
ग्वालियर में दशहरा के मौके पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का शाही लुक देखने को मिला. शमी पूजन के मौके पर राजशाही पोषाक में सिंधिया ने दरबार भी लगाया. इस दौरान उन्होंने देश में सुख-शांति की कामना की.
परंपरागत वेश-भूषा में ज्योतिरादित्य सिंधिया शमी पूजन स्थल मांढरे की माता पर पहुंचे. लोगों से मिलने के बाद उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा की. इसके बाद म्यांन से तलवार निकालकर जैसे ही शमी वृक्ष को लगाई, हजारों की तादाद में मौजूद लोग पत्तियां लूटने के लिए टूट पड़े. लोग पत्तियों को सोने के प्रतीक के रूप में अपने साथ ले जाते हैं.
सिंधिया परिवार के मराठा सरदारों के मुताबिक, दशहरे पर शमी पूजन की परंपरा सदियों पुरानी है. उस वक्त महाराजा अपने लाव-लश्कर व सरदारों के साथ महल से निकलते थे. सवारी गोरखी पहुंचती थी. यहां देव दर्शन के बाद शस्त्रों की पूजा होती थी. दोपहर तक यह सिलसिला चलता था. महाराज आते वक्त बग्घी पर सवार रहते थे. लौटते समय हाथी के हौदे पर बैठकर जाते थे. शाम को शमी वृक्ष की पूजा के बाद महाराज गोरखी में देव दर्शन के लिए जाते थे. वही परंपरा आज भी जारी है.
इसी परंपरा के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंदिर में विधि-विधान से पूजा की. इस दौरान मराठा सरदार भी उनके साथ रहे. पूजा के बाद सिंधिया जयविलास पैलेस पहुंचे और दरबार लगाया. इस दरबार में मराठा सरदारों के वंशजों को ही प्रवेश की अनुमति होती है. हालांकि, अब कुछ गणमान्य नागरिकों को भी इस शाही दरबार में आमंत्रित किया जाता है.
दशहरे की शाम ज्योतिरादित्य ने मांढरे की माता मंदिर में कुलदेवी का आशीर्वाद लिया. इसके बाद उन्होंने शमी पूजन किया. शमी पूजन के बाद जैसे ही ज्योतिरादित्य ने शमी वृक्ष से तलवार छुआई, लोग उसके पत्ते लूटने के लिए टूट पड़े.
ऐसी मान्यता है कि दशहरे के दिन राजा बलि ने अपनी प्रजा को शमी वृक्ष पर बैठकर स्वर्ण मुद्राओं के रूप में अपना पूरा खजाना बांट दिया था. इसे प्रतीक के तौर पर सिंधिया राजवंश परंपरा का निर्वाह करता आ रहा है.