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एनिमल की 'प्रेम और हिंसा' में क्या तलाश रहा हमारा समाज? फिल्में और वेब सीरीज ओशो और मनोविज्ञान के नजरिए से

एनिमल फिल्म के हिंसक सीन्स के पक्ष में ये कहा जा रहा है कि ये रील स्टोरी वाली हिंसा आज के समाज की सच्ची तस्वीर दिखा रही है. साहित्य और सिनेमा को समाज की सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए और इस फिल्म में यही दिखाया गया है. जो सच है उसे दिखाने में गलत क्या है? ये तर्क दिया जा रहा है कि अगर सुधारना है तो समाज में हो रही असली हिंसा के हालात को सुधारा जाना चाहिए.

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रणबीर कपूर की फिल्म एनिमल इन दिनों चर्चा में है.
रणबीर कपूर की फिल्म एनिमल इन दिनों चर्चा में है.

सीन नंबर-1
एक टीनएज लड़का बुली करने वाले क्लासमेट्स को डराने के लिए स्कूल में ऑटेमेटिक गन लेकर पहुंच जाता है, और हर तरफ खौफ पैदा कर देता है...

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सीन नंबर-2
एक शख्स हाथ में कुल्हाड़ी लेकर दुश्मनों की भीड़ को काटते चला जाता है. हर तरफ गिरते सिर-हाथ-पैर, बहता खून और लाशों के ढेर...

सीन नंबर-3
वही आदमी बंदूक से लोगों के प्राइवेट पार्ट्स पर गोलियां बरसा रहा है, एक लड़की के अंडरगारमेंट खींचकर उसे छेड़ता दिख रहा है.

सीन नंबर-4
एक दूसरा शख्स अपनी शादी के मंडप में पहले मर्डर करता हुआ दिखता है फिर गेस्ट के सामने ही अपनी नई-नवेली पत्नी के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध स्थापित करता है. इस सीन को मैरिटल रेप की कटेगरी में रखा जा सकता है...

ये सारे सीन वासेपुर टाइप किसी गैंग की रियल स्टोरी की नहीं हैं बल्कि हाल में आई बॉलीवुड फिल्म एनिमल की रील स्टोरी है जिसपर आजकल हर तरफ चर्चा हो रही है. दरअसल, बॉलीवुड यानी हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री की एक फिल्म आई है एनिमल... रणबीर कपूर, बॉबी देओल, रश्मिका मंदाना की एक्टिंग वाली इस फिल्म की आज हर ओर चर्चा है. सोशल मीडिया हो, व्हाट्सऐप ग्रुप्स हों या घरों की ड्राइंग रूम... हर जगह इस फिल्म को लेकर बातें हो रही हैं. एक ही परिवार में कोई इसका फैन है तो कोई इसके खिलाफ बोलता दिख रहा है. इसमें दिखाए गए फैमिली बॉन्ड और मेल शॉवेनिज्म के सीन्स की जितनी चर्चा है उतनी ही चर्चा इसमें परोसी गई हिंसा की भी है. देश की संसद तक में इस फिल्म में दिखाए गए हिंसक सीन्स की बात उठ चुकी है.

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सोशल मीडिया पर जहां एक तरफ युवा परिवार के लिए कुछ भी कर गुजरने जैसे डायलॉग्स दोहरा रहे हैं वहीं दूसरा तबका इसके हिंसक सीन, महिलाओं को जूते की नोंक पर रखने वाली सोच, हिंसा-खूनखराबे को समाज का छुपा हुआ सच ठहराने में बिजी है. कुछ लोग फिल्मों और वेब सीरीज में दिखाए जा रहे असीमित हिंसक सीन्स पर कंट्रोल की बातें भी कर रहे हैं. लेकिन समाज, सिस्टम और हमारी सोच के लिहाज से कुछ बुनियादी बातें हैं जो इन सारी चिंताओं से अलग सीन सामने रखती है.

पहली चर्चा समाज की

इस फिल्म के हिंसक सीन्स के पक्ष में ये कहा जा रहा है कि ये रील स्टोरी वाली हिंसा आज के समाज की सच्ची तस्वीर दिखा रही है. साहित्य और सिनेमा को समाज की सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए और इस फिल्म में यही दिखाया गया है. जो सच है उसे दिखाने में गलत क्या है? ये तर्क दिया जा रहा है कि अगर सुधारना है तो समाज में हो रही असली हिंसा के हालात को सुधारा जाना चाहिए. यकीन न हो तो रोज अखबारों के पन्ने उठाकर देख लीजिए. बर्बर हत्या, रेप, टॉर्चर, किडनैपिंग, अत्याचार, साइबर फ्रॉड की खबरों से अखबारों के पन्ने भरे मिलेंगे. तो जब समाज में ये सब हो रहा है तो सिर्फ सिनेमा में नहीं दिखाने से क्या हम समाज को बचा सकेंगे? जाहिर है इस पक्ष के लोगों के तर्क भी गलत नहीं हैं.

