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हिंदी कहानी | एक डॉगी की लवस्टोरी | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

कहते हैं कि आदमी इश्क़ में कुत्ता बन जाता है लेकिन मुझे ऐसा कोई डर नहीं था क्योंकि मैं तो एक कुत्ता ही था। मैं सड़क का आवारा कुत्ता था लेकिन मुझे इश्क़ हो गया था उस आलीशान घर में रहने वाली पिंकी पॉमेरेनियन से जो अपनी मंहगी कार में अपनी मालकिन की गोद में बैठी रहती थी। हमने भी हार नहीं मानी गली के सारे दोस्त यार, मरझिल्ले, कनकटे, दुबले-पतले कुत्ते जमा किए और एक प्लैन बनाया। - सुनिए स्टोरीबॉक्स में कहानी 'एक डॉगी की लव स्टोरी' जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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कहानी - एक डॉगी की लव स्टोरी
 जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

 

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कहने वाले कहते हैं कि आदमी इश्क़ में कुत्ता बन जाता है... हैं मानते हैं कि नई... देखा नहीं आजकल के लड़कों को.. जो मेट्रो स्टेशनों के बाहर इंतज़ार इंतज़ार करते हुए, कैफेज़ में बेबी के खराब मूड कैपिचीनों से ठीक करने की कोशिश करते हुए, माल्स में गुस्से में तेज़ कदम चलती गर्लफ्रैंड के पीछे पीछे भागते हुए... अरे सुनो तो... एक मिनट ... सुन तो लो...  वो मतलब नहीं था मेरा... कहते हुए दिखाई देते हैं... बस स्टाप पर, सिनेमा हाल्स पर, रात में गलियों में खंबे से टिक कर फोन पर बतियाते हुए... शहर में जिस तरफ नज़र उठाइये बस यही इश्क के मारे दिखाई देते हैं। अरे भइया... इश्क़ में वो ताकत है कि अच्छे भले आदमी की हंसती खेलती ज़िंदगी को कुत्ते की ज़िंदगी बना ही देता है। मुझे भी इश्क़ हुआ... जी हां... वो बहुत खूबसूरत ... मतलब अभी बता रहे हैं.. तो मतलब शर्म आ रही है हमको... ख़ैर... तो हमको भी इश्क़ हुआ... बहुत ज़ोर से हुआ लेकिन हम पर कोई फर्क नहीं पड़ा... जानते हैं क्यों... क्योंकि हम पहले से ही कुत्ते हैं... हां... हमारा नाम है मॉंटी...

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और देखिये ये मत सोचिएगा कि हम ये प्यार मुहब्बत की बात बता रहें तो आप समझने लगे कि हम कोई दिल फेंक कुत्ता हैं... जो गली में आवारा लेडीज़ मतलब.. लेडीज़ डॉग्स के पीछे छिछोरपंती करता घूमता फिऱूं... ये सब नहीं नहीं अपुन... मैं एक शरीफ कुत्ता हूं... पता नहीं आपको याद है कि नहीं लेकिन जब आप घर से निकलते हैं तो अक्सर मैं गली के पास दिखाई देता हूं... मैं बहुत खूबसूरत हूं... बहुत ही खूबसूरत.. बस थोड़ा नहाने धोने में थोड़ा रह जाता है इसलिए ज़रा गंदा रहता हूं... मेरा रंग ऐसा है जैसे हल्की आंच पर सिका हुआ टोस्ट होता है... बहुत ही प्यारा

उस दिन आप जब रात में आ रहे थे तो आप ने मुझे पास आता देखकर धत्त.. धत्त किया था... मैंने आपसे कहा था – अबे मैं कुछ कर रहा हूं... तुझे... जा अपने घर चुपचाप... मैंने अपनी ज़बान में कहा था इसलिए आपको समझ नहीं आया होगा। ख़ैर... कहने वाले ये भी कहते हैं कि अगर मुझे किसी बड़ी गाड़ी वाले आदमी ने अडॉप्ट कर लिया होता तो ये अलसेशियन-वेलसेशियन सब फेल थे मेरे आगे... ख़ैर, मैं आज आपको अपनी हैंडसम होने के बारे में नहीं, बल्कि अपनी लव स्टोरी सुनाने आया हूं। सुनेंगे... अरे हंस क्यों रहे हैं भई... क्या प्यार सिर्फ इंसानों को होता है, हम कुत्ते क्या दुनिया में सिर्फ कार के पीछे भागने के लिए पैदा हुए हैं?

