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चौधरी साहब का तोता | स्टोरीबॉक्स | EP 59

चौधरी साहब जब मरे तो अपने पीछे एक तोता छोड़ गए। तोते का पिंजड़ा घर की ड्योढ़ी पर लटका रहता था और तोता आते-जाते लोगों को गालियां देता रहता। दरअसल गाली-गलौज की आदत तोते ने अपने मरहूम मालिक से सीखी थी। बेवा चौधराइन उसे कभी अमरूद, कभी रोटी का टुकड़ा डाल देती और वो मज़े से खाकर टें-टें करने लगता। एक रोज़ मकान मालिक किराया लेने घर आया - सुनिए मशहूर राइटर मोहम्मद अली रूदौलवी के लिखे मज़मून का एक हिस्सा - चौधरी साहब का तोता - स्टोरीबॉक्स में

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STORYBOX WITH JAMSHED QAMAR SIDDIQUI
STORYBOX WITH JAMSHED QAMAR SIDDIQUI

चौधरी साहब का तोता
मोहम्मद अली रुदौलवी

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अभी कुछ दिन पहले मुझसे किसी ने पूछा कि बीवी कैसी होनी चाहिए? मैंने कहा, कैसी होनी चाहिए... बीवियां तो सब अच्छी ही होती हैं, कोई मुझे इस दुनिया में एक बुरी बीवी दिखा दे तो जानूं। वो बीवी ही तो है जिसकी वजह से घर में रौशनी फैली रहती है, नूर रहता है। हां, मतलब ठीक है, चराग के नीचे थोड़ा सा .. मतलब... अंधेरा रहता है... लेकिन अब कोई कमज़र्फ मर्द ज़री से अंधेरे से घबरा कर चराग़ की शिकायत करे तो... तो यो तो गलत बात है। अरे भई अंधेरा ही तो है। वो भी ज़ई सा। अच्छा एक बात मैं और बता दूं आप लोगों को कि मैंने आजतक मैंने आज ... इस दुनिया में... कोई भी बदसूरत औरत नहीं देखी। सही में। बदसूरत औरतें होती ही नहीं, मैं भी आँखें रखता हूँ और दुनिया भी देखी है, अगर कहीं होतीं तो आख़िर मैं न देखता। (आगे की कहानी नीचे पढ़ें, स्क्रॉल करें या इसी कहानी को ऑडियो में सुनने के लिए ठीक नीचे लगे लिंक पर क्लिक करें) 

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आप यकीन नहीं कर रहे हैं... मत कीजिए... लेकिन इसका सबूत ये भी है कि दुनिया जिसे बदसूरत कहती है, आप देखिए कि उसका भी चाहने वाला कोई न कोई निकल आता है। अरे भई अगर वो बदसूरत तो आपके लिए थी, चाहने वाले के लिए तो वो परी हुई। नज़र की बात है। लैला की खूबसूरती मजनूं से पूछिये। असल में ऐसा इसलिए होता है कि हर औरत में उम्दा तराशे हुए हीरे की तरह हज़ारों पहलू होते हैं और हर पहलू में रौशनी के नए-नए रंग होते हैं। ये मुम्किन है कि कोई पहलू किसी की आँख में ज़रूरत से ज़ियादा चकाचौंध पैदा कर दे, और वो पसन्द न करे तो भई इससे बीवी की बुराई कहाँ से साबित हुई। बताइये... नहीं नहीं बोलिये... बोलिए.. 
