अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए दाखिल की गई तीन याचिकाएं कोर्ट ने खारिज कर दी हैं. चूंकि, संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि गिरफ्तार होने पर किसी सीएम को इस्तीफा देना ही पड़े. कानून की इसी बेबसी से कोर्ट के हाथ बंधे हैं और केजरीवाल के हाथ मजबूत हो गए हैं. और इसी ताकत के चलते केजरीवाल रोज अजीबोगरीब मांग कोर्ट से कर रहे हैं. सबसे बड़ी और अजीब मांग तो ये ही है कि वे जेल से ही सरकार चलाने की कोर्ट से अनुमति मांग रहे हैं. यह केजरीवाल की राजनीतिक ताकत ही है कि न सरकार की हिम्मत है कि वो दिल्ली सरकार को बर्खास्त कर सके और न ही कोर्ट कोई ऐसा फैसला लेता दिख रहा है जिससे दिल्ली की सरकार पर किसी तरह की आंच आए. आइये, जानते हैं इन सबके पीछे के गंभीर कारणों को, जिनका लाभ आप को मिलता दिख रहा है.
1. प्रमुख चैलेंजर: विपक्षी पार्टियों के बीच लगातार खबरों में हैं
आप के प्रभाव वाले क्षेत्र देश में बहुत छोटा है. दिल्ली, पंजाब और आंशिक रूप से गोवा और गुजरात में ही अभी तक आम आदमी पार्टी की कुछ हैसियत बन सकी है. पर पार्टी की ताकत देखिए कि नैशनल मीडिया में सबसे अधिक कवरेज अरविंद केजरीवाल को मिल रही है. उनकी गिरफ्तारी को एक महीना होने जा रहा है. पर हर रोज किसी न किसी बहाने केजरीवाल सबसे बड़ी खबर होते हैं. कभी जेल में उनके आहार को लेकर ईडी की आपत्ति बड़ी खबर बनती दिखती है तो कभी उनके मुलाकातियों से मिलने के तौर तरीके बड़ी खबर में रहती हैं. कोर्ट में चल रही कार्यवाही तो देश की सबसे बड़ी खबर होती है. चुनाव प्रचार के इस दौर में विपक्ष के बड़े से बड़े नेता नैशनल मीडिया में इतनी कवरेज के तरस रहे हैं. पर जेल के अंदर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री अभी भी कवरेज के मामले में सभी पर बीस पड़ रहे हैं.
2. सहानुभूति का जुगाड़: सीएम पद से हटाने के लिए भाजपा पर लगातार दबाव
केजरीवाल से संबंधित हर खबर आम आदमी पार्टी के समर्थकों के बीच उनके नेता के लिए सहानुभूति का लेवल और बढ़ाने का काम करता है. भारतीय जनता पार्टी नीत केंद्र सरकार के पास यह अधिकार है कि वो दिल्ली सरकार को बर्खास्त कर सके. दिल्ली के उपराज्यपाल विनय सक्सेना ने पहले कई बार ऐसे तेवर दिखाए जिससे यह लगा कि जल्द ही वो केंद्र को दिल्ली में काम काज सुचारू ढंग से न चलने की रिपोर्ट सौंप देंगे. पर ऐसा अभी तक नहीं हो सका. वैसे तो केंद्र सरकार संवैधानिक गतिरोध के नाम पर बिना एलजी की सिफारिश के भी दिल्ली सरकार को बर्खास्त कर सकती है. पर किसी ओर से भी इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है. मतलब साफ है कि कोई भी नहीं चाहता है कि बर्खास्तगी के बाद केजरीवाल के प्रति जनता की सहानुभूति और बढ़ जाए. राजनीतिक विश्वलेषकों का कहना है कि केजरीवाल भी खुद रिजाइन करने के बजाय यही चाहते हैं कि उन्हें केंद्र सरकार बर्खास्त करे.
3. सुनीता केजरीवाल का उदय: महिला नेता के रूप में एक नाम और जुड़ा
लोकसभा चुनावों के बीच जितना प्रचार जेल से बाहर रहकर अरविंद केजरीवाल नहीं कर पाते उससे अधिक तो वे अंदर रहकर अपना वोट पुखता कर रहे हैं. इसके साथ ही अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को अपने समर्थकों के बीचकर भेजकर उन्हें भी नेता बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं. अब केजरीवाल के पास एक विश्वसनीय शख्स और बढ़ जाएगा. मनीष सिसौदिया और सत्येंद्र जैन के लंबे समय से जेल जाने के बाद से अरविंद केजरीवाल के पास विश्वसनीय लोगों की कमी हो गई थी.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में जेल से संदेश भिजवाया था कि बाहर आते ही वो महिलाओं के लिए हर महीने एक हजार रुपये देने वाली योजना लागू करेंगे. इस संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी अब सुनीता केजरीवाल पर है. क्योंकि महिलाओं से अच्छी तरह कनेक्ट होने के लिए अब आम आदमी पार्टी ने चुनाव कैंपेन में सुनीता केजरीवाल का नाम भी जोड़ दिया गया है. दिल्ली के चुनावों में महिला वोटर्स की बढ़ती भागीदारी के लिए भी एक और महिला नेता की कमी पार्टी में महसूस हो रही थी. खबर है कि इसके लिए हर मंडल, वार्ड में और बूथ स्तर पर महिलाओं की टीमें बनाई गई हैं जिनेमें 2 से चार महिलाओं को शामिल किया गया है. ये टीम घर घर जाकर महिलाओं को ये भी बताती है कि जेल जाने के बावजूद अरविंद केजरीवाल को उनकी पूरी फिक्र है.
4. जिद से ज्यादती को टक्कर: गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश बताने पर कायम
अरविंद केजरीवाल जिस तरह अपनी गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश बताने की जिद पाल बैठे हैं वो उनके पक्ष में जाता दिख रहा है. इसके साथ ही वह देश के सामने एक नजीर पेश कर रहे हैं. आने वाले दिनों में जेल जाने वाला हर नेता उनकी मिसाल को आगे रखकर गिरफ्तारी के बाद रिजाइन करने से इनकार करेंगे. इसके साथ ही यह भी जिद पकड़ लिया करेंगे कि उनकी गिरफ्तारी ही गलत है. सोचिए अरविंद केजरीवाल की तरह अगर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी यही जिद दिखाई होती तो कम से कम राजनीतिक चर्चा में होते और हो सकता है कि प्रदेश की बागडोर भी अभी उनके पास ही होती. पर हेमंत सोरेन यह हिम्मत नहीं दिखा सके क्योंकि उनके सामने लालू यादव, जयललिता आदि की नजीर थी. जिन्हें रिजाइन करके जेल जाना पड़ा था. पर अब भविष्य में अगर कोई भी संवैधानिक पद वाला नेता अगर जेल जाता है तो जरूर वह अरविंद केजरीवाल की मिसाले देगा और अपनी जिद की बदौलत अपनी गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश करार देगा.