मध्य प्रदेश के इंदौर में ऐतिहासिक रेजीडेंसी कोठी का नाम छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर रखने के फैसले का कुछ लोगों ने विरोध किया है. कुछ लोगों ने मांग की है कि इसका नाम होल्कर वंश की शासक देवी अहिल्याबाई के नाम पर रखा जाए. 200 साल पुरानी इस इमारत ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों की वीरता को देखा था. यह इंदौर की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, जिसमें शहर में आने वाले वीआईपी लोगों को ठहराया जाता है और जरूरी सरकारी बैठकें आयोजित की जाती हैं.
पुण्यश्लोक संस्था के प्रमुख जतिन थोरात ने एक न्यूज एजेंसी से कहा, "हम छत्रपति शिवाजी महाराज का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन इस साल देवी अहिल्याबाई की 300वीं जयंती पूरे देश में मनाई जा रही है. इसलिए हम इंदौर नगर निगम से मांग करते हैं कि रेजीडेंसी कोठी का नाम देवी अहिल्याबाई होलकर विश्राम गृह रखा जाए."
उन्होंने कहा कि उनकी मांग के संबंध में नगर निगम प्रशासन को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा जाएगा और आगे की कार्रवाई जवाब पर निर्भर करेगी. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि संगठन के सदस्यों ने दिन में एक बैनर लगाया, जिसमें इमारत को 'देवी अहिल्या बाई कोठी' बताया गया.
मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि रेजीडेंसी कोठी का नाम बदलकर शिवाजी कोठी करने का फैसला मेयर काउंसिल (MIC) ने निवासियों के सुझावों के आधार पर सर्वसम्मति से लिया.
इतिहासकार जफर अंसारी ने कहा कि रेजीडेंसी कोठी का निर्माण ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1820 में शुरू किया था, इसमें रहने वाले ब्रिटिश अधिकारी यहीं से मध्य भारत की सभी रियासतों को नियंत्रित करते थे.
अंसारी ने कहा, "1 जुलाई, 1857 को क्रांतिकारी सआदत खान और उनके सशस्त्र साथियों ने रेजीडेंसी कोठी पर भीषण हमला किया, इसके प्रवेश द्वार को ध्वस्त कर दिया और इमारत पर कब्जा कर लिया. क्रांतिकारियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा उतार दिया और उस पर होल्कर राजवंश का झंडा फहरा दिया."
अंसारी ने कहा, "सआदत खान को 1874 में तत्कालीन राजपूताना (अब राजस्थान में) से गिरफ्तार किया गया था, उस साल 1 अक्टूबर को रेजीडेंसी कोठी परिसर में उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी दे दी गई."