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मोदी सरकार 3.0 में तैयार रहिये 3 नये फैसलों के लिए

चुनावों से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहने लगे थे कि तीसरा कार्यकाल बड़े फैसलों के लिए होगा. सरकार तो बन ही रही है, और नीतीश कुमार या चंद्रबाबू नायडू की तरफ से अब तक बाधा खड़ी करने जैसी कोई नई चीज नहीं आई है - आखिर बड़े फैसले क्या और कैसे हो सकते हैं?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सबसे मुश्किल चुनावी वादा होगा - तीसरी पारी में बड़े और कड़े फैसले ले पाना.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सबसे मुश्किल चुनावी वादा होगा - तीसरी पारी में बड़े और कड़े फैसले ले पाना.

बीजेपी का 'अबकी बार 400 पार' हकीकत नहीं बन सका - जुमला ही साबित हुआ. लेकिन NDA के सहयोगी दलों की मदद से बीजेपी केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गई है - एनडीए ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर से नेता चुन लिया है, और साथी दल भी हर संभव सहयोग की बात कर रहे हैं. 

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एनडीए की मीटिंग के दौरान नीतीश कुमार का इमोशनल भाषण और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पैर छूने के लिए झुकना - संकेत तो यही दे रहा है कि बीजेपी के संकटमोचकों ने सहयोगी दलों के साथ डील हर तरह से पक्की कर ली है.

और जब, सब कुछ मनमाफिक हो रहा हो, तो बड़े फैसले में भला कौन सी मुश्किल आड़े आ सकती है? 

मुश्किल की एक ही वजह हो सकती है, किसी का सोचा हुआ, होता ही कब है. अगर ऐसा होता तो क्या बीजेपी बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने से पहले ही रुक गई होती. हुआ तो यही है.

रही बात बड़े फैसलों की, तो ऐसे मसलों में सबसे ऊपर नाम तो यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का ही आता है - और अगर विपक्षी दलों के चुनाव कैंपेन को देखे तो अग्निवीर स्कीम भी बड़ा मुद्दा ही लगता है. 

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1. वन नेशन, वन इलेक्शन लागू करना संभव होगा क्या?

'एक देश, एक चुनाव' भी देखा जाये तो बड़े फैसले वाला ही प्रोजेक्ट है. 

एक साथ चुनाव कराये जाने को लेकर कोई खास विरोध तो नहीं लग रहा है, लेकिन चूंकि ये बीजेपी सरकार का प्रस्ताव है, इसलिए स्वाभाविक विरोध तो विपक्ष की मजबूरी ही है - वैसे चुनाव कैंपेन में ये भी समझाने की कोशिश हो रही थी कि अगर बीजेपी सत्ता में लौटी तो आगे फिर कभी देश में चुनाव नहीं होंगे. भारत में भी रूस और चीन की तरह तानाशाही आ जाएगी.

चुनाव कैंपेन का असर तो हुआ ही है, वरना बीजेपी अपने बूते बहुमत हासिल करने से दूर कैसे रह जाती - और अब चूंकि बीजेपी कमजोर होकर आई है, इसलिए एक साथ चुनाव कराने का फैसला तो सहयोगी दलों की सहमति के बगैर होने से रहा. 

किंगमेकर बन कर उभरे नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के नेता केसी त्यागी ने तो पहले ही एनडोर्स कर दिया है. केसी त्यागी ने कहा है कि इस मुद्दे पर जेडीयू को कोई आपत्ति नहीं है. टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी किंगमेकर बने हैं, और उनकी भी सहमति जरूरी होगी. 

अब तक अपडेट यही है कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की संभावना पर विचार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में बनी हाई लेवल कमेटी राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. 

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समिति की तरफ से बताया गया है कि सभी पक्षों, विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं से बातचीत के बाद रिपोर्ट तैयार की गई है. इसमें आने वाले वक्त में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ ही नगरपालिका और पंचायत चुनाव भी करवाने की सिफारिशें शामिल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, महज 15 राजनीतिक दलों को छोड़कर बाकी 32 दलों ने एक साथ चुनाव कराने का सपोर्ट तो किया ही है, सीमित संसाधनों की बचत, सामाजिक तालमेल बनाये रखने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए ये विकल्प अपनाये जाने की जोरदार पैरवी भी की है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर एनडीए में बीजेपी के सहयोगी दलों को राजी भी कर लेते हैं, तो दो तिहाई बहुमत के लिए इंडिया ब्लॉक में शामिल राजनीतिक दलों को इसके लिए तैयार करना होगा - और ये काम काफी मुश्किल हो सकता है. 

राजनीतिक विरोध का लेवल जो भी हो, लेकिन एक देश, एक चुनाव को लागू किया जाना भी बड़ा फैसला ही होगा. 

2. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना तो सबसे मुश्किल लगता है

बीजेपी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाले एजेंडे में तीन मुद्दे प्रमुख रहे हैं. एक, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण. दो, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाना - और तीन, पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना. 

