तक दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में लगा हुआ है. इस कार्यक्रम में सिनेमा, संगीत, सियासत, संस्कृति और थिएटर से जुड़े जाने-माने चेहरे हिस्सा ले रहे हैं. 

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साहित्य आजतक में बदलाव के बोल कार्यक्रम में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और समाज सेवक कैलाश सत्यार्थी ने भी शिरकत की. कैलाश सत्यार्थी बच्चों का सहारा तो हैं ही, उनके अंदर एक साहित्यकार भी हैं. उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं जैसे- Every Child Matters, तलो हवाओं का रुख मोड़ें. वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने उसने साहित्य और समाज से जुड़े कई सवाल किए. कैलाश सत्यार्थी ने अपनी लिखी कई कविताएं भी मंच पर पढ़ीं.

सोशल एक्टिविस्ट और साहित्यकार के बीच कितनी साझेदारी है?

उनसे सवाल किया गया कि सोशल एक्टिविस्ट और साहित्यकार के बीच कितनी साझेदारी है. इस सवाल पर उन्होंने कहा कि समाज बदलने वाले सभी लोग बिना भावना, करुणा, और मजबूत दिमाग के ये काम नहीं बन पाता है. सभी लोगों के दिल दिमाग में जो गूंजता है उसे अगर लेखनी से व्यक्त कर दिया जाए, तो साहित्य बन सकता है. उन्होंने कहा कि ये दोनों यात्राएं साथ-साथ चलती रही हैं. जिन चीजों को हम देखते हैं, उनपर अमल नहीं कर पाते तो वो कविता के रूप में आ जाती है.

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उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग ज़ॉब छोड़कर वे इस काम में आए, और उन्होंने 'संघर्ष जारी रहेगा' नाम की पत्रिका का संपादन शुरू किया. इसका मकसद ये था कि कोई भी परिवर्तन बिना सामाजिक चेतना के नहीं होता. चेतना जगाने के लिए सहित्य का सहारा ज़रूरी है. उसी पत्रिका से आंदोलन का जन्म हुआ. 

kailash satyarthi
कविता पाठ करते हुए कैलाश सत्यार्थी

उन्होंने अपनी लिखी कविता भी पढ़ी, जो उन्होंने कोविड के दौरान लिखी थी.

मैं बुदबुदा हूं, भंवर हूं, लहर हूं, मैं सैलाब और सुनामी हूं,
मैं पोखर हूं, तालाब हूं नदी हूं, मैं ही बूंद और मैं ही समंदर हूं
लेकिन सच यह है कि मैं सिर्फ पानी हूं

तुम मुझे स्वास कहो, झोंका कहो या आंधी, तूफान कहो या हरिकेन,
असलियत में तो मैं केवल हवा हूं,

तुम लकीरें खेंचकर मुझे कहते रहो भारत, पाकिस्तान, अफ्रीका, अमेरिका इंग्लिस्तान
लेकिन मैं सिर्फ धरती हूं, एक धरती

कब तक उलझे रहोगे तुम नाम देकर मेरे आकारों और रफ्तारों को जो कभी स्थाई नहीं रहते
परंतु जो मरेगा नहीं कभी वो सिर्फ मैं हूं ,और वही मैं तुम हो

देश में बच्चे क्या कुछ झेल रहे हैं ?

उन्होंने अपनी पुस्तक 'तुम पहले क्यों नहीं आए' के टाइटल के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि कैसे ये टाइटल रखा गया. उन्होंने कहा कि इसका शीर्षक एक बच्ची के कहे गए शब्द थे. उन्होंने बताया कि हरियाणा की एक खदान से उन्होंने कुछ मजदूरों और बच्चों को छुड़वाया था. उन्होंने कहा- 'अपनी कार में मैंने कुछ बच्चों को बैठाया और बाकी लोगों को ट्रक में बिठाकर निकाला गया. कार में बैठे बच्चे बहुत सहमे हुए थे. वे डरे हुए थे. वे आजादी को महसूस भी नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उनके माता-पिता भी वहीं पैदा हुए और वो भी.' उन्होंने सड़कें नहीं देखी थीं. कार नहीं देखी थी.

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उन्होंने कहा कि गाड़ी में पीछे जो केले रखे हुए हैं उन्हें लेकर आपस में बांट लो. तो एक बच्चे ने कहा कि ऐसा प्याज तो मैंने कभी देखा नहीं. एक लड़की ने कहा कि ये आलू भी नहीं है प्याज भी नहीं है, तो ये क्या है. बच्चों ने मेरी बात मानकर उसे खाया तो वे उसे बिना छीलकर खाने लगे. उन्होंने कहा कि मुझे ये देखकर रोना आ गया. उन्होंने उन्हें  केला छीलना सिखाया. फिर मेरे कंधे पर एक नन्ही बच्ची देवली ने हाथ रखते हुए कहा कि 'तुम पहले क्यों नहीं आए'. उस बच्ची ने ये केले के लिए नहीं कहा, उसने बहुत दर्द देखे थे. उस आवाज में दर्द था, करुणा थी, सवाल थे. उस बच्ची ने मुझपर विश्वास रखा, मैं इस विश्वास को संजोए हुए हूं.


 

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