एक पुराने यूनानी ड्रामा राइटर ने लिखा है दुनिया की शुरुआत में इंसान अलग तरह का होता था। वो एक तरफ से मर्द होता था और दूसरी तरफ से औरत... कुछ इस तरह जैसे किसी औरत और मर्द की पीठ आपस में चिपका कर उन्हें एक बना दिया गया हो। तो यानि इंसान को इधर से देखो तो मर्द उधर से देखो तो औरत। और ऐसा इंसान रास्ते पर पर अलग तरह से चलता था। कुछ इस तरब कि पहले चारों हाथ ज़मीन पर लगे और दोनों सर नीचे आ गए। और चारों पाँव सर की जगह हवा में। फिर पलटा खाया और चारों पाँव के बल खड़े हो गए और इस तरह आगे बढ़ते गए। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी हालत में ये लोग रास्ता बहुत तेज़ चलते थे और क्योंकि दो-दो लोगों की ताकतें मिल कर चलती थीं। तब तक दुनिया में सब कुछ ठीक था, औरत मर्द की शादी की ज़रूरत नहीं थी। झगड़े उनके बीच होते नहीं थे, रात को घर देर से आने का बहाना मर्द बना नहीं पाता था, औरत चुगली कर नहीं पाती थी। शकल एक दूसरे की देखनी नहीं पड़ती थी। सब सेट था। लेकिन फिर यूनान में शुरु हुआ देवताओं को चढ़ावा चढाने का सिस्टम...  जो इस दुनिया में रहने का एक तरह का टैक्स था। अब यूनानी देवताओं ने सोचा कि भई इस तरह तो दो लोग मिलकर चढ़ावे की एक ही रकम देते हैं। क्यों न इनको बीच से काट दिया जाए... ताकि ये ऐसे अलग हो जाएं जैसे मूंगफली का दाना दबाने पर दो हिस्से में टूट जाता है। दोनों हिस्सों से अलग अलग चढ़ावा आएगा। इसके बाद यही किया गया, भई वो देवता थे.. उनके लिए क्या मुश्किल थी। बोले कुन फया कुन... लीजिए हो गया। इंसान के दो टुकड़े, एक बन गया मर्द और दूसरा बन गया औरत.... अब वो दिन था और आज का दिन है... इस पूरी दुनिया में हर कोई अपना वही जोड़ा ढूंढता फिर रहा है। जिनको मिल जाता है वो खुश खुश रहते हैं, जिनको नहीं मिलता वो पगलाए पगलाए घूमते रहते हैं। 
हमारे पड़ोस में एक मियां बीवी रहते हैं जिनका जोड़ा पूरी तौर से मिल गया है। क्योंकि ये दोनों मियां-बीवी बराबर के काहिल, परले सिरे के झूटे और बराबर से हद दर्जे के नकारे हैं, मगर जब देखिए दोनों नई उम्र के लड़के-लड़कियों की तरह एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले बैठे हैं। उनके दो बच्चे हैं, कसम खुदा की पूरे मुहल्ले ने उन बच्चों का धोया हुआ मुँह कभी नहीं देखा। कपड़े उन लोगों के तन पर से कट के गिर जाते हैं मगर धोबी को देने की तौफ़ीक़ नहीं होती। घर के पर्दे चादर फट कर अलग हो जाते हैं मगर सूई तागे की शर्मिंदा नहीं होती। मैंने एक दिन उस औरत से पूछा कि तुम्हारे मियाँ तुमको चाहते हैं? कहने लगी कि इतना चाहते हैं कि खाना लिए बैठे रहते हैं मेरे इंतज़ार में लेकिन मेरे बग़ैर निवाला नहीं उतरता उनके गले से। फिर बोली, इतनी मुहब्बत करते हैं कि कल सुब्ह बटेर के शिकार को जा रहे थे, मैंने कहा रोज़ जाते हो मगर कभी एक पर भी घर में न आया। बस ग़ुस्से में एक डंडा मेरी पीठ पर रसीद किया, मैं भी दोपहर तक मुँह फुलाए रही और नहीं बोली। तब दौड़े गए, देसी घी की जलेबियां ले आए, तब जाकर मैं बोली। मैं सोच रहा था कि ये उनका वही खोया हुआ जोड़ा है, या पता नहीं मुझे क्या।