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ख़ैर, तो बात थोड़ी पुरानी है। ये उस ज़माने की बात है जब मैं यारों का यार हुआ करता था... मेरे बहुत सारे दोस्त थे जिनके साथ मैं शहर में घूमा करता था। एक था काले रंग और छोटे-छोटे पैरों वाला पोपू, और दूसरा था सफेद और मटमैले रंग वाला बाबू था। किसी गांव का आवारा कुत्ता था, भाग कर इधर शहर आ गया था।  बस नाम का बाबू था... कोई पास में खड़ा आदमी ज़ोर से छींक दे तो बाबू कें-कें करता हुआ खड़ी कार के नीचे छुप जाता था। एक और थे... छोटे छोटे पैरों वाला ब्राउनी... यही नाम बताया था उसने... मगर उसकी कहानी बहुत सैड थी... कहता था पहले किसी बड़े घर में पला था लेकिन फिर हम लोगों में आ गया। अपने पुराने दिनों की बातों का रौब झाड़ता था – अबे जाओ बे... तुम लोगों ने देखा ही क्या है... हम जहां रहते थे वहां हमारे कमरे में एसी लगा था... एसी... सुना है कभी... मैडम थी हमारी एक... रोज़ हमको कार में बैठा कर घुमाया करती थीं... अबे ऐश की है हमने... तुम लोग की तरह नहीं कि गर्मी लगी तो जाकर नाली में लेट गई... अबे हमारा क्लास था... हां मगर पता नहीं एक दिन क्या हुआ कि... हमारी पूरी बॉडी में... कुछ चकत्ते से आ गए... बस उसके बाद मैडम हमें एक दिन घर से बहुत दूर लेकर गयीं... हमें नीचे उतारा... और फिर गाड़ी में बैठ कर ... चली गयीं। हम.. भागे उनके पीछे... बहुत तेज़ भागे... लेकिन... लेकिन कार तेज़ चली गयी... ये बताते हुए उसकी आंखे भीग जाती थीं। ख़ैर, कुछ और दोस्त भी थे... एक कटी हुई दुम वाला मोती भी था, वो बताता था कि शहर में कुछ गुंडे टाइप कुत्तों से झगड़े में उसकी पूंछ कट गई थी और हां, अरे उनका ज़िक्र कैसे भूल सकता हूं... एक और कुत्ता जी थे... उनका नाम था राका दादा... वो बताते थे जवानी में दस-दस कुत्तों को उठा के पटक देते थे तभी से ये नाम पड़ा, आंखों की किनारे वाले बाल सफेद हो गए थे और तजुर्बा तो इतना कि कूड़े के ढेर में क्या-क्या माल है ये सात गली दूर से बता देते थे..

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तो बस यही यार हमारे हमारी दुनिया इन्हीं के साथ खेलते थे, इन्हीं के साथ खाते थे। पर ये पूरा ग्रुप सिंगल्स का था... सब सिंगल ही थे... सिवाए मेरे... मेरा टांगा पिंकी पॉमेरेनियन के साथ भिड़ा हुआ था। पता है कौन थी पिंकी.. अरे इतनी प्यारी थी... इतनी प्यारी थी... क्या बताएं.. घनी-घनी भवें, पतली सी कमर, गले में एक सुनहरे रंग का पट्टा जिस पर लिखा था पिंकी और एक दिल बना था। और साहब यूं इतरे के चलती थी कि... दिल करता था अपने ही दांत से अपनी पूछ चबा लें। पास में एक घर था, अमीर लोग थे... उन्हीं के यहां पली थी.. और सबसे ज़रूरी बात बताएं... वो हमको देख के मुस्कुराती थी।

पता है पहली बार उसे कहां देखा था... हुआ यूं था कि बार हम जब मुहल्ले में आवारगर्दी कर रहे थे कि हमने देखा कि चौराहे के पास, वो फूलों की दुकान के पास एक कार आकर रुकी... कार की विंडो का शीशा नीचे हुआ... ट्यूलिप्स दिखाई प्लीज़ - एक मालकिन की आवाज़ आई। मैंने देखा तो पाया कि मालकिन की गोद में एक सुंदर सी डॉगिया बैठी है... अरे मतलब बहुत आफत... एक नज़र में धाएं से दिल पर गोली लगी... विंडो से खूबसूरत पिंकी पॉमेरेनियन ने बाहर देखा...

