Sahitya AajTak 2022: साहित्य आजतक के मंच पर अंतिम दिन 'ये जिंदगी के मेले' सेशन में देश की जानी मानी लेखिकाओं ने साहित्य, लेखन और मौजूदा परिदृश्य पर बातें कीं. इनमें लेखिका उपन्यासकार डॉ. सूर्यबाला, लेखिका ममता कालिया, लेखिका ऊषा किरण खान शामिल हुईं.
इस दौरान कार्यक्रम में डॉ. सूर्यबाला ने कहा कि आज मेरे सामने तीसरी पीढ़ी बैठी सुन रही है. मैंने जब लिखना शुरू किया, तब आज के जैसा रंगारंग माहौल नहीं होता था. उस समय लेखन का वातावरण अलग होता था. आज लिखते हुए 50 साल हो चुके हैं.
उन्होंने बताया कि लेखन के बीच इसी तरह महिला कथाकार के तौर पर पहचान बनी. बगैर संघर्ष के किसी भी रचनाकार के हाथ में कलम नहीं आती. मैंने बहुत 12 इंच का घूंघट निकालकर स्वतंत्रता पाई है. एक साल पहले कौन देश को वासी... उपन्यास आ चुका है, जिसमें जीवन संघर्ष को बयां किया गया है.
डॉ. सूर्यबाला ने कहा कि कैलाश गौतम की कविता 'अमौसा का मेला' को नई पीढ़ी जरूर पढ़े. आज जब श्रद्धा आफताब की बातें सुनती हूं तो लगता है कि पहले ऐसा नहीं था. मेरे बचपन में ऐसा माहौल नहीं होता था. इस तरह का 'प्रेम' नहीं था. उन्होंने कहा कि बचपन में प्रेम कविताएं भी लिखती थी.
संघर्ष जितना अधिक होगा, संवेदना उतनी ही अधिक छुएगीः ऊषा किरण खान
जिंदगी के मेले सेशन में ऊषा किरण खान ने कहा कि मेरे पिता कृषि संपन्न थे. मैं बचपन से लेकर एमए तक हॉस्टल में रही. कम उम्र में पिता नहीं रहे तो कई तरह की परेशानियों से सामना करना पड़ा. जिसके जीवन में जितना अधिक संघर्ष होगा, संवेदना उसे उतना ही अधिक छुएगी, इसी बीच अगर उसके हाथ में कलम आ गया, तो उसकी लेखनी उतनी ही बेहतर होगी.
उन्होंने बताया कि कुछ हॉस्टल अंग्रेजों ने शुरू किए थे. वहां अक्सर हिंदी साहित्य से जुड़ाव होता गया. पढ़ाई के दौरान यूथ फेस्टिवल में शामिल होते थे. इसी सिलसिले में साहित्य का वातावरण बनता गया. जिंदगी का यही मेला आज यहां तक लेकर आया है.
उन्होंने कहा कि मेरे पिता और मेरे पति के पिता मित्र थे. गांधीवादी समाज सुधारक लोग थे. इसी बीच हमारी मित्रता हो गई और बचपन में ही मित्र से शादी हो गई. इसी बीच शादी हो गई. इसके बाद काफी हंगामा भी हुआ. हम वैचारिक रूप से दोनों घुले मिले रहे.
हमारी रचनाओं में उतर आता है जिंदगी का मेलाः ममता कालिया
इस दौरान लेखिका ममता कालिया ने कहा कि हमारे समय में छोटे-छोटे मेले लगते थे, लेकिन वहां खूब मजा आता था. मुझे मेले के नाम पर साहित्य याद आता है, जिसे पढ़ा है. जिसमें जीवन की कई कहानियां देखने समझने को मिलती थीं.
उन्होंने अपने बचपन की यादों का जिक्र करते हुए कहा कि नागपुर में लगे मेले में एक चवन्नी मिली थी, जिसमें ही पूरा मेला देखकर लौटना था. यही जिंदगी का मेला है, जो हमारी रचनाओं में उतर आते हैं. उन्होंने कहा कि मेले में सभी अपनी-अपनी यादों को संजोकर ले जाते हैं. इस दौरान उन्होंने अपना साहित्यिक संघर्ष की बातें भी बताईं.