मैं तो उस औरत को याद करता हूं जो मेरे घर के पीछे वाली गली में खां साहब के मकान में रहती थी। उसके शौहर, चौधरी साहब का इंतकाल हो चुका था। लेकिन चौधरी साहब अपने पीछे एक तोता छोड़ गए थे जिसने चौधरी साहब को सुन-सुन कर खूब गालियां देना सीख लिया था। चौधरी साहब को गाली देने की बहुत आदत थी। तोता भी अने मालिक को सुन-सुन कर बिलकुल पक्का वाला गालीबाज़ हो गया था। चौधरी साहब के इंतकाल के बाद भी उनका तोता उनके घर में पला रहा। तोते का पिंजड़ा घर की ड्योढ़ी पर खूंटे से लटका रहता था और आने जाने वालों को ये लंबी-लंबी गालियां बकता रहता था। उसकी गालियां इतनी गलीज़ और घिनौनी थी कि लोग रास्ता बदल देते थे। चौधरी साहब की बेवा उसे वक्त से खाने के लिए कबी अमरूद का टुकड़ा, कभी थोड़ी सी रोटी देती। लेकिन कोई ज़रा सा पास से निकल जाए तो समझिए तोता उसको उसका पूरा खानदान याद करवा देता था। एक रोज़ मकान मालिक किराया लेने के लिए आए तो हर बार की तरह वो भी गाली भी खाए। उन्होंने जाते-जाते औरत से कहा, अरे ये तेरा तोता बड़ा फ़हाश यानि अश्लील है, गंदी-गंदी गालियां बकता है... तू पिंजरा खोल क्यों नहीं देती, ये उड़ जाए। वो औरत तोते को देखकर पहले थोड़ा सा मुस्कुराई, फिर शर्माई... फिर बोली... रहने दीजिए खां साहब, इसके रहते हुए उनकी कमी नहीं महसूस होती। ये है औरत... बताइये, मर्द कभी समझ पाएगा औरत की अज़मत? कभी नहीं। 
बिल्कुल ऐसा ही एक दूसरा किस्सा है कि एक शख़्स शराब बहुत पीता था। उसने पादरी के कहने से शराब छोड़ दी। कुछ दिनों के बाद पादरी साहब अपने जब उसके घर पर आए, और अपने साथ आए लोगों से बोले, देखिए उनको... ये पहले बहुत शराब पीते थे... गाली गलौज करते थे। मोहल्ले में मारपीट करते थे... आज इनको देखिए....कितने शरीफ हैं। फिर पादरी ने उस शख्स की बीवी की तरफ देखा जो किनारे मुंह लटकाए बैठी थी। पादरी ने कहा, “अरे भई.. खुश हो तुम... हैं... अब तो ये शराब वराब नहीं पीते” वो बोले, “अरे भैय्या वो सब तो ठीक है लेकिन अब लगता ही नहीं है कि ये मियां हैं। पूरा दिन मुंह सुखाए बैठे रहते हैं, देखो तो लगता है मेहमानी में आए हैं” बताइये अब इस किस्से पर हसिये या रोइये... मगर है ये किस्सा बिल्कुल सच्चा। अब ये दोनों एक दूसरे के वही जोड़े थे जो अलग किए गए थे या नहीं, ये आप तय कीजिए। 
लेकिन सब बीवियां ऐसी नहीं होती कुछ उन डिप्टी साहब की बीवी की तरह भी होती हैं जिनका किस्सा मेरे एक दोस्त बयान करते हैं। बताते हैं कि एक दिन डिप्टी साहब दौरे पर थे और ये उनसे मिलने गए। मालूम हुआ कि डिप्टी साहब नहा रहे हैं। तो ये बैठे रहे, जब देर हुई तो उन्होंने फिर पूछा, “अरे भई डिप्टी साहब कहां हैं” मालूम हुआ अभी तक ग़ुस्ल में हैं। सरकारी काम था, अधूरा रह जाने में दोनों की बदनामी थी। इसलिए वो इन्तज़ार करते रहे। मगर डिप्टी साहब आज निकलने का नाम लेते हैं न कल। उनकी आँतें क़ुल हुवल्लाह पढ़ रही हैं, मगर उनकी बरामदगी की कोई सूरत नहीं दिखाई देती। ख़ैर, कई घंटों के बाद एक नौकर ने आकर कहा, साहब नहा कर आ गए हैं, आप अंदर ड्राइंग रूम में जाकर उनसे मिल लीजिए, वहीं बैठे हैं। ये बेचारे भागते भागते गए तो डिप्टी साहब को देखकर ज़रा चौंके। क्या देखा कि डिप्टी साहब दफ़्तर की मेज़ के पास कुर्सी पर बड़ी शान से तशरीफ़ फ़र्मा हैं। फाइलों का ढेर लगा है लेकिन सिर्फ हाफ पैंट पहने बैठे हैं। और बड़ी ही संजीदगी से फाइलों को पढ़ते हुए सर हिला-हिला कर पन्ने पलट रहे हैं। थोड़ा अटपटा तो लगा कि एक आदमी नंगी राने फैलाए बैठा हुआ है लेकिन करते क्या... नज़दीक गए काम निपटाया और जाने लगे। फिर बाहर निकलते वक्त नौकर से पूछा कि ये क्या चक्कर है तो उसने कहा, अरे साहब, कुछ खास नहीं, बस वो... अरे इनका रोज़ का है
मतलब
अरे ये दफ्तर में रौब डालते हैं, इसको निकाला, उसको डांटा, उनको गुस्सा.. .लेकिन घर में जिस दिन मेम साहब जिस दिन नाराज़ हो जाती हैं... इनको पतलून भी नसीब नहीं होती। आज भी कुछ हुआ होगा... मेम साहब ने हुक्म दिया कि आज इस मूँडी-काटे को कपड़े न दिए जाएं। तो बस बैठे हैं यूंही... 
