बिहार में जातीय सर्वे से पहले जोर जोर से ढिंढोरा पीटा जा रहा था, लेकिन सर्वे के आंकड़े लगा जैसे डुगडुगी बजा कर जारी कर दिये गये.
पहले तो बगैर पूछे भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सर्वे को लेकर अपने प्रयासों का बखान मीडिया में करते नहीं थकते थे. सर्वे को कैबिनेट की मंजूरी मिली तो डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने लोगों को बताया, और जब आंकड़े जारी किये जा रहे थे तो कुछ अफसरों को मीडिया के सामने भेज दिया गया - ऐसा किये जाने की आखिर क्या वजह रही होगी?
क्या बिहार के जातीय सर्वे को लेकर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को पहले से अंदाजा हो गया था?
1. सर्वे के आंकड़ों के सही होने पर सवाल
गांधी जयंती के मौके पर 2 अक्टूबर, 2023 को बिहार में जातीय सर्वे के आंकड़े कुछ अफसरों ने जारी किये. प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपर मुख्य सचिव विवेक सिंह ने बताया कि सर्वे के अनुसार बिहार की कुल आबादी फिलहाल करीब 13 करोड़ है.
सर्वे कराये जाने का असली मकसद अब तक तो यही समझ में आ रहा था कि ओबीसी तबके की आबादी जानने की कोशिश हो रही है. क्योंकि SC/ST तबके के लोगों की गिनती तो देश की जनगणना में भी होती ही है.
हाल ही में संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था, और जब महिला आरक्षण बिल पेश किया गया तो उसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण देने की मांग की गयी - और उसके बाद से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार जातीय जनगणना पूरे देश में कराये जाने की मांग कर रहे हैं.
लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर सर्वे में सही आंकड़े नहीं जुटाये गये तो सब कुछ उल्टा पुल्टा हो जाएगा. ये सर्वे सभी जाति के लोगों को न्याय दिलाने के लिए किया जा रहा है, लेकिन आंकड़े गलत हुए तो बहुत नाइंसाफी होगी.
सर्वे रिपोर्ट आने के साथ ही सवाल उठने भी शुरू हो गये. राजनीतिक रिएक्शन की बात और है, लेकिन जब जातीय समूहों की तरफ से सवाल उठाये जाने लगे तो मामला काफी गंभीर हो जाता है. ऐसा ही एक सवाल कुर्मी जाति की आबादी को लेकर उठाया जा रहा है. सोशल मीडिया पर भी लोग सर्वे के आंकड़ों में नजर आ रहे विरोधाभास की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.
सर्वे में कुर्मी जाति के लोगों को भूमिहार बिरादरी से ज्यादा बताया गया है. सर्वे के मुताबिक बिहार में कुर्मी की आबादी 2.8785 फीसदी है, जबकि भूमिहार की संख्या 2.8683 फीसदी पायी गयी है.
बिहार के ही कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि ऐसा कैसे हो सकता है भला? बिहार के रहने वाले और बिहार की जातीय व्यवस्था को करीब से जानने वाले लोग इस चीज पर हैरानी जता रहे हैं. उनका दावा है कि सर्वे के आंकड़े और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क है.
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में बिहार के जातीय सर्वे को लेकर पूछे जाने पर महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने भी ऐसे ही सवाल उठाये और उनका कहना था कि ये काम तो होता ही रहता है. ओबीसी कमीशन का उदाहरण देते हुए देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि वहां एक सिस्टम तय किया जाता है और फिर उसी के हिसाब से बड़े ही प्रायोगिक तरीके से आंकड़े जुटाये जाते हैं. बल्कि उनके पास तो ऐसे आंकड़े होते ही हैं.
देवेंद्र फडणवीस का कहना था, 'सर्वे को लेकर नयी ही लड़ाई छिड़ गयी है... कुर्मी कहते हैं... हम तो इतने कम नहीं हैं. कोइरी भी कहते हैं... हम तो इतने कम नहीं हैं... और कोई कम्युनिटी कहती है... हम तो 6 परसेंट हैं, हमको 2 परसेंट दिखाया गया है.'
कहते हैं, जब तक इसका कोई ऑथेंटिक मॉडल तैयार नहीं किया जाता, तब तक कोई मतलब नहीं है. बीजेपी नेता केंद्र सरकार के एक सर्वे का भी जोर देकर जिक्र करते हैं, 2011 में केंद्र सरकार ने सामाजिक आर्थिक आधार पर जातीय सर्वे कराया था, लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने आंकड़े जारी नहीं किये.
2. मुस्लिम समुदाय के आंकड़े तो और ही इशारे कर रहे हैं
बिहार की जातिगत गणना में मुस्लिम आबादी को 3 कैटेगरी में बांटा गया है. मुस्लिम समुदाय के सबसे उच्च तबके में शेख, सैयद और पठान आते हैं. सर्वे की मानें तो अगड़े मुसलमानों की आबादी 4.8044 फीसदी है, जबकि बैकवर्ड मुसलमान 2.0321 फीसदी हैं. मुस्लिम आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा अति पिछड़े मुसलमानों का है. कुल मुसलमानों में करीब 10.5843 फीसदी अति पिछड़े मुसलमान हैं.
अब तक यही देखने को मिला है कि मुसलमानों को अल्पसंख्यक कह कर संबोधित किया जाता रहा है. सच्चर कमेटी में भी यही सामने आया कि मुसलमानों के हालात अन्य समुदायों के मुकाबले काफी खराब हैं. लेकिन बिहार का जातिगत सर्वे बता रहा है कि 17 फीसदी मुसलमानों में 10 फीसदी की हालत सबसे खराब है जिन्हें अति पिछड़े तबके में रखा गया है. यानी यहां भी फॉरवर्ड और बैकवर्ड में बांट दिया गया है.
3. मुसलमानों की तरह यादव उपजातियों की गणना क्यों नहीं हुई?
अगर मुस्लिम समुदाय और यादवों को लेकर हुए जातीय सर्वे के आंकड़ों को ध्यान से देखें तो विरोधाभास ही नहीं, राजनीतिक चाल भी समझ में आती है. हैरानी की बात तो ये है कि मुस्लिम समुदाय को तो तीन वर्गों में बांट दिया गया है, लेकिन यादवों की उपजाति का कहीं कोई नाम ही नहीं नजर आ रहा है. फिर तो उन उपजातियों का सामाजिक आर्थिक परिदृश्य कभी सामने ही नहीं आ सकेगा.
सर्वे में पूरे यादव समाज को एक ही वर्ग का बताया गया है, जबकि बिहार में यादवों की चार मुख्य उपजातियां बतायी जाती हैं - किशनौत, मझरौत, कन्नौजिया या कान्यकुब्जा और गोरिया.
क्या ये अधिकारियों और कर्मचारियों की तरफ से किसी चूक की वजह से हुआ है या व्यवस्था ही ऐसी बनायी गयी थी?
4. आर्थिक सामाजिक आधार वाले आंकड़े कहां हैं?
बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय सिन्हा का आरोप है कि आंकड़े जल्दबाजी में जारी कर दिये गये हैं. जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी जैसे नेता भी आंकड़ों पर सवाल उठा रहे हैं - हालांकि, ये सभी नेता फिलहाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोधी खेमे के हैं.
सरकार की ओर से सर्वदलीय बैठक में बताया गया है कि शीतकालीन सत्र के दौरान आर्थिक और सामाजिक सर्वे के आंकड़ों को जारी किया जाएगा - सवाल ये है कि अगर सर्वे रिपोर्ट पूरी तरह तैयार नहीं थी तो आधा अधूरा जारी करने की क्या जरूरत थी?
5. आंकड़े विधानसभा में क्यों नहीं रखे गये?
सर्वे रिपोर्ट जारी किये जाने के बाद नीतीश कुमार ने अफसरों और कर्मचारियों की टीम को बधाई दी, और बताया, 'जाति आधारित गणना के लिए सर्वसम्मति से विधानमंडल में प्रस्ताव पारित किया गया था... बिहार विधानसभा के सभी 9 दलों की सहमति से निर्णय लिया गया था कि राज्य सरकार अपने संसाधनों से जाति आधारित गणना कराएगी - और दिनांक 02 जून, 2022 को कैबिनेट ने मंजूरी दी थी.'
बहुत अच्छी बात है, लेकिन सवाल है कि विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ था, तो ये आंकड़े प्रेस कांफ्रेंस में क्यों जारी कर दिये गये? अगर किसी तरह की जल्दबाजी ही थी तो क्या सर्वे के आंकड़ों पर बात करने के लिए बिहार विधानसभा का विशेष सत्र नहीं बुलाया जा सकता था? जैसे महिला आरक्षण बिल को लेकर संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था.