साहित्य आजतक 2024 के विशेष सत्र 'अनुवाद से खुलती दुनिया' में साहित्य की विविधता को जोड़ने और इसे व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में अनुवाद की भूमिका पर गहन चर्चा की गई. इस सत्र में पत्रकार, लेखक और अनुवादक प्रभात सिंह, लेखक एवं अनुवादक प्रभात मिलिंद, लेखिका और अनुवादक मनीषा तनेजा और लेखिका पूजा प्रियंवदा शामिल हुईं.
इस सत्र में अनुवाद के माध्यम से संस्कृतियों को जोड़ने, साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने पर विचार-विमर्श हुआ. वक्ताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि अनुवाद न केवल शब्दों का, बल्कि भावनाओं, विचारों और संस्कृति का आदान-प्रदान है.
लेखक-अनुवादक प्रभात सिंह ने कहा कि जिस भी भाषा में आप ट्रांसफॉर्म कर रहे हैं, उसकी उस संस्कृति की, वहां के साहित्य की समझ नहीं होती है तो आप उसके साथ न्याय नहीं कर सकते. फनी किस्म के ट्रांसलेशन मैंने बहुत देखे हैं. बहुत महसूस किया है. अगर हम उसको नहीं जानते हैं तो हम उसको रीड नहीं कर पाएंगे. किसी दूसरी जबान के मुहावरे से अगर वाकिफ नहीं हैं तो हम ट्रॉसफार्म करते समय गलती कर सकते हैं. जो लिखा गया है, उसमें व्यंग्य होता है, अगर हम उसे ठीक के रीड नहीं कर पाते हैं तो गलती हो सकती है.

उन्होंने कहा कि हिंदी अंग्रेजी के जो अनुवाद हम पढ़ते हैं, उनको पढ़ते हुए हम सहज महसूस करते हैं. हमने कई ऐसी किताबें पढ़ीं, जिनमें ये बात दिखाई दी. अनुवाद को एकदम नए सिरे से कहना होता है, जो अनुवाद कर रहा होता है, सही मायने में वो उसकी किताब होती है. समय की बात करें कि पब्लिशर आपको कितना वक्त देता है, इस पर निर्भर करता है.
लेखक व अनुवादक प्रभात मिलिंद ने कहा कि हिंदी कविता का अनुवाद आसान हो जाता है, लेकिन अंग्रेजी का कविता का थोड़ा मुश्किल होता है. अगर आपकी रुचि से निकट है तो आसान होता है. भाषा का भी फर्क पड़ता है. जब मैंने बड़े लेखकों के नॉवेल का अनुवाद किया था तो वह अनुभव के तौर पर मुश्किल था, लेकिन संतुष्टि के तौर पर अच्छा था. जब आप कुछ अनुवाद करते हैं तो उसे जब दोबारा पढ़ते हैं तो उसमें सुधार की गुंजाइश नजर आती है, छप जाने के बाद भी ऐसा होता है. अनुवाद में ये देखना होता है कि वैकल्पिक शब्द मूल शब्द के कितना निकट है.

लेखिका व अनुवादक मनीषा तनेजा ने कहा कि अनुवाद में हमेशा मौलिक कृति से कुछ दूर रह जाती हूं. ये कहना कि बराबर है या नजदीक है, बेईमानी होगी. जितना करीब हो सकता है, कोशिश रहती है कि उतना हो सके. बहुत सारी चीजें ध्यान में रखनी होती हैं. भाषा के साथ संस्कृति का भी ख्याल रखना पड़ता है. मनीषा ने कहा कि हिंदी के प्रकाशन अनुवाद के पैसे बहुत कम देते हैं. अगर हम सिर्फ अनुवादक के रूप में ही काम करने लग जाएं तो उससे रोटी भी मुश्किल से मिलेगी. जिस तरह के अनुवाद हम कर रहे हैं, उसमें महीनों लग जाते हैं, ऐसे में कम पैसे मिलते हैं तो हमारे सामने मुश्किल हो जाएगी.
वहीं पूजा प्रियंवदा ने कहा कि ट्रांसलेशन में दूसरे कल्चर की समझ बेहद जरूरी है. इसमें ऑथर से भी कई बार डिस्कस करते हैं. मैंने कई बुक्स को ट्रांसलेट किया है, इस दौरान ऑथर से डिस्कस किया. किताब को दूसरी भाषा में तो ले जाते हैं, लेकिन उसकी आत्मा और उसका एसेंस के साथ छेड़छाड़ नहीं होती. ट्रांसलेशन के बाद हमें एक अलग क्रिएटिव सैटिस्फेक्शन मिलता है कि जो भाव चाहिए थे, हमने उन्हीं में बात व्यक्त कर दी. उन्होंने कहा कि आज के जमाने में अनुवाद और ज्यादा जरूरी है. मैं मेंटल हेल्थ के बहुत ट्रांसलेशन करती हूं, जिसमें मैं देखती हूं कि डिसेबिलिटी या मेंटल हेल्थ के लिए हिंदी में शब्द नहीं हैं. इसके लिए बहुत जगह शब्द बनाने पड़े या अंग्रेजी का ही शब्द वहां रखना पड़ा.

पूजा प्रियंवदा ने आगे कहा कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से काम किया जा रहा है. डिवाइस एसेंस को नहीं समझ सकता. कल्चर का एसेंस, मुहावरे ये सब एआई नहीं समझ सकता. इमोशनल पार्ट ऑफ ह्यूमन बीइंग का पार्ट इसमें मिसिंग है. एआई में भावों और भावनाओं को समझने की क्षमता नहीं है. किसी गंभीर काम में उसकी मदद नहीं ली जा सकती. वह चुटकुले अच्छे बनाता है. जिस भाव की जरूरत है, हमें उसी भाव को व्यक्त करने वाले शब्द के इस्तेमाल करने की जरूरत है.पूजा ने कहा कि ये सच है कि ट्रांसलेशन में पैसे बहुत कम मिलते हैं. नए अनुवादकों को तो नाम भी नहीं मिलता, ऊपर से पैसे भी बेहद कम. प्रकाशकों को इस बारे में सोचना चाहिए.