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केजरीवाल की राजनीति को खत्म मान लेना बेमानी होगी, उम्मीद बाकी है बशर्ते...

दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल के उस गुरूर को झटका जरूर लगा है, जिसमें वो दावा करते रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनको इस जन्म में नहीं हरा सकते - लेकिन महज एक चुनावी हार आम आदमी पार्टी के अंत की कहानी तो नहीं लिख सकती.

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आम आदमी पार्टी को फिर से खड़ा करना अरविंद केजरीवाल के लिए नामुमकिन तो नहीं, लेकिन मुश्किल बहुत है.
आम आदमी पार्टी को फिर से खड़ा करना अरविंद केजरीवाल के लिए नामुमकिन तो नहीं, लेकिन मुश्किल बहुत है.

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के भविष्य पर काफी चर्चा हो रही है, और वो स्वाभाविक भी है - एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या आम आदमी पार्टी खत्म हो गई है? 

और सवाल ये भी उठता है कि क्या अरविंद केजरीवाल दिल्ली की राजनीति में बाउंस-बैक कर पाएंगे?

ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि सिर्फ आम आदमी पार्टी ने ही सत्ता नहीं गंवाई है, अरविंद केजरीवाल के साथ साथ मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज जैसे आम आदमी पार्टी के बड़े नेता भी अपनी सीट पर चुनाव हार गये हैं. 

निश्चित तौर पर आम आदमी पार्टी के अब तक के इतिहास में इस बार सबसे कम सीटें मिली हैं. 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में 22 सीटें मिल पाई हैं, जबकि 2013 के पहले चुनाव में भी उसे विधानसभा की 28 सीटें मिली थी - और उसके बाद तो 2015 में 70 में से 67 सीटों का रिकॉर्ड ही कायम हुआ था. 2020 में भी 62 सीटें मिली थीं. 

संसार के शुरू होने के वक्त से ही सर्वाइवल-ऑफ-फिटेस्ट का फॉर्मूला शाश्वत रूप से चलता आ रहा है, और ये हर फील्ड में लागू होता है. राजनीति में भी. अरविंद केजरीवाल अपनी राजनीति के एक खास मोड़ पर चूक गये हैं, लेकिन पूरी तरह बर्बाद हो गये हैं, ऐसा तो कोई भी नहीं दावा कर सकता. सर्वाइवल के पूरे चांस तो हैं ही.

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सर्वकालिक ताकतवर बन चुकी बीजेपी तो 2014 के पहले से ही अपनी मुहिम शिद्दत से चला रही है, लेकिन कांग्रेस मुक्त भारत होने की बात कौन कहे, राहुल गांधी तो अब लोकसभा में विपक्ष के नेता भी बन चुके हैं.

फिर तो आम आदमी पार्टी मुक्त राजनीति होने का सवाल कहां से पैदा हो सकता है. बीजेपी तो 2015 से 2020 तक तीन सीटों से 8 तक ही पहुंच पाई थी, जबकि केजरीवाल के हिस्से में 67 और 62 सीटें आती रहीं - और हालिया चुनाव में भी बीजेपी को 48 सीटें ही मिली हैं. तकनीकी तौर पर बहुमत का आंकड़ा बीजेपी के पास है, लेकिन आम आदमी पार्टी को मिल चुके सपोर्ट से तो काफी कम है 

आम आदमी पार्टी का वोट शेयर क्या कहता है

पूर्व चुनाव विश्लेषक और आम आदमी पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले योगेंद्र यादव का कहना है कि आम आदमी पार्टी के साथ अब भी गरीब तबका, दलित वोटर और मुस्लिम समुदाय मुस्तैदी से डटा हुआ है - जाहिर है, ये सब अरविंद केजरीवाल की जमीनी ताकत का नमूना पेश कर रहा है. 

1. लोकनीति सीएसडीएस सर्वे के मुताबिक, दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 50 फीसदी गरीब तबके का वोट मिला है. ऐसे ही 44 फीसदी निचले तबके का, 44 फीसदी मध्य वर्ग का और 30 फीसदी उच्च वर्ग का भी वोट भी मिला है.  

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2. सर्वे के अनुसार, अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में 65 फीसदी दलितों के वोट मिले हैं. दलितों का ज्यादातर वोट मिला है, उसमें 67 फीसदी वाल्मीकि वोट, 59 फीसदी जाटव वोट और बाकी दलितों में 53 फीसदी वोट मिला है.

3. दिल्ली के पुरुष वोटर के मुकाबले देखें तो ज्यादातर महिलाओं ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया है. सर्वे के मुताबिक, 49 फीसदी महिलाओं ने AAP को वोट दिया है, जबकि 43 फीसदी महिलाओं का वोट बीजेपी को मिला है. 

4. और वैसे ही मुफ्त बस सुविधा का लाभ उठाने वाली 55 फीसदी महिलाओं ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया है, जबकि ऐसी 38 फीसदी महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया है. 

क्योंकि केजरीवाल का सफर अब तक कामयाब रहा है

2014 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो अरविंद केजरीवाल चुनाव हारे कम जीते ज्यादा ही हैं, जिसमें 2025 में नई दिल्ली सीट पर हार भी शामिल है. बताते हैं कि अरविंद केजरीवाल ने बगैर कोई कैंपेन चलाये 1985 में आईआईटी खड़गपुर में हॉस्टल के मेस सेक्रेटरी का चुनाव जीत लिया था, और रामलीला आंदोलन के बाद 2013 में दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हरा कर दिल्ली के मुख्यमंत्री भी बन गये थे. 

दिल्ली में बीजेपी और आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन की तुलना करें तो बीजेपी के वोट शेयर में 2020 के मुकाबले करीब 9 फीसदी का इजाफा हुआ है, और आम आदमी पार्टी को 5 साल में 10 फीसदी का नुकसान हुआ है. बेशक नुकसान बड़ा है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी या शिरोमणि अकाली दल जैसा हाल तो नहीं कहा जा सकता. 

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सत्ता गंवाने के बावजूद आम आदमी पार्टी का वोट शेयर अब भी 44 फीसदी बना हुआ है, जो बीजेपी से महज 2 फीसदी ही कम है. हिमाचल प्रदेश में तो 1 फीसदी से कम वोटों के अंतर से भी कांग्रेस ने बीजेपी को शिकस्त देकर 2022 में सरकार बना ली थी. 

योगेंद्र यादव भी अरविंद केजरीवाल की राजनीति को एक चुनावी हार की वजह से खारिज कर देने की बात को जल्दबाजी मानते हैं. 

आप की वापसी का कोई खास आधार है क्या

अरविंद केजरीवाल के लिए अपने तौर तरीके बदलना तो मुश्किल होगा, लेकिन गलतियों से सबक तो ले ही सकते हैं - क्योंकि हाल फिलहाल जो रास्ता अख्तियार किया है, वो तो बहुत ही खतरनाक और नुकसानदेह है. 

1. अरविंद केजरीवाल को हर हाल में अपनी पुरानी इमेज पेश करनी होगी, खास आदमी की छवि से लौटकर आम आदमी बनकर लोगों का फिर विश्वास जीतना होगा. 

2. अरविंद केजरीवाल को चाहे जैसे भी संभव हो, साबित करना होगा कि वो अब भी कट्टर इमानदार ही हैं, और आगे भी बने रहेंगे - क्योंकि, जनादेश बता रहा है कि दिल्ली के लोग हर बात के लिए एलजी को ही जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं. 

एक इंटरव्यू में ये पूछे जाने पर कि क्या केजरीवाल फिर से पुरानी छवि हासिल कर सकेंगे?

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योगेंद्र यादव का कहना है, अरविंद केजरीवाल ने अब तक असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया है. 

और, योगेंद्र यादव कहते हैं, अरविंद केजरीवाल में अपार संभावना और क्षमता है - लड़कर वापसी करने की, बेहतरीन रणनीति बनाने की, सीखने की और नये सिरे से सब कुछ खड़ा करने की.  

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