बेपर्दा कल जो आईं नज़र चंद बीवियां,
‘अकबर’ ज़मीं में गैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया.
पूछा जो मैंने, आपका पर्दा वो क्या हुआ,
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया.
अच्छा हुआ कि ये कहकर दुनिया से विदा हो गए अकबर इलाहाबादी, क्योंकि आज अगर जिंदा होते तो झल्ला के मर जाते, या गश खाकर मर जाते, और तब पर्दा पड़ने वाली लाइन को वो कुछ यूं लिखते कि ‘पूछा जो मैंने, आपका पर्दा वो क्या हुआ, कहने लगे कि अक्ल पे उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के पड़ गया.’
और वो ऐसा क्यों लिखते, इसको यूं समझिए, कि तंज़ो-मिजाह की शायरी में सरे-फेहरिस्त का मुकाम हासिल करने वाले अकबर इलाहाबादी का नाम बदलकर अकबर प्रयागराजी कर दिया गया है, और ये किया है उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग उत्तर प्रदेश ने. तो कोई जाए और इलाहाबाद के हिम्मतगंज में काला डांडा कब्रिस्तान में स्थित अकबर इलाहाबादी की कब्र में फूंक आए कि अकबर इलाहाबादी अब तुम अकबर इलाहाबादी नहीं रहे अकबर प्रयागराजी हो गए हो.
मतलब जैसे फैजाबाद अयोध्या हो गया, पनकी, पनकी धाम हो गया, मुगलसराय दीन दयाल उपाध्याय हो गया, हबीबगंज रानी दुर्गावती हो गया, गोरखपुर का उर्दू बजार हिंदू बाजार हो गया, मियां बाजार माया बाजार हो गया और तो और जैसे वसीम रिजवी का नाम जितेंद्र नारायण सिंह त्यागी हो गया बिल्कुल वैसे ही अकबर इलाहाबादी का नाम अकबर प्रयागराजी हो गया.... यकीन न हो तो उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (यूपीएचईएससी) की वेबसाइट के ‘अबाउट इलाहाबाद’ वाले कॉलम में जाकर देख आइए.
अकबर इलाहाबादी जिस दौर में शायरी कर रहे थे उस दौर में ज्यादातर शायर शराबो-शबाब, हुस्न, दरिया समंदर लिख रहे थे, कहीं जुल्फों को खम किया जा रहा था, कहीं पत्थरों को नम किया जा रहा था. राजाओं की जी हुजूरी हर्फ-हर्फ में बहती थी. उर्दू शायरी इश्को-माशूक के इर्द गिर्द ही लहराती बलखाती थी. उर्दू शायरी के इस मिथक को अकबर इलाहाबादी ने सबसे पहले तोड़ा और सिर्फ तोड़ा ही नहीं बल्कि राजाओं के दरबारों में मौजूद रहकर उनका गुणगान करने वाले शायरों की शायरी के सामने नजीर पेश की. अंग्रेजों की हुकूमत में न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग में नौकरी करते हुए अंग्रेजों की बखिया उधेड़ने वाले शायर का नाम था अकबर इलाहाबादी.
पता नहीं यूपीएचईएससी वालों को मालूम है कि नहीं, मगर उन्हें मालूम होना चाहिए कि 1892 में अकबर इलाहाबादी अदालत खफीफा के जज बनाए गए थे. 1894 में वे डिस्ट्रिक सेशन के जज बने थे. आज मजाल है कि किसी पूर्व जज के खिलाफ भी कोई तिनके भर का सवाल उठा दे, नाम बदलना तो बहुत दूर की बात है. वैसे यूपीएचईएससी वालों की मेहरबानी से एक बात और हुई है कि अकबर इलाहाबादी भारत के पहले ऐसे पूर्व जज हो गए जिनकी मौत के 100 साल बाद उनका नाम बदल दिया गया. उर्दू शायरी की दुनिया में अकबर इलाहाबादी ने अपना नाम खुद कमाया था. अइसे ही नहीं कहा जाता कि फलां काम न कर पाऊं तो मेरा नाम बदल देना. पता नहीं नीति नियंताओं ने क्या सोचकर नया नामकरण किया है मगर अकबर इलाहाबादी लिख गए हैं कि
चश्मे जहां से हालतें असली नहीं छुपती,
अखबार में जो चाहिए वह छाप दीजिए.
एक बात और, अकबर इलाहाबादी के साथ साथ तेग इलाहाबादी का नाम बदलकर तेग प्रयागराजी और राशिद इलाहाबादी का नाम बदलकर राशिद प्रयागराजी कर दिया गया है. बदलाव की हवा ठंडी भी है और तेज भी. मौसम मस्त है. नाम बदलने वाली सियासत के मजे उठाइए, और इलाहाबादी अमरूद खाइए...माफ कीजिए प्रयागराजी अमरूद खाइए.
अजित त्रिपाठी