बसंत पंचमी के अवसर पर बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला में पूजा-अर्चना की. इस दौरान भोजशाला परिसर में भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई. भोजशाला एक मध्यकालीन स्मारक है, जिस पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही अपना दावा करते हैं.
भोजशाला में हिंदू संगठन सोमवार से 4 दिवसीय बसंत उत्सव मना रहे हैं. भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने बताया कि भोजशाला में सुबह से ही पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी. यहां हवन कुंड जलाया गया और उसमें आहुति दी गई.
गोपाल शर्मा ने बताया कि उदयाजीराव चौक से शोभा यात्रा निकाली जाएगी, जिसके बाद मां वाग्देवी (सरस्वती) की महाआरती होगी. शर्मा ने बताया कि राजा भोज ने वर्ष 1034 में इसी दिन मंदिर के गर्भगृह में मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित कर सरस्वती जन्मोत्सव मनाना शुरू किया था. उन्होंने बताया कि पूरा हिंदू समाज इसी परंपरा को बड़े उत्साह से मनाता आ रहा है. यह इस उत्सव का 991वां वर्ष है.
पिछले साल 11 मार्च को 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की अर्जी पर MP हाईकोर्ट ने एएसआई को परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था. करीब तीन महीने तक चले सर्वेक्षण के बाद एएसआई ने जुलाई में 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी.
बता दें कि एएसआई के एक आदेश के अनुसार हिंदुओं को मंगलवार को भोजशाला में पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिम शुक्रवार को वहां नमाज अदा कर सकते हैं.
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने अपनी याचिका में इस व्यवस्था को चुनौती दी थी. पिछले साल हिंदू याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें 1 अप्रैल को दिए गए स्टे को हटाने का अनुरोध किया गया था, जिसमें भोजशाला पर एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर कोई भी कार्रवाई करने पर रोक लगाई गई थी.
याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने सोमवार को बताया कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई इस महीने के अंत में 17 फरवरी को करेगा. गोयल ने कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में मांग की थी कि एएसआई की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए. उन्होंने कहा कि अगली सुनवाई में हम सुप्रीम कोर्ट से रोक हटाने का आग्रह करेंगे.
भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई संरक्षित 11वीं शताब्दी का स्मारक है. हिंदू मानते हैं कि यह देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है और मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है. एएसआई ने पिछले साल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था.