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जतन हजार करो फिर भी बच निकलता है: साहित्य आजतक में अकील नोमानी

जतन हजार करो फिर भी बच निकलता है: साहित्य आजतक में अकील नोमानी

जतन हजार करो फिर भी बच निकलता है, हरेक दर्द कहां आंसुओं में ढलता है. बिछड़ने वाले किसी दिन ये देखने आ जा, चिराग कैसे हवा के बगैर जलता है. ये वहम मुझको किसी रोज मार डालेगा, कि एक शख्स मेरे साथसाथ चलता है....सुनिए साहित्य आजतक के मंच पर अकील नोमानी की शायरी

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