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Sahitya AajTak 2024: 'ट्रांसलेशन के सेतु पर सवार होकर एक भाषा दूसरे तक पहुंचती है', लेखिका सत्या ने बताया क्यों जरूरी है अनुवाद

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में आज से साहित्य आजतक की शुरुआत हो गई है. इस दौरान अनुवाद जैसे अहम मुद्दे पर भी चर्चा रखी गई. अनुवाद जरूरी है... क्योंकि? इसपर साहित्य आजतक के मंच पर लेखिका सत्या उपाध्याय और मधु कपूर ने विस्तार से चर्चा की.

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सत्या उपाध्याय, मधु कपूर
सत्या उपाध्याय, मधु कपूर

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में साहित्य आजतक के खास संस्करण की शुरुआत हो गई है. साहित्य के इस मंच पर शब्द-सुरों के कई बादशाह भी यहां पहुंचे. इसी दौरान एक अहम मुद्दे पर बातचीत भी रखी गई. अनुवाद जरूरी है... क्योंकि? इस मुद्दे पर लेखिका सत्या उपाध्याय ने बड़ा ही दिलचस्प जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि तीन डॉट का अर्थ है संस्कृति, समाज और संस्कार. अनुवाद की व्याख्या अगर की जाए तो इसमें अनु का अर्थ पीछे और वाद का अर्थ होता है कथन.

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लेखिका सत्या उपाध्याय के मुताबिक, अगर कुछ कहा गया है लेकिन उसके बाद उसको फिर से कहना ही अनुवाद कहलाता है. हमें अगर अपने समाज को, संस्कृति को या संस्कार को दुनिया तक पहुंचाना है तो हम अनुवाद के माध्यम से अपनी बात पहुंचाते हैं. भारत जैसे ही कई भाषाओं वाले देश में हम अपनी बात अगले तक अनुवाद के जरिए ही अपनी बात पहुंचाते हैं. अनुवाद ही वह सेतु है जिसपर चलकर एक भाषा दूसरे तक पहुंचती है.

यहां देखें- साहित्य आजतक कोलकाता 2024 के तमाम कार्यक्रम

अनुवाद पर लेखिका सत्या उपाध्याय की राय

गूगल ट्रांसलेट के इस्तेमाल से अन्य भाषा के सीखने के मसले पर लेखिका सत्या प्रकाश बताती हैं कि बेहतर ये होगा कि भाषा किसी उस इंसान से सीखा जाए जो उस भाषा के जानकार हैं. वह कहती हैं कि अगर गूगल या मशीन ही सबकुछ कर देगी तो मनुष्य की क्या जरूरत. मशीन को भी इंसान ही सिखाता है.

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मशीन किसी भाषा के प्रकृति को जानती है, ना प्रवृति को और ना ही उसके सामाजित सरोकार को जानती है. यह सिर्फ उस भाषा को जानने वाला ही जानता है. अनुवाद में दो चीजें बहुत जरूरी है और जिस भाषा का अनुवाद किया जाता है उसे स्रोत और जिस भाषा में ट्रांसलेट किया जाना है उसे लक्ष्य भाषा कहा जाता है. साहित्यिक अनुवाद पर वह कहती हैं कि जब दो अलग भाषाओं वाले लोग मिलते हैं तो वहां भी शाब्दिक या वाचिक अनुवाद की जरूरत होती है.

लेखिका सत्या उपाध्याय कहती हैं कि अनुवादक की एक विशिष्ट प्रतिभा होती है. मसलन, कोई कविता का अनुवाद अच्छा कर सकता है, कोई कहानी का या उपन्यास का अनुवाद करता है तो कोई विज्ञान के क्षेत्र का अनुवाद करता है तो उसके लिए दो चीजें जरूरी है - एक तो भाषा और दूसरे उस विषय जिसपर अनुवाद करना है, उसका ज्ञान होना. यह पूछे जाने पर कि क्या जो अनुवाद करता हो वो रचना भी कर सकता है? सत्या उपाध्याय का मानना है कि ऐसा जरूरी नहीं है.

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अनुवाद जरूरी है... क्योंकि? पर लेखिका मधु कपूर की राय

लेखिका और ट्रांसलेटर मधु कपूर अनुवाद को लेकर कहती हैं कि अनुवाद करने में जिसकी सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वो है मुहावरों की. मुहावरे मिलने मुश्किल होते हैं. सभी मुहावरे सभी भाषाओं में नहीं मिलते. अनुवाद करना बहुत कठिन काम है. वह एक उदाहरण देती हैं कि 'पतहारी हंसी' मतलब जैसे कोई आपको रास्ते में मिल जाते हैं तो आप उसको देखकर निकल जाते हैं. वह कहती हैं कि अब इसका सटीक अंग्रेजी ट्रांसलेशन क्या होगा. इसलिए अनुवाद एक कठिन काम है.

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अनुवाद पर मधु कपूर कहती हैं कि अनुवाद सिर्फ शाब्दिक नहीं होता है. उन्होंने बताया कि भाव-अनुवाद होता है, छाया-अनुवाद होता है... यह बताते हुए वह शाब्दिक अनुवाद को खारिज करती हैं, जो आमतौर पर गूगल ट्रांसलेट करता है.

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