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जम्मू-कश्मीर से धारा 370 तो मोदी सरकार की दूसरी पारी शुरू होते ही खत्म कर दी गई थी, और मोदी के दूसरे कार्यकाल के आखिर तक अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन भी हो गया. राम मंदिर उद्घाटन समारोह को लेकर राजनीति भी खूब हुई - लेकिन बीजेपी को राम मंदिर मुद्दे का बिलकुल भी लाभ नहीं मिला. अयोध्या की फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार इसका सबसे बड़ा सबूत है. 

अब बहारी बचे हुए तीसरे मुद्दे की है. यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड - राजनीतिक तौर पर बेहद संवेदनशील होने के कार इसे लागू करना पाना मोदी सरकार के लिए बेहद मुश्किल हो सकता है. देश के 22वें विधि आयोग ने 14 जून, 2023 को यूसीसी पर सार्वजनिक और धार्मिक संगठनों के विभिन्‍न पक्षों से एक महीने के भीतर अपनी राय देने को कहा था.

उत्तराखंड में बनी बीजेपी की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता से संबंधित बिल पेश करने के अगले दिन ही पास भी करा लिया था - अब ये उत्तराखंड में कानून बन चुका है.

भारत में कानून तो सभी के लिए बराबर है, लेकिन समान नागरिक कानून कोई नहीं है. अनुच्छेद-44 संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है, जिसका मकसद संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य’ के सिद्धांत का पालन करना है. 

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यूसीसी के लिए केंद्र की बीजेपी सरकार को एनडीए के सहयोगी दलों का साथ तो चाहिये ही होगा, विपक्ष को राजी किये बिना ये संभव नहीं हो सकेगा - हां, जहां जहां बीजेपी की सरकारें हैं, उत्तराखंड की तरह इसे लागू किया जा सकता है. 

राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका में आ चुके बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अब यूसीसी को लेकर नरम रुख अपना लिया है. पहले तो बीजेपी के साथ रहते हुए भी बिहार में यूसीसी लागू करने से मना कर दिया था, लेकिन अब जेडीयू का कहना है कि यूसीसी के मुद्दे पर हरेक पक्ष की राय ली जाये. 

विपक्ष तो विरोध ही करेगा. पक्का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिटारे में और जो कुछ भी हो, लेकिन यूसीसी उनमें से एक तो है ही. और इस मामले में मोदी सरकार कोई कदम बढ़ाती है और अंजाम तक पहुंचाती भी है, तो ये सबसे बड़ा फैसला होगा. 

3. अग्निवीर योजना में क्या होने वाला है

पूरे लोकसभा चुनाव कैंपेन में अग्निवीर का मुद्दा छाया रहा. राहुल गांधी सहित विपक्षी दलों के नेताओं के भाषण में बार बार इसका जिक्र सुनने को मिला. सभी के जबान पर एक ही बात थी, INDIA गठबंधन ने सत्ता में आने पर अग्निवीर स्कीम को खत्म कर दी जाएगी. 

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INDIA ब्लॉक की सरकार तो नहीं आई, लेकिन बीजेपी के अंदर चुनावी प्रदर्शन पर चर्चा में अग्निवीर योजना तो आएगी ही. नाराजगी तो थी ही लोगों में. खासकर युवाओं में जो पक्की नौकरी चाहते हैं.

चुनावों के दौरान ही ये खबर भी आई थी कि सेना अग्निवीर योजना पर पर फीडबैक ले रही है, ताकि अगर जरूरी लगे तो उसमें आवश्यक सुधार किया जा सके.

मतलब, साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार अग्निवीर योजना को लेकर पहले से ही अलर्ट है - मौका देख कर भूल सुधार के उपाय तलाशे जा रहे हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सेना की तरफ से सर्वे के जरिये अग्निवीरों सहित अग्निपथ भर्ती योजना से जुड़े तमाम पक्षों से फीडबैक इकट्ठा किया जा रहा है. ऐसे लोगों में भर्ती प्रक्रिया और ट्रेनिंग से जुड़े अफसर और कमांडर शामिल हैं.  

रिपोर्ट के मुताबिक, फीडबैक के लिए 10 सवालों का एक फॉर्म सभी के पास भेजा गया है. अग्निवीरों से सेना में भर्ती के लिए उनका मोटिवेशन के साथ साथ ये जानने की भी कोशिश है कि नौकरी के लिए पिछले प्रयास क्या थे - और क्या वे मानते हैं कि स्थाई तौर पर उनको सेना में रख लिया जाये. 

A. हो सकता है, मोदी सरकार अग्निवीर योजना को बेहतर करने की कोशिश करे. 
B. अग्निवीर स्कीम को लेकर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, हो सकता है सरकार उनके हिसाल से कोई सॉल्यूशन लाये.
C. ये भी हो सकता है कि कृषि कानूनों की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अग्निवीर योजना वापस ही ले लें.

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अगर ऐसा कुछ भी होता है तो मोदी सरकार का बड़ा फैसला ही माना जाएगा.

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