सत्ता के सामने सच बोलना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. आज के भारत में बोलने की आजादी के मसले पर साहित्य आजतक 'इंग्लिश' में चर्चा करते हुए कई पत्रकारों-एक्टिविस्ट ने यह बात कही. लेखक और एक्टिविस्ट हर्ष मंदर ने कहा कि हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं, जब सच बाेलना बहुत महत्वपूर्ण होता जा रहा है, लेकिन यह बहुत कठिन भी होता जा रहा है.
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नेपाल से आए पत्रकार कनक मणि दीक्षित ने इस पर सहमति जताते हुए कहा, 'भारत से बाहर रहकर जब हम देखते हैं तो हालात बहुत बुरे दिखते हैं. मानवाधिकार वकील नंदिता हक्सर ने भी हालात को बहुत गंभीर बताते हुए कहा कि पहले सत्ता के सामने सच बोलना आसान था.
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हर्ष मंदर ने कहा, 'आज सत्ता को सच बताना सबसे क्रांतिकारी जन सेवा हो गई है जो कोई कर सकता है.' मंदर ने इस मामले में खुलकर बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने हाल का आम चुनाव 'बाहुबली राष्ट्रवादी हिंदुत्व' के बल पर जीता है जो घृणा पर आधारित है.
कनक मणि दीक्षित ने कहा कि पत्रकारों में सेल्फ सेंसरशिप पूरे दक्षिण एशिया में आम है और यह भारत में बहुत ज्यादा है.
पहले आसान था सत्ता के सामने सच बोलना
नंदिता हक्सर ने बताया कि पहले किस तरह से सत्ता के सामने सच बोलना आसान होता था. उन्होंने कहा कि यह इसलिए था क्योंकि पहले कई तरह के आंदोलन थे जो अब कमजोर पड़ गए हैं. अब ज्यादा से ज्यादा एक्टिविस्ट चुप हो रहे हैं और यह बहुत गंभीर स्थिति है.
मुस्लिम पहचान से ही डर लगता है!
साहित्य आजतक के दूसरे दिन यानी शनिवार को आयोजित एक सत्र में कश्मीरी पत्रकार और शिक्षाविद शहनाज बशीर ने कहा कि आज हालत यह है कि किसी मुस्लिम लेखक की नियति इससे तय होती है कि वह दूसरे राज्य में जाने पर कितना डरता है.
उन्होंने कहा कि डर तो इसी बात से लगता है, जब कोई यह पूछता है, 'क्या आप मुस्लिम हो.'
साहित्य आजतक के मंच पर कश्मीरी पत्रकार शहनाज बशीर और लेखिका नाजिया इरुम (फोटो: विक्रम शर्मा)
उन्होंने कहा, 'जब कोई यह बताता है कि वह मुस्लिम है, तो तत्काल लोग उसके बारे में धारणा बना लेते हैं.' उन्होंने कहा कि इस्लाम का जो ज्ञान उन्होंने हासिल किया है, उसके मुताबिक एक अच्छा मुस्लिम उसे कहते हैं जो मानव जीवन का सम्मान करता हो. जब तक कोई किसी व्यक्ति को या उसके सम्मान को नुकसान न पहुंचाता हो, तब तक वह मुस्लिम है.
लेखिका नाजिया इरुम ने कहा कि बात इस पर होनी चाहिए कि कौन अच्छा या बुरा इंसान है, बजाय इस पर बात करने के कि किसी का धर्म क्या है.
'अपठनीय' है शेक्सपियर का लेखन!
साहित्य आजतक 'इंग्लिश' के एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र में पूर्व नौकरशाह और चर्चित लेखक उपमन्यु चटर्जी ने कहा कि विलियम शेक्सपियर का नाटक 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' उनके हिसाब से 'अपठनीय' है. उन्होंने कहा, 'जब मैंने 30 साल पहले पहली बार ओथेलो पढ़ा, तो यह मुझे विचित्र लगा. हम स्कूल में शेक्सपियर से पीड़ित थे. मर्चेंट ऑफ वेनिस अपठनीय है और समय खाता है. मेरे बच्चे तो ओथेलो से चिढ़ते हैं.'
साहित्य आजतक के मंच पर पूर्व नौकरशाह और लेखक उपमन्यु चटर्जी
गौरतलब है कि साहित्य का सबसे बड़ा महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' शुक्रवार से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में शुरू हुआ है. आज साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति के इस जलसे का अंतिम दिन है. तीन दिन तक चलने वाले साहित्य के महाकुंभ साहित्य आजतक में कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति और सिनेमा जगत की मशहूर हस्तियां शामिल हो रही हैं. बता दें कि साल 2016 में पहली बार 'साहित्य आजतक' की शुरुआत हुई थी.