बदायूं में हुई 2 मासूमों की निर्मम हत्या से उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश में लोग स्तब्ध हैं. कहा जा रहा है कि यह हत्याकांड अगले महीने होने वाले लोकसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी में बड़ा मुद्दा बन सकता है. क्योंकि, इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की ओर से टकराव वाली तीखी प्रतिक्रिया दी जा रही है. पश्चिमी यूपी की राजनीति को नजदीक से देखने वाले इसकी तुलना 2013 में मुजफ्फरनगर के कवाल में 2 जाट भाइयों की हत्या से जोड़कर देखकर रहे हैं, जिसके कारण बाद में दंगे भड़क उठे थे. आम तौर पर पश्चिमी यूपी की मिट्टी समाजवादी पार्टी के लिए उर्वर रही है. जाट-मुस्लिम का वोट समाजवादी पार्टी को ही मिलता रहा है. पर 2014 से यहां जाटों का वोट बीजेपी को जाने लगा है. 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद वेस्ट यूपी की सियासत हमेशा के लिए बदल गई थी. 2019 में सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन के बाद जरूर कुछ बदली थी. तो क्या बदायूं की घटना से इस इलाके में एक बार फिर बीजेपी को बहुत बड़ा माइलेज मिलने जा रहा है? आइये देखते हैं.
बदायूं में जो हुआ वह सांप्रदायिक कैसे हो गया
बदायूं डबल मर्डर केस में मृतक के पिता की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी साजिद और उसके भाई जावेद के खिलाफ जो FIR दर्ज की है उसके अनुसार घटना का ब्योरा इस प्रकार है. FIR में मृत बच्चों के पिता ने लिखा है कि आरोपी साजिद ने मेरी पत्नी से कहा कि उसे पैसे चाहिए क्योंकि उसकी पत्नी को डिलिवरी होने वाली है. जब पत्नी पैसे लेने के लिए अंदर गई, तो साजिद ने कहा कि वह अस्वस्थ महसूस कर रहा है और छत पर टहलने जाना चाहता है. वो मेरे बेटों (मृतक) को भी अपने साथ छत पर ले गया. आरोपी ने अपने भाई जावेद को भी छत पर बुला लिया था. जब मेरी पत्नी लौटी तो उसने साजिद और जावेद को हाथों में चाकू लिए देखा. साजिद ने मेरे जीवित बेटे पर भी हमला करने की कोशिश की और उसे चोटें आईं हैं. दोनों भाग रहे थे और साजिद ने मेरी पत्नी से कहा कि आज उसने अपना काम पूरा कर लिया है.
ये तो रही एफआईआर में लिखी हुई जानकारी. दरअसल हत्याआरोपी मुसलमान हैं इसलिए राजस्थान से लेकर दिल्ली और पश्चिमी यूपी तक में हुई इस तरह की सारी घटनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है. सोशल मीडिया पर इसके लिए पूरी कौम को दोषी साबित किया जा रहा है. कुछ लोग ऐसे वीडियो शेयर कर रहे हैं जिसमें यह दिखाया गया है कि गला रेतकर हत्या करना किस तरह इस धर्म में एक पवित्र काम है. सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार हो गई है जिसमें यह साबित किया जा रहा है कि इस कौम में बच्चों को गला रेतने की शिक्षा उनके होश संभालने के बाद से देनी शुरू हो जाती है. उदयपुर में टेलर कन्हैया को मारे जाने, दिल्ली में अंकित हत्याकांड, उत्तराखंड में हल्द्वानी में रेड डालने गई पुलिस को अगवा बनाकर रखना और सबसे बढ़कर मुजफ्फनगर के कवाल में हुई हिंसा को बार-बार याद दिलाया जा रहा है.
बीजेपी को फायदा होने की क्यों उम्मीद दिख रही
राजस्थान में कांग्रेस राज में हुए कन्हैया टेलर हत्याकांड पर जमकर सियासत हुई. राजस्थान में अपनी चुनावी सभाओं में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ यह बार-बार कहते रहे कि जिन लोगों ने कन्हैया टेलर की हत्या की और विडियो बनाया है अगर यूपी में होते तो अब तक उनका क्या हुआ होता ये जनता अच्छी तरह समझ रही है. गृहमंत्री अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी ने भी कन्हैया टेलर हत्याकांड को अंजाम देने वालों को बचाने का आरोप राजस्थान सरकार पर लगाया था. राजस्थान में कांग्रस सरकार को विधानसभा चुनावों में मिली बड़ी हार के पीछे एक कारण यह हत्याकांड भी था.
ये सभी जानते हैं कि 2014 के मुकाबले 2019 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम यूपी में बीजेपी कमजोर पड़ गई थी. बीएसपी-रालोद और समाजवादी पार्टी के एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के चलते बीजेपी को सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा और नगीना (एससी) सीटों पर बसपा के सामने हार मिली थी और संभल, मुरादाबाद, मैनपुरी और रामपुर की सीटें सपा से हार गई थी बीजेपी. उम्मीद की जा रही है कि भाजपा पश्चिमी यूपी की 27 सीटों पर 2014 वाला इतिहास शायद इस बार दोहरा सके. उल्लेखनीय है कि 2014 में बीजेपी ने 27 में से 24 सीट जीत ली थी. हालांकि पश्चिमी यूपी की राजनीति को पिछले 3 दशक से देख रहे मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार प्रेमदेव शर्मा कहते हैं कि कवाल का मामला दूसरा था .इस बार वैसा नहीं है. कवाल में हुई हिंसा के बाद बीजेपी हिंदुओं के साथ और उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार खुलकर मुसलमानों के साथ थी. इसलिए चुनावों में ध्रुवीकरण जबरदस्त तरीके से हुआ था. इस बार समाजवादी पार्टी फूंक फूंक कर कदम रख रही है. पीडितों के प्रति हमदर्दी जताने समाजवादी पार्टी के लोग भी जा रहे हैं.
एनकाउंटर का विरोध करके फंस गई है समाजवादी पार्टी
यूपी और आसपास के राज्यों में बीजेपी से अधिक बुलडोजर वाले बाबा यानि योगी आदित्यनाथ की पूछ बढ़ रही है. इसका एक मात्र कारण पब्लिक त्वरित न्याय देखना चाहती है. जो यूपी में विकास दूबे ,अतीक अहमद आदि के बाद बदायूं केस में भी देखने को मिला है. बदायूं में बच्चों की हत्या के एक आरोपी साजिद को पुलिस ने घटना के कुछ घटों बाद ही मुठभेड़ में मार गिराया. एसएसपी बदायूं आलोक प्रियदर्शी ने कहा कि पुलिस सूचना मिलते ही मौके पर पहुंची . पुलिस ने घेराबंदी कर आरोपी को पकड़ने की कोशिश की तो आरोपी ने पुलिस पर फायर किया. जवाबी फायरिंग में साजिद की मौत हो गई है. पहले अखिलेश यादव ने एनकाउंडर का विरोध करके फिर शिवपाल यादव के पुत्र आदित्य यादव ने पीड़ित के घर पहुंचकर एनकाउंटर को सही न्याय न होने की बात कहकर आम लोगों के बीच बेवजह की नाराजगी मोल ले ली. पर राजनीतिक कारणों से यह बेवजह नहीं है. समाजवादी पार्टी के कोर वोटर्स मुस्लिम हैं .
पूरे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19 फीसदी से ज्यादा है, लेकिन अगर वेस्टर्न यूपी की बात करें तो यह आंकड़ा 26 फीसद पहुंच जाता है. यानी यहां की कुल आबादी का 26 फीसदी हिस्सा मुस्लिम है. इसके अलावा, पश्चिमी यूपी की कुल 27 में से 21 सीटें ऐसी हैं, जिन पर मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है. 2019 के चुनाव की बात करें तो 8 सीटों पर सपा-बसपा गठबंधन को मुसलमानों का 73 फीसदी वोट मिला था, जबकि कांग्रेस को 18 फीसदी. इस बार सपा का गठबंधन कांग्रेस के साथ है.
नेताओं की बयानबाजी तनाव को और बढ़ा रही है
बदायूं की घटना के बाद समाजवादी पार्टी और बीजेपी एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर माहौल में और तनाव पैदा कर रहे हैं. सपा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि बीजेपी यूपी में दंगा-फसाद, सांप्रदायिक तनाव खड़ा करके चुनाव जीतना चाहती है. इसी कारण से ऐसी घटनाओं को खुद अंजाम दिलवा रही है. जिलों में सांप्रदायिक तनाव पैदा करवा रही है, जिसका परिणाम बदायूं की की घटना है.बीजेपी जब जनता के असल मुद्दों से हार चुकी है तो धार्मिक विवाद, धार्मिक लड़ाई ही भाजपा का आखिरी हथियार बचा है. BJP के इशारे पर ही कई गुंडे, बदमाश खुले घूम रहे और भाजपा के इशारे पर ही ऐसी वारदात कर रहे जिसके कारण समाज में लड़ाई झगड़ा बढ़ रहा है.
सपा नेता शिवपाल यादव ने बीजेपी सरकार को घेरते हुए कहा कि इस सरकार में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है.सपा मुखिया अखिलेश यादव भी बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोला. बीजेपी सांसद संघमित्रा मौर्य ने समाजवादी पार्टी को जवाब देते हुए कहा कि विपक्षी दलों खासकर सपा को कोई भी बयान देने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. क्योंकि, उनकी सरकारों में क्या होता था ये सबको पता है. पिछले पांच सालों में बदायूं में ऐसी कोई घटना नहीं हुई. जबकि पुरानी सरकारों में ऐसी वारदात रोज होती थी.
भारतीय जनता पार्टी के नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने बदायूं की घटना पर दुख व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि बदायूं की घटना शर्मसार करने वाली है. उन्होंने कहा कि अफसोस की बात है कि कुछ लोग इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर भी सुरक्षा कवच लगाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे लोग न केवल समाज के दुश्मन हैं बल्कि इंसानियत के भी दुश्मन हैं. किसी धार्मिक आस्था उसके जुर्म को नहीं बचा नहीं सकती है, न ही छुपा सकती है.
बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि योगी सरकार ने ऐसी किसी घटना के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने का उदाहरण दिया है. इस मामले में भी एनकाउंटर करके अपराधी को मार गिराया गया है. राकेश त्रिपाठी ने कहा कि अगर सत्ता सपा की होती तो ऐसे अपराधियों को सत्ता का संरक्षण होता. व्यर्थ के आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बेहतर होता कि सपा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम कर सकती थी. अगर सपा मरहम नहीं लगा सकती तो कम से कम जख्मों पर नमक छिड़के.