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अब हम उसे देख ही रहे थे कि मेरे बगल में आकर मोती खड़ा हुआ... और बोला... अरे काहे खून जला रहे हो बे, अपनी औकात के हिसाब से देखो... मैंने कहा... ऐ मोती... ये पिछली बार तुम्हारी आधी दुम कट गयी थी न झगड़े में, बाकी की आधी हम काट देंगे...  वो बोला, अरे बुरा न मानों भाई लेकिन ये सब बड़े लोग हैं, इनके चक्कर में लबर-लबर न करो, बहुत मारे जाओगे... तभी काले रंग और छोटे-पैर वाला पोपू कान खुजाता हुआ बोला – ऐ.... जे का बात हुई मतलब हैं... मतलब हम लोग गरीब हैं तो हमाई कोई इज्जत नही... नई मतलब जे का बात हुई ... वो गुस्साया तो बाबू जो गांव से आया था.. बोला, अए कहिन देव इन लोगन आए, खुद तो कर नहीं पावत कछू दूसर को भी रोकत, ऐ मोंटी करो तुम, तुम करो आसिकी... राका दादा ने भी सपोर्ट किया.. और क्या, भई किसी का घर बस रहा है तो बसने दो, दूसरे को क्यों खुजली हो

बस वो दिन था कि हमने त कर लिया कि अब चाहे जो हो जाए... पिंकी से मिल कर रहूंगा... अब हम रोज़ उसकी गली में जाने लगे और वो रोज़ाना बालकनी पर खड़ी दिखती थी। उसे देखकर हम ज़मीन पर पीठ के बल लोटने लगते... कि वो हसे... फनी बनने के लिए अपनी ही पूंछ को अपने ही मुंह से पकड़ने की कोशिश करते हुए गोल गोल घूमने लगते... वो हमें देखकर हसंती थी। हमने भौंक कर अपना नाम भी बता दिया उसको... पर एक दिन जब मैं उसकी गली से निकला तो वो मुझे देखकर मुस्कुराई नहीं... मैं रुका और गौर से उसकी तरफ देखा... मैं चौंक गया... उसकी आंखों में आंसू थे।

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दिल किया कि बस इसी वक्त इस दुनिया को फना हो जाना चाहिए... और बचा क्या है अब... जब पिंकी की आंखों में आंसू हैं तो इस दुनिया को बचाने की ज़रूरत ही क्या है... मैंने भौंक कर पूछा...

क्या हुआ... सब ठीक तो है...
उसने बालकनी की ग्रिल से गर्दन बाहर निकाल कर भौंकते हुए जवाब दिया – मोंटी...  मेरी मदद करो... इस घर में मेरा दम घुटता है... प्लीज़.. मुझे ले चले यहां से.. कहीं ले चलो पिंकी ने बताया कि वो थक गई है इन लोगों के शो ऑफ से... ये लोग दुनिया के सामने बहुत बड़े डॉग लवर बनते हैं, स्टेटस के लिए जब कार में निकलते है तो उसे गोद में बैठाकर सहलाते हैं... पर जैसे ही इन्हें फॉरेन ट्रिप पर या किसी दूसरे शहर भी जाना होता है... ये पिंकी को किसी डॉग कीपर के पास छोड़ कर चले जाते हैं... और फिर महीनों पूछते भी नहीं हैं कि वो कैसी है। डॉग कीपर इनका बिल्कुल ख्याल नहीं रखता... मारता पीटता अलग है... बोली... मोंटी.. मैं इस बड़े आलीशान घर मैं कैद हूं। यहां मैडम के एक दोस्त हैं ओबराय साहब, जिनके लिए वो फूल लेकर जाती हैं... ऑबराय साहब का एक जर्मनशेफर्ड कुत्ता है सीज़र.. वो वो मुझसे चेप होता रहता है... मुझे बिल्कुल नहीं पसंद है सीज़र... मैं तो आज़ाद घूमना चाहती हूं, जहां चाहूं जाऊं, जहां चाहूं रुक जाऊं, मिट्टी में लोटना चाहती हूं, नाली में डूबना चाहती हूं बस, किसी के हाथ का पट्टा मेरे गले में न हो.. मैं.. मैं तुम्हारी तरह होना चाहती हूं

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हमने भी चैलेंज ले लिया कि बस... अब कुछ भी हो जाए... पिंकी को यहीं से आज़ाद करवाना है...

अगली सुबह मुझे परेशान देखकर ब्राउनी ने पिछले पैर से अपना कान खुजाते हुए पूछा का हो गया है बे, हैं? काहे बौराए हो तो मैंने कहा कुछ नहीं, वो बोला, अरे बताओ... अरे हम पहले जिस घर में थे न वहां बड़े-बड़े साहब लोग आते थे और उनके साथ साहब टाइप कुत्ते भी.. बहुत जान पहचान है अपनी, कोई काम हो तो करवा दें... मैंने न में सर हिलाया.....ब्राउनी फिर बोला, नूरनगर वाले टू-टू को जानते हो? पहले हमाए साथ रहता था, अब सरकारी नौकरी पा गया है तो हमको मुंह नहीं लगाता...
सरकारी नौकरी? मैने पूछा तो बोला, अरे पुलिस-वुलिस के साथ घूमता है, सूंघने-वूंघने का काम है उसका कुछ... अरे बहुत लोग जानते हैं... तुम बताओ तो काम क्या है, काहे उदास हो

पिंकी पॉमेरेनियन को घर से भगाना है, भगा पाओगे? वो मुस्कुराया और बोला, हो जाएगा काम... लेकिन प्लैन के मुताबिक करना होगा... रात को सोसाइटी की पार्किंग में मिलो, एक आत मोटरसाइकल की सीट का कवर फाड़ेंगे और फिर कार की छत पर आराम से बैठकर बात होगी...

ब्राउनी जितना कॉनफिडेंट था, उससे तो लग रहा था कि उसके प्लैन में कुछ दम है... खैर रात को मीटिंग शुरु हुई और सुबह तक चलती रही। प्लैन ये बना कि मोती बोला... - अबे जब मैडम उसको ले के जा रही होंगी, हम सब एक साथ भभोड़ लेंगे उनको, अपनी पिंकी से कहना की पट्टा छुड़ा के भाग लें, खत्म बात, है कि नहीं... बाबू ने कहा, अरे ऐसा भभोड़ियें कि मैडमे एक दमै घबरा जइयैं, हां, तुम टेंसनाओ नहीं, काम हुई जाब... फिर राका दादा ने भी हामी भर दी।

प्लैन बढ़िया था... हमने पिंकी को भी समझा दिया... जिस दिन ऑपरेशन पिंकी होना था... उस रात हम इतने खुश थे कि मोहल्ले का कोई खंबा सूखा नहीं बचा। तो ख़ैर फिर वो दिन आ गया। हम सब इंतज़ार कर ही रहे थे कि गली से पिंकी की मालकिन की कार निकली... और फूल वाले की दुकान के पास रुकी... शीशा खुला...

एक्सक्यूज़ मी... ऑरकिड्स और लिलीज़ दीजिएगा आज... लास्ट टाइम आपने ट्यूलिप् दिये थे.. दे वर नॉट गुड... कहते हुए वो पिंकी को गोद में लिया हुए बाहर निकलीं...

बस इसी का तो इंतज़ार था हम लोग को... जैसे ही वो बाहर निकलीं... हम चार पांच कुत्ते उनकी तरफ लपके... अऱे वहां चीख पुकार मच गयी... मार पूरा इलाका भों-भों होने लगा... ऐसा लगा जैसे कोई हाई प्रोफाइल किडनैपिंग हो रही है... मैडम घबरा तो गयीं थी, हाथ से पिंका का पट्टा भी छुटने ही वाला था कि तभी वहां... एक जर्मनशिफर्ड ... आ गया...

अरे ई तो ससुरा उही सीजर है... बाबू चीखा तो हमने देखा कि उसके पूछे ऑबराय साहब भी थे हाथ में डंडा लिये...

सीज़र हम पांच मरियल-मरझिल्लों पर लपका, तब हमको उसे करीब से समझने का मौका भी मिल गया। लोगों ने तो उस वक्त सिर्फ कुत्तों की भौं-भौं सुनी होगी... लेकिन हमने सुना – अरे मार दिया रे.... अरे सीज़रवा काट लिस... अरे हमारी तो आधी दुम भी गई आज.. अरे कौन कहता है अपनी गली में कुत्ता शेर होता .. ये तो हमारी गली है... ऐ... ऑबराय साहब का डंडा और सीज़र का जबड़ा हम पर कहर बन कर टूटा... हम जान बचाकर भाग तो आए थे लेकिन पिंकी के सामने इज़्ज़त का बैंड गया था।

 

थोड़ी देर बाद हम सब तीसरी गली के नुक्कड़ पर कूड़े के ढेर के पास मिले... हम सब ज़ख्मी थे... सब अपने अपने ज़ख्म चाट रहे थे और मुझे गाली दे रहे थे। तभी राका दादा.. जो सबसे बुज़ुर्ग थे और कूड़ा सूंघने का तजुर्बा था बोले... मोंटी तुम्हारा काम हो गया है...
-मतलब
? हम सब एक साथ बोले,

उन्होंने कहा, जिस वक्त सब लोग सीज़र को घेरे थे उस वक्त हमने जाकर पिंकी के गले में पड़ा वो पट्टा दातों से चबा डाला... अब वो बहुत नाज़ुक है... एक झटके से टूट जाएगा। पिंकी को बस करना इतना है कि मौका मिलते ही भागकर सीधे हमारे पास चले आना है।

ये सुनकर मेरी आंखों में खुशी के आंसू आ गए... वाकई राका दादा ने दिल जीत लिया था।

बस फिर क्या हम पहुंच गए पिंकी के पास ये बताने के लिए कि अब प्लैन क्या है... पहले तो पिंकी ने मुझे गौर से देखा... यहां-वहां से बाल नुचे हुए थे, पूंछ पर नाखून के निशान थे, सर पर अंडा फूला हुआ था। मैंने उसे जल्दी से सबकछ बता दिया कि तुम्हारा पट्टा कमज़ोर कर दिया गया है। वो खुश हो गयी... बोली घर में किसी पार्टी की तैयारी हो रही है... उसी पार्टी में मैं पट्टा तोड़ के भाग लूंगी...

सारा खेल सेट था अब.... बस इंतज़ार के पल कट नहीं रहे थे... खुशी के मारे हमने यूं ही अजनबियों पर बेवजह भौंकना शुरु कर दिया।


एक दिन मेरे छोटी टांगो वाले मेरे दोस्त पोपू ने कहा, क्या मांटी आज तो पिंकी के घर में दावत है, सुना है बचा हुआ चिकन, खराब ब्रेड और नाश्ते का सामान घर के पीछे वाले कूड़े के ढेर में फेंका जा रहा है, हम तो चले लपेटने.. राका दादा भी वहीं हैं..

- नहीं तुम लोग जाओ.. मैं आता हूं... मैंने कहा, और वो लोग चले गए... मैं वहां से गया उस जगह जहां फक्शन हो रहा था... क्योंकि वही से तो पिंकी को भागना था... मैं पहुंचा तो देखा कि हर तरफ सजावट थी। बिजली की लड़ियां चमक रही थीं, सजे-धजे लोग आ जा रहे थे। मैं वहीं खड़े होकर पिंकी का इंतज़ार करने लगा। एक घंटा गुज़रा, दो घंटा गुज़रा... लेकिन पिंकी नहीं दिखी.. थोड़ी देर में गेट पर सन्नाटा होने लगा...

तभी क्या देखता हूं कि एक सजी-धजी कार गेट से निकली, लोग हाथ हिलाकर बाए-बाए कह रहे थे। अरे ये तो पिंकी की मैडम और उनके बगल में दूल्हा बने बैठे थे ऑबराय साहब... और दोनों की गोद में अपना अपना कुत्ता था... यानि पिंकी और सीज़र... पर ये क्या... पिंकी सीज़र के साथ पूछ हिलाती हुई काफी खुश लग रही थी। पिक्की ने मेरी तरफ देखा... और हुंह करके सीज़र को चाटने लगी...

मैं गुस्से में चीखा... कार के पीछे भागा... लेकिन फिर कार आंखों से ओझल हो गयी...

बस हुई गा भैय्या? तभी बाबू ने कहा कह रहे थे कि इन बड़े लोगन के चक्कर में न पड़ौ... अब का यहां खड़े हो, लड़की तो गई, चिकनौ हाथ से जाएगा.. चलौ

इस बात को बहुत साल गुज़र चुके हैं... पर आज भी हम किसी कार को जाते देखते हैं... तो उसके पीछे भागते हैं.... ये सोचकर कि कहीं उसमें हमारी पिंकी तो नहीं....

 

(पूरी कहानी सुनने के लिए ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक करें या फिर SPOTIFY, APPLE PODCAST, GOOGLE PODCAST, JIO-SAAVN, WYNK MUSIC में से जो भी आप के फोन में हो, उसमें सर्च करें STORYBOX WITH JAMSHED)

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