तो ये हाल है... लेकिन ठीक है चल रहा है। हमें क्या भई... अरे जब डिप्टी साहब को दिक्कत नहीं तो हमें क्यों हो। वैसे भी गैर के मामले में हमारी पसन्दीदगी नापसन्दीदगी क्या चीज़ है और कौन कह सकता है कि ये बीवी अच्छी और ये बुरी है। मेरे एक दूसरे मरहूम दोस्त, अल्लाह उनको जन्नत बख्शे, कहा करते थे कि बीवी के नाज़-ओ-अन्दाज़ हर तरह के उठाए जा सकते हैं, लेकिन एक बात नाक़ाबिल-ए-मुआ’फ़ी है, वो ये कि ये लोग कभी कभी मर जाती हैं। इसी के मुक़ाबिल ये और लतीफ़ा सुनिए। 
एक साहब ने की बीवी शादी के दो ही बरस के अन्दर इंतकाल फर्मा गयीं। छोटा सा बच्चा अपनी निशानी के तौर पर गईं। उन साहब की बड़ी साली थीं जो इत्तिफाक से बेवा थीं मगर पैसा खूब था। उनके शौहर खूब दौलत छोड़कर मरे। जब रिश्तेदारों ने ये कहना शुरु किया कि भई तुम अपनी बड़ी साली से रिश्ता कर लो, तो क्या हुआ कि उनकी उम्र तुमसे काफी ज़्यादा है। अरे भई दोनों घरों का मुर्दा रिश्ता फिर ज़िन्दा हो जाएगा। इनका मन शादी का था नहीं, लेकिन ये शादी कर लेना चाहते थे क्योंकि जहेज़ में खूब माल मिलने वाला था। और फिर इन्होंने ये भी सोचा कि एक जब छोटी वाली न रहीं, तो बडी वाली भी कब तक रहेगी। जब ये गुज़रेंगी तब अपनी हमसिन ढूंढ कर तीसरी शादी करेंगे और मज़े से रहेंगे। 
लीजिए साहब, रिश्ता हो गया। अब... अब ये न आज मरती हैं न कल। आलम ये कि वो तो पहले ही से बूढ़ी थीं, इनके भी दाँत गिर गए, मगर वो जाने का नाम नहीं लेतीं। इधर ये कहीं सफ़र को तय्यार हुए और उधर वो तावीज़ लिए ड्यूढ़ी के पास पहुँच गईं। तावीज़ की ज़मानत में सौंपा कहो क़बूल किया। जिस तरह पीठ दिखाते जा रहे हो इसी तरह ख़ैरियत से वापस आकर मुँह दिखाना नसीब हो। वो कहते हैं कि अब वो अपनी हिफाज़त कुछ इस तरह करते हैं कि एक चीथड़ा खुद अपनी बीवी के दाहिने बाज़ू पर बाँध कर कहते हैं, “ख़ुदा तुम्हारे साए में मुझे परवान चढ़ाए।” बीवी पोपला मुँह लेकर हँसती हैं, हटो भी तुम्हारी मज़ाक... की बातें कभी न जाएँगी।
अब ज़रा ग़ौर फ़रमाइये। अगर उन साहब को कहीं हमने सलाह दी होती कि बड़ी साली से करलो तो ख़ुदा वास्ते को, हम ही तो बदनाम होते। नहीं साहब इस मुआमले में यही ठीक है कि अपनी अपनी डफ़ली और अपना अपना राग। जिसको अपना कटा हुआ दूसरा हिस्सा मिल जाए.. वही खुश है, और जिसको न मिले वो उसी मिले हुए हिस्से को अपना हमसाया बना ले। ज़िंदगी तो ऐसे ही कटेगी। या तो खुशी खुशी काट लीजिए.... या तो डिप्टी साहब की तरह बैठे रहिए ज़िंदगी उस बेवा औरत के तोता की तरह आप को गालियां देती रहेगी। 
 

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