किताब का नाम: निर्वासन
लेखक: तसलीमा नसरीन
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
कीमत: हार्ड बाउंड एडिशन 395 रुपये
एक औरत, जो उस दुनिया को नामंजूर कर देती है, जिसको छोड़ने या जिससे पीछे हटने से, उसको जिल्लत और धोखा मिला. एक औरत जो इनकार कर देती है समाज के आदेशों, उसकी रीति-रिवाजों और परम्पराओं को मानने से. एक औरत जिसका बार-बार लड़खड़ाना, गिरना, फेंका जाना सिखाता है उसे, सीधे खड़े होना, जिसके लड़खड़ाते कदम सिखाते हैं उसे चलना, जिसकी भटकन दिखाती है उसे रास्ता. धीरे-धीरे वह महसूस करती है अपने अंदर एक नयी चेतना के विकास को, एक साधारण सा विचार बांध लेता है उसे- 'यह जिंदगी उसकी खुद की है, किसी और की नहीं. वह सिर्फ खुद ही उस पर राज कर सकती है, कोई दूसरा नहीं'. यह उस लड़की की कहानी है जो निकल आई है पितृसत्ता की भट्टी से, चमकते स्टील की तरह. यह कहानी है तसलीमा नसरीन की.
तसलीमा नसरीन भारत में अपने उपन्यास 'लज्जा' के कारण चर्चा में आई थीं. इस उपन्यास के छपने के बाद तस्लीमा को कई तरह की बंदिशो से दो-चार होना पड़ा. अपने इस दर्द को वह शायद ही भूल पाएंगी. इसके विषय में वह अपनी आत्मकथा 'निर्वासन' में कुछ इस तरह बयां करती हैं, '...वास्तविक दुनिया में एक हाड़-मांस की औरत के लिए मनाही है दावा करने और ढिठाई से घोषणा करने की- मैं वो लड़की हूं जो उन विगत दुखदायी, अशांत वर्षों के बाद, आज फिर से उठ खड़ी हुई हूं. मैंने प्रण किया है ऐसी जिंदगी जीने का, जैसा कि मैं चाहती हूं. क्यूं दुनिया स्वीकार करेगी ऐसे साहस को? किसी भी औरत को ऐसी स्पर्धा शोभा नहीं देती. मैं सर्वथा अनुपयुक्त हूं, इस पितृसत्तामक समाज के लिए. ...अपने देश, बांग्लादेश में, मेरे अपने पश्चिम बंगाल में, मैं एक निषिद्ध नाम हूं, एक विधि बहिष्कृत औरत, एक वर्जित किताब. कोई मेरा नाम नहीं उच्चार सकता, मुझे छू या पढ़ सकता है. अगर वे ऐसा करते हैं तो उनकी जुबानें सड़ जाएंगी, हाथ गंदे हो जाएंगे, गहरी घृणा से भर जाएंगे. मैं इसी तरह की हूं और यही रास्ता चुना है मैंने'. तसलीमा की अभी तक की जीवन यात्रा आत्मकथा के रूप में आ चुकी है. 'निर्वासन' उस सीरीज का 7वां भाग है.
'निर्वासन' में तसलीमा ने अपने अनुभव, दर्द, अपने जानने वालों से मिला धोखा, आरोप और राजनीति की तमाम बातें किस्तों में रखने की कोशिश की है. आत्मकथा के इस भाग में तसलीमा ने बांग्ला साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति और वहां के कई साहित्यकारों के साथ अपने बेबाक संबंधों पर बयान तथा अपने निर्वासन के दौर का ब्योरा पेश किया है.
यह किताबों के नहीं, तसलीमा के जिंदगी के पृष्ठ है. इन पर लिखा हुआ केवल वो लोग समझ सकते हैं जिन्होंने जिंदगी के बवंडर को अपने शरीर पर झेला है. किसी व्यक्ति या समाज का इतिहास पन्नों पर दर्ज होने से पहले किन-किन रास्तों से गुजरता है, अगर जानना समझना हो तो इस पुस्तक को जरूर पढ़ें. ऐसी पुस्तकें तत्कालीन समाज और उसके तथाकथित बुद्धिजीवियों के सोचने, राय व्यक्त करने के तरीकों की पड़ताल करने का काम करती है.
मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई इस पुस्तक का अनुवाद किया है अमृता बेरा ने. काफी बेहतरीन अनुवाद है. भाषा में काफी प्रवाह है. आप इसे एक बेहतरीन अनुवाद की श्रेणी में रख सकते हैं.
पुस्तक न पढ़ने के कई कारण हो सकते हैं. अगर किसी की निजी जीवन में आपकी दिलचस्पी न हो, चाहे वह तसलीमा नसरीन ही क्यों न हो, आप उनके विवाद और उस समय उनकी मानसिक स्थिति क्या थी, यह जानने में दिलचस्पी न रखते हों, समाज के बुद्धिजीवी ऐसे मसलों पर क्या राय रखते हैं, यह जानने में रुचि न हो तो इस पुस्तक को ना पढ़ें.