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फोटो- एनिमल फिल्म से

दूसरी चर्चा सिस्टम की

आखिर जिस असीमित हिंसा वाले सीन पर हमारे बीच कई लोग चिंतिंत हैं क्या वो सेंसर बोर्ड से गुजरकर, पास होकर नहीं आए हैं? अगर इन्हें पास नहीं होना चाहिए था तो फिर सेंसर बोर्ड में कैसे पास हुआ? क्या सिर्फ A सर्टिफिकेट दे देने से इस तरह की सिनेमा को सिनेमा हॉल्स में लग जाने की मंजूरी मिल जानी चाहिए? जहां लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ फिल्म देखने जा रहे हैं. भारत ही नहीं ब्रिटेन में भी इस फिल्म को 18+ कटेगरी में रखा गया है. फिल्म का ये लेवल तब है जब भारत में सेंसर बोर्ड ने कम से कम 5 कट लगवाए और कई सीन बदलवा दिए थे.

तीसरी चर्चा हमारी सोच की

एक बार को मान भी लिया जाए कि समाज और सिस्टम इसे फिल्टर करने में फेल रहे तो आखिरी कड़ी यानी हमने क्या किया? ये फिल्म इतनी ज्यादा पॉपुलर हो चुकी है कि हिंदी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 10 सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली फिल्मों में जगह बना चुकी है. भारत के अंदर और वर्ल्डवाइड इसकी कमाई 800 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी है. फिल्म की थीम और हिंसा को अगर अच्छे-बुरे के नजरिये से देखना बंद कर दें तो पॉपुलर तो हमने ही किया है न. इस फिल्म के हिंदी ट्रेलर को ही यू-ट्यूब पर 9 करोड़ बार देखा गया. फिल्म इंडस्ट्री का काम है फिल्म बनाना, उसे दर्शकों के सामने पेश करना. उसे देखना चुनने और न चुनने का विकल्प हमारे पास है और हमने इसे देखा है तो जाहिर सी बात है कि हमें तो स्वीकार्य है ही. गलत-सही की बहस अलग से होती रहेगी.

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वेब सीरीज की आंधी भारत में कब से शुरू हुई?

यह फिल्म 'एनिमल' हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रोडक्शन को वेब सीरीज का टच देती है. हालांकि, ये बॉलीवुड के लिए नया नहीं है. गैंग्स ऑफ वासेपुर इसकी शुरुआती कड़ी मानी जा सकती है. आज इस बात पर तमाम बहस जारी है कि वेब सीरीज और फिल्में आज समाज में नशा, हिंसा और गाली-गलौज को ग्लैमराइज कर रहे हैं. आपको साल 2018 याद होगा जब नेटफ्लिक्स ने भारत में सेक्रेड गेम्स वेब सीरीज से धूम मचा दी थी. जिसमें हिंसा और सेक्स के सीन की खूब चर्चा हुई. ये वेब सीरीज काफी पॉपुलर हुई और उसके बाद भारत में वेब सीरीज की आंधी जैसी आ गई. इन ओटीटी ऐप्स पर आ रहीं वेब सीरीज का हिस्सा बड़े से बड़ा फिल्म स्टार आज बनता दिख रहा है.

आज तकरीबन 41 ऐसे ऐप हैं जो लोगों को वेब सीरीज या उस तरह के कार्यक्रम जो कि टीवी पर सार्वजनिक रूप में चलवाना संभव नहीं है वो उपलब्ध करा रहे हैं. कोई भी इनके सब्सक्रिप्शन लेकर इन वेब सीरीज को देख सकता है अपनी मोबाइल में. जहां हिंसा और सेक्स सीन की कोई सीमा नहीं है, कोई रोक-टोक नहीं है. हां, स्क्रीन के कोने में कहीं A का टैग आपको जरूर दिख जाएगा. लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि हर वेब सीरीज केवल हिंसा और यौन उत्तेजक कंटेंट ही परोस रही है, एजुकेशन, प्रोफेशन, बिजनेस और पॉलिटिक्स पर भी कई बेहतरीन वेब सीरीज बनी हैं. लेकिन भारत में मशहूर हुईं कुछ वेब सीरीज के नाम आपको जरूर देखना चाहिए- सेक्रेड गेम्स, मिर्जापुर, गंदी बात, Bard of Blood, The Great Indian Murder,  बेकाबू, असुर, पाताल लोक.

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आज भारत में तकरीबन 41 ओटीटी ऐप चल रहे हैं. देश में ओटीटी दर्शकों की संख्या साढ़े चार करोड़ को पार कर रही है. रेवेन्यू और पूंजी के लिहाज से देखा जाए तो भारत में ओटीटी सेक्टर 12 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर रहा है. एक स्टडी के अनुसार, ओटीटी का एक भारतीय दर्शक औसतन रोज 70 मिनट का अपना समय वीडियो स्ट्रीमिंग इन प्लेटफॉर्म्स पर बिता रहा है. एक हफ्ते में एक दर्शक औसतन 12.5 बार ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर आता है.

ज्यादात्तर लोग क्या देखते या पसंद करते हैं? इसे एक उदाहरण के साथ समझ सकते हैं. एक ओटीटी ऐप है अल्ट बालाजी. इसके दो वेब सीरीज हैं. गंदी बात और बोस- डेड और अलाइव. अबतक गंदी बात के चार सीजन आ चुके हैं, जबकि बोस के सिर्फ एक. इसका कारण एक ही हो सकता है कि जिस सीरीज के दर्शक होंगे उसी के नए सीजन आएंगे. एनिमल जैसी फिल्में, सीक्रेड गेम्स और गंदी बात जैसे वेब सीरीज पर हो हल्ले के बीच इनकी पॉपुलरिटी बाजार को तेजी से प्रोत्साहित करती है.

फिल्म और ओटीटी इंडस्ट्री भी आखिरकार बाजार का हिस्सा है और बाजार का एक ही उसूल होता है कि 'वही बनेगा जो बिकेगा'.

बाजार से इतर ये अलग बहस है कि इनका हमारी नई पीढ़ी पर, नौजवानों पर, युवाओं पर, परिवारों पर, समाज पर क्या असर हो रहा है? और इस तर्क को भी पूरी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता कि एनिमल जैसी फिल्में समाज का सच दिखा रही हैं.

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आध्यात्मिक गुरु ओशो कहते हैं-

''आखिर ये फिल्में, डिटेक्टिव फिल्में, और खूनी और हत्यारों की कहानियां क्यों इतनी पढ़ी जाती हैं? ये हिंसक चित्त के कारण, जितना दुनिया में हिंसक चित्त बढ़ता चला जाएगा, उतना हिंसक चित्र, हिंसक कथाएं रस देती हैं. क्यों? क्योंकि हिंसक कथा को देखते-देखते आप भूल जाते हैं कि आप कथा के हिस्से नहीं हैं- आप कथा के हिस्से हो जाते हैं!

अगर आप एक जासूसी फिल्म देख रहे हैं तो आप भूल जाते हैं, किसी के साथ आइडेंटिटी हो जाती है आपकी. नायक के साथ आप एक हो जाते हैं. आप देखेंगे कि जब नायक घोड़े पर भागा जा रहा है तो आप भी कुर्सी पर अकड़ कर बैठ गए हैं. झुके हुए नहीं रह गए हैं. आप क्यों अकड़ कर बैठ गए हैं? यह आपकी रीढ़ को क्या हो गया? यह आकस्मिक नहीं है, यह भीतर की हिंसा है. आप भी किसी घोड़े पर बैठ कर, इसी गति से यात्रा करना चाहते हैं. किसी की छाती में इसी तरह भाला भोंकना चाहते हैं. वह भोंक नहीं सके हैं आप. कहानी में देखकर रस ले रहे हैं, तृप्ति कर रहे हैं.''

ओशो

ओशो आगे कहते हैं- ''वहां स्पेन में भैंसों के साथ आदमियों को लड़ाया जाता है. लाखों लोग देखने इकट्ठे होते हैं. भारी धूप है, आग बरस रही है और घंटों वे बैठे हुए हैं कि भैंसे से एक आदमी लड़ रहा है. और भैंसे के सींग उसकी छाती में घुस गये हैं. लोग उत्सुकता और आतुरता के साथ उसके गिरते हुए खून को देख रहे हैं. इनको क्या हो गया है? इन आदमियों को क्या हो गया है? कुश्ती देखने हजारों-लाखों लोग इकट्ठा होते हैं, किसलिए?

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इससे भीतर की हिंसा को रस मिलता है. यह रस पहचानना पड़ेगा, तो हमें अपनी प्रतिमा का पता चलेगा कि प्रतिमा कैसी है? यह हम कैसे आदमी हैं? यह हमारे भीतर क्या हो रहा है? जो अखबार जितनी हत्याओं की, आत्महत्याओं की, स्त्रियों को भगाने की खबरें छापता हो, वह उतना ही ज्यादा बिकता है. आखिर कौन पढ़ता है इसे? जो लोग पढ़ते हैं, उनके भीतर किसी हिंसा को, किसी बात को रस-उपलब्धि होती है. वे इसको पढ़कर सुखी होते हैं, कहीं उन्हें कुछ आनंद आता है. यह आनंद हिंसा है. और इसे पहचानना पड़ेगा. और ये तथ्य है.

यह व्यक्तित्व की एक-एक परत को उघाड़ कर देखना होगा. जैसा व्यक्तित्व है, उसे पहचानना होगा. रास्ते पर आप जा रहे हैं. दो आदमी लड़ रहे हैं, आप खड़े होकर देखने लगते हैं. आपने कभी भी नहीं सोचा होगा कि ये हिंसा है. दो आदमी लड़ रहे हैं, आप खड़े होकर क्यों देख रहे हैं? आपको खड़े होकर देखने में रस आ रहा है कि नहीं? और अगर झगड़ा ऐसे ही खत्म हो जाए, बिना मार-पीट हुए, तो आप थोड़े से दुखी लौटेंगे कि नहीं? कि व्यर्थ ही खड़े रहे, कुछ निकला नहीं. थोड़ा सा मन उदास होकर लौटेगा. और अगर तेजी से झगड़ा हो जाए, छुरेबाजी हो जाए और लहू बह जाए तो आप थोड़े से हल्के होकर लौटेंगे. मन थोड़ा निश्चिंत हो गया होगा. ऐसा लगेगा कि कुछ हुआ, कुछ देखा.''

मनोविज्ञान क्या कहता है हिंसक फिल्मों, वेब सीरीज और वीडियो गेम्स पर?

ये चर्चा पिछले कुछ सालों से चल रही हैं कि क्या फिल्मों और वेब सीरीज के हिंसक सीन हमारे किशोरों, युवाओं को हिंसक बना रहे हैं? क्या हिंसा से भरे वीडियो गेम्स युवाओं और बच्चों के मन में उग्रता भर रहे हैं. आजकल हत्याओं के बाद लाश को ठिकाने लगाने के भयावह तरीकों पर खुलासे ये बताते हैं कि वेब सीरीज से अपराधी अपराध करने का और उनसे बचने का आइडिया ले रहे हैं. कुछ दिन पहले, सूरत में हुए लूटकांड के आरोपियों ने पुलिस की पूछताछ बताया कि उन्होंने मनी हाइस्ट नामक वेब सीरीज देखकर ये प्लान बनाया. वल्लभगढ़ में छात्रा निकिता तोमर हत्याकांड के आरोपियों ने कबूल किया कि मिर्जापुर वेब सीरीज से आइडिया लेकर उन्होंने अपने प्लान को अंजाम दिया था. श्रद्धा हत्याकांड में भी आरोपी ने लाश ठिकाने लगाने के लिए वेब सीरीज से आइडिया लिया था.

मशहूर साइकाइट्रिक सी. जे. जॉन कहते हैं- अगर हाल के सालों में हुई हिंसक घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि तमाम ऐसे अपराध हुए हैं जिनके आरोपी चाहे वो किशोर उम्र वाले हों या बड़ी उम्र के, फिल्मों और वेब सीरीज में दिखाए गए सीन को कॉपी करते हैं. अपराध के तरीके सीखने के लिए लोग इन्हीं फिल्मों और सीरीज के सीन्स को दोहराते हैं. इन फिल्मों और वेब सीरीज में दिखाए गए हिंसक सीन बच्चों को बेशक प्रभावित कर रहे हैं. उनके व्यवहार में हिंसा की झलक आप भी गौर करके अपने आस-पास, अपने परिवारों में महसूस कर सकते हैं. केवल ये कारण ही नहीं, ड्रग एडिक्शन और एल्कोहल को स्टैटस सिंबल के तौर पर पेश करने, परिवार के आर्थिक हालात और उनसे उबरने के शॉर्टकट, पेरेंट्स के मैरिटल ब्रेकअप जैसे कई फैक्टर भी बच्चों के बिहैवियर को प्रभावित कर रहे हैं.

क्या इस तरह के ऑनलाइन कंटेंट युवाओं पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं? जेसी बोस यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की एक स्टडी के अनुसार, वेब सीरीज और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग कंटेंट युवाओं के मनोभावों को प्रभावित करते हैं. ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट हिंसा, सेक्सुअल व्यवहार और दुर्व्यवहार से भरी हुई है. यह भारतीय युवाओं पर गलत असर डाल रही हैं. इस तरह का कंटेंट लोगों में क्रोध, आक्रामकता, चिंता, डिप्रेशन जैसी समस्याओं को जन्म दे रही है.

इनका हल क्या है?

इनका हल क्या है? इस सवाल पर सी. जे. जॉन कहते हैं- बच्चों के व्यवहार में हिंसक बदलाव के शुरुआती लक्षण दिखते हीं उन्हें सतर्कता के साथ हैंडल करने में आपको जुट जाना होगा. उन्हें समय देना होगा, उन्हें अच्छी आदतों की ओर ले जाने के लिए उनके सामने आपको अच्छे विकल्प और अच्चे उदाहरण मुहैया कराने होंगे. सख्ती की बजाय दोस्त के तौर पर उनके मनोभाव को समझने के साथ ही उनकी इस समस्या को आप हल कर पाएंगे.

डार्क फेज या गोल्डन एरा?

सिनेमा हो या साहित्य इनका काम समाज के असल हालात को सामने रखना ही है और इसकी लंबी परंपरा रही है. सिनेमा ने किसानों की बदहाल स्थिति, शिक्षा की समस्याओं, अंडरवर्ल्ड के खौफ जैसे कई बड़े मुद्दों को सामने रखा है जिसपर जनमत तैयार हुआ और फिर सरकारों और प्रशासन को इन मुद्दों पर एक्शन लेना पड़ा. कहानी रील लाइफ की हो या फिर रियल लाइफ की, अपराध का ट्रेंड समाज को डराता है इसलिए इस पर बहस जरूरी हो जाती है. एनिमल जैसे ट्रेंडिंग मसालों, युवाओं के बदलते रोल मॉडल, गैंगस्टर्स-ड्रग्स और अपराध के बढ़ते ट्रेंड के कारण क्या इस दौर को डार्क एज कहा जाना चाहिए?

जेएनयू के शिक्षाविद् पुष्पेंद्र सिंह इस सवाल पर अलग राय रखते हैं. उनका मानना है- ''बेशक अपराध के कई मामले हमें बेचैन कर देते हैं, समाज की सुरक्षा को लेकर चिंता उत्पन्न करते हैं लेकिन आप उस दौर को याद कीजिए जब राजाओं का दौर हुआ करता था. एक राजा दूसरे राज्य को जीतता था तब क्या होता था? शहर के शहर, गांव के गांव लूट लिए जाते थे, इस काम में न केवल राजा, मंत्री और सामंत शामिल होते थे बल्कि पूरी सेना का इस्तेमाल आधिकारिक रूप से कत्लेआम, महिलाओं को बंधक बनाकर रखने, लोगों को गुलाम बनाने, शाही खजाने से लेकर आम लोगों के घर तक लूटने में होता था. लोगों की जिंदगी बस उतने दिन सुरक्षित रहती थी जबतक उस राज्य का राजा हारता नहीं था. लेकिन, आज दुनिया के जिन देशों में जंगें हो रही हैं वहां भी यूनिसेफ, रेड क्रॉस, यूएन जैसी संस्थाओं के कार्यकर्ता मौजूद हैं और मानवाधिकार के मसलों पर कम से कम आम लोगों की सुध ले रहे हैं.

आज कम से कम हम लोकतंत्र के दौर में रहते हैं. भारत जैसे देश में सिस्टम काम करता है. पहले के दौर में जहां पुलिस थानों में सुनवाइयां नहीं होती थीं, अपराधियों के खिलाफ सबूत जुटाना मुश्किल होता था, या आम लोगों की आवाज उठाने वाला कोई सिस्टम नहीं होता था. आज कम से कम आम लोगों के मुद्दे सोशल मीडिया, अखबारों, टीवी के जरिए उठ तो रहे ही हैं और आरोपियों पर कार्रवाई का सामूहिक दबाव भी बन रहा है. सीसीटीवी, फोन ट्रैकिंग, फिंगरप्रिंट जैसी आधुनिक सुविधाओं के कारण अपराधियों का बच निकलना मुश्किल साबित हो रहा है. ऐसे में पब्लिक सुविधाओं के लिहाज से आज के दौर को अगर गोल्डन एरा कहा जाए तो गलत नहीं होगा. और आगे भी हम इससे बेहतर स्थिति की ओर ही बढ़ेंगे.''

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