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बिलकिस बानो के दोषियों का वापस जेल जाना क्‍या भाजपा का नुकसान है?

बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद सभी 11 दोषी लोगों को फिर से जेल जाना होगा. कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस ने बीजेपी को फिर से कठघरे में खड़ा कर दिया है - लोक सभा चुनाव से पहले आया ये फैसला क्या कांग्रेस के लिए फायदेमंद और बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है?

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बिलकिस बानो केस के दोषियों की राजनीतिक रिहाई को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है
बिलकिस बानो केस के दोषियों की राजनीतिक रिहाई को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है

2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ जो हुआ, वह रोंगटे खड़े करने वाला था. पांच माह की गर्भवती बिलकिस से सामूहिक बलात्‍कार किया गया. जिसमें उसके गर्भस्‍थ बच्‍चे की मौत हो गई. इस हमले में बिलकिस के 7 अन्‍य परिजनों ने भी अपनी जान गंवाई. केस चला तो 19 आरोपियों में से 7 तो उम्रकैद की सजा हुई. बाकी सबूत के अभाव में छोड़ दिये गए. 

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दो साल पहले सजा पाए 11 दोषी भी गुजरात सरकार की 'दया' और 'कृपा' से बाहर आ गए. उनका सत्‍कार किया गया. समाज ने थू-थू की. सोशल मीडिया पर इस फैसले को कोसा गया. कुछ लोगों ने दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाया. 

सु्प्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को खरी-खोटी सुनाते हुए दोषियों को एक पखवाड़े में खुद को सरेंडर करने को कहा है. उन्‍हें दोबारा जेल जाना होगा. बिलकिस के मामले में समाज और अदालत की इस स्‍पष्‍टता से इतर इसका एक राजनीतिक पहलू भी है - 2002 दंगे के दोषियों में से एक की बेटी को गुजरात की जनता ने भारी बहुमत से विधायक बनाया है. 

कहा जा रहा है कि ये दोषