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प्रशासनिक अधिकारियों और कविताओं के बीच दिखा अनोखा तालमेल, ये 'होश उड़ाने का हुनर रखते हैं'

तीन दिवसीय साहित्य आजतक में भारत के प्रशासनिक सेवा में कार्यरत आईएस नीतीश्वर कुमार, डॉ हरिओम, आईपीएस तेजिंदर सिंह लूथरा और सिविल सर्वेंट आलोक यादव ने यूं बांधा समां कि दर्शक करते रहे वाह वाह!

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मंच पर आलोक यादव, डॉ हरिओम, नीतीश्वर कुमार, तेजिंदर सिंह लूथरा
मंच पर आलोक यादव, डॉ हरिओम, नीतीश्वर कुमार, तेजिंदर सिंह लूथरा

दो साल के बाद साहित्य आजतक का मंच एक बार फिर सजा है. मंच पर तीन प्रशासनिक अधिकारियों ने भी शिरकत की, जो साहित्य में भी काफी दखल रखते हैं. वे बेहद अच्छे कवि भी हैं. कार्यक्रम में 'कुर्सी और कविता' नाम के सेशन में नीतीश्वर कुमार, डॉ. हरिओम, तेजिंदर सिंह लूथरा और आलोक यादव ने शिरकत की. नितिश्वर कुमार और डॉ. हरिओम आईएएस हैं और तेजिंदर सिंह लूथरा आईपीएस अधिकारी हैं. आज तक की वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने देश और प्रदेश को चलाने वाले इन अधिकारियों से बातचीत की.

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महफ़िल में शामिल यूपी के सीनियर आईएएस डॉ हरिओम तमाम जिलों के डीएम रहे हैं. वह कवि-कथाकार, ग़ज़ल गायक के रूप में भी देश-दुनिया में मशहूर हैं. उन्हें देश-विदेश के तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. उन्होंने अपनी शायरी से समां बांध दिया. उन्होंने अपने जज़्बात कुछ इस तरह पेश किए- 

'फूल नजरों में खिलाने का हुनर रखते हैं, आपको दिल में बसाने का हुनर रखते हैं, 
इक ज़रा देर ठहरिए तो मेरे पहलु में, बाखुदा होश उड़ाने का हुनर रखते हैं'

हरिओम ने अपने बारे में कुछ यूं कहा- 

'बड़ा हुआ न कभी और मैं बच्चा भी नहीं, दिमाग ज्यादा नहीं अक्ल का कच्चा भी नहीं 
और तुम्हारे काम का हो पाऊं, मैं बुरा भी नहीं और मैं अच्छा भी नहीं
तमाम शहर का किस्सा बना दिया मुझको, मैं क्या था और क्या बना दिया मुझको, 
कहां उम्र शराफत से कटती है, तुमने अच्छा बना दिया मुझको'

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उन्होंने एक ग़ज़ल भी सुनाई मैं तेरे प्यार का मारा हुआ हूं, सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं. फिर इस महफिल में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और वित्तीय सलाहकार नीतीश्वर कुमार जो कि 1996 यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी हैं उन्होंने शायरी की कमान संभाली. नीतीश्वर कुमार ने 'कह दो ना' किताब लिखी है. इनका मानना है कि कविता अपको जमीन से जोड़ती है. उनकी ग़ज़ल के बोल थे- 

जाएं तो जाएं कहां हम, गई तन्हाई मुझे मिल, इंतजार अब तो नहीं है, फिर भी बेचैन है दिल, 
जाएं तो जाएं कहां हम, बेकरारी में तेरी याद सबा लगती है, चल हकीकत न सही ख्वाब के तकिए पे ही मिल, 
इंतजार अब तो नहीं है फिर भी बैचेन है दिल, जाएं तो जाएं कहां हम, गई तन्हाई मुझे मिल

वहीं कमिश्नर तेजीदंर लूथरा को सुनकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए. इन्होंने 'अस्सी घाट का बांसुरी वाला' पुस्तक लिखी है. उन्होंने बताया कि कैसे वो सिंगापुर के एक नए मंदिर में गए और वहां से उनको प्रेरणा मिली एक नई कविता की, जो कुछ यूं थी-

एक नया ईश्वर- आज मैं एक नए ईश्वर से मिला, मेरा दोस्त मुझे अपने मंदिर ले आया था, मैंने नए ईश्वर से बात की, उसकी बातें चाल-ढाल सब वैसा ही था, मैंने थोड़ा विस्मित होकर कहा- हे ईश्वर तुम तो बिल्कुल नहीं बदले, ईश्वर हंसा फिर चुप हो गया.
मैंने थोड़ा आशंकित हो कर पूछा- हे ईश्वर तुम किसके हो, मेरे या मेरे दोस्त के, ईश्वर फिर हंसा पर कोई उत्तर न आया, मैंने साहस कर अंतिम प्रश्न किया- हे ईश्वर क्या तुम किसी के भी नहीं, ईश्वर बहुत-बहुत-बहुत हंसा, पर कुछ न बोला. 

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कवि आलोक यादव ने कविता सुनाई- 

अब ना रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूं, आभी जाओ राम मैं मारीच होना चहता हूं, 
थक चुका हूं और कब तक ये दुआ करता रहूं, एक कांधा करता मौला अब बस रोना चहता हूं.
जिनके हाथों में किताबो की जगह औजार देखे, उनकी आंखों में कोई सपना संजोना चहता हूं, 
है कलम तलवार से भी तेज फिर, मैं किसी मजबूर की शमशीर होना चाहता हूं.

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