एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस आ गया. आज़ादी के बाद से लगातार आ रहा है, फिर भी पहचानना पड़ता है कि 15 अगस्त हमारा राष्ट्रीय पर्व है. इसका बहुत महत्व है. इसका सबसे ज्यादा महत्व फिल्मवालों के लिए है. यदि यह दिन नहीं होता तो वे देशभक्ति की बातें किस माध्यम से कहते यह बहुत ही ज्वलनशील प्रश्न है.
फिल्मवालों ने इस दिन के माध्यम से इतनी देशभक्ति दिखाई है कि खु़द देश की आत्मा तक कांप उठी है. एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार का योगदान इस क्षेत्र में अद्भुत है. अतुलनीय है और अविस्मरणीय वगैरह भी है. उन्होंने भारत कुमार नामक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निजी तौर पर देश को सौंपा है. बॉलीवुड ने भी उनकी तर्ज़ पर क्रांतिवीर नाना पाटेकर फिल्म इंडस्ट्री को प्रचंड प्रयासों से लाकर प्रदान किया है. कई फिल्म निर्माताओं और नायकों ने भी अपना जीवन इसी देशभक्ति के नाम पर होम किया है. वो बात अलग है कि इस होम करने की प्रक्रिया में केवल उनके Home ही बड़े बंगलों में बदले हैं.
सिनेमावालों की ही तरह म्यूजिक कंपनीवालों के लिए भी इस दिन का ख़तरनाक महत्व है. वे इस दिन इतनी-इतनी आवाजों में इतनी-इतनी देशभक्ति पूरे देश में वितरित करते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर कान को काम मिल जाता है. सुबह जोश और जुनून से शुरू हुआ देशभक्ति का एक-एक गाना शाम तक इतनी भयानक आवाजों में पहुंच जाता है कि बेचारा गाना तक अपनी हालत को लेकर द्रवित हो जाता है. साउंड बॉक्स के आंसू गिरते हैं, लाउडस्पीकर रोने लगते हैं. लेकिन कोई देख नहीं पाता. ख़ैर जाने दीजिए हां, इसी बीच आम आदमी भी लगे हाथों इमोशनल होने का थोड़ा-बहुत काम निपटा लेता है.
इस दिन सरकार भी सरकारी भवनों को रोशन कर देती है. इस माध्यम से दिन में स्वतंत्रता का महत्व ठीक से नहीं समझ सके लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे अब रात की रोशनी में ‘इस उजले दिन’ के बारे में समझशीलता की सारी हदें तोड़ दें. हो सके तो विचारशीलता की सारी दीवारें भी फोड़ दें. हो सके तो ज्ञानशीलता के साथ ख़ुद के छोड़कर पूरे संसार को यह ज्ञान प्रदान कर दें.
कर्मचारियों के दिलों में भी छुट्टी वाले इस दिन का बड़ा महत्व है. वे इस दिन को पूरा आदर देकर अपनी नींद निकालते हैं.आलू-प्याज-किराना लाकर घर में पटकते हैं. दोपहर को टीवी पर आ रही देशभक्ति की फिल्म के माध्यम से फिल्मी शहीदों को आदरांजलि भी देते हैं. नेट फ्लिक्स पर दूसरे देशों की देशभक्ति भरी पिच्चरें देखकर हाय-हाय करते हैं. देशभक्ति की दिशा में आंखें फाड़कर उनकी हीरोइनों के प्रयास देखते हैं. हमारे देश की देशभक्ति में इतना ग्लैमर न होने के लिए आहें भरते हैं. आहें भरते-भरते रूटीन काम को यादकर बच्चों को कूटने का पेंडिंग कर्म भी निपटाते हैं. फिर सुकून से दोस्त के घर गप्पें लड़ाने के लिए निकल जाते हैं. पूरे कार्यों के दौरान इस दिन का महत्व उनके दिमाग में लगातार बना रहता है. वे इस दिन के हर पल को पूरी देशभक्ति के साथ निचोड़ लेने पर बल देते हैं.
इसी तरह कई होनहार बेटे-बेटियों के लिए के लिए इस दिन का जबरा महत्व है. इस दिन वे फुर्सत पाकर अपना राष्ट्रीय कर्तव्य निभाते हैं. पार्क-दुकान,ज़मीन-मकान,आकाश-पताल,जल-जंगल,नाली-नल यानी इस धरा के हर कण और क्षण पर रील बनाकर अपने कर्तव्य की आहुति देते हैं. फिर आराम से बैठकर दूसरे के ऐसे ही कण और क्षण पर किए गए प्रयासों को देखते हैं. उसे देखकर अपने कैमरे की घटिया क्वालिटी और उसके टैलेंट के घटियापन पर हर एंगल से बिसूरते हैं.
मांओं-पत्नियों के लिए यह दिन खटने के लिए होता है. पति-बच्चे बैठे-बैठे लगातार पोहे-पकौड़े की फ़रमाइशें करते रहते हैं. वे ना तो अपना पंसदीदा सीरियल देख पाती हैं न ही पड़ोसन से गप्पें लगाने का नियमित आयोजन पूरा कर पाती हैं. इसी तरह बुजुर्गों के लिए इस दिन का अत्यधिक महत्व है. पूरा दिन वे टीवी देखने,अखबार पढ़ने और खांसने की गतिविधि को समर्पित करते हैं, जैसा कि वे रोज़ करते हैं. इस दिन अतिरिक्त गतिविधि के अंतर्गत खांसी के साथ गौरवशाली अतीत की जुगलबंदी पेश करते हैं. बेटा खांसी के चलते उनसे दूरी बनाता है, पोता स्वर्णिम अतीत की जुगलबंदी से बचने के लिए उनसे कन्नी काटता है. दोनों ही मामलों में उनकी वर्तमान को कोसने की व्यस्तता बढ़ जाती है.
तो इस तरह रील और रियल में उलझे हुए हम, पूरे दिन की उमंग और तरंग में इस मामूली बात को भूल जाते हैं...कि इस दिन हजारों शहीदों के बलिदान से हमें आज़ादी मिली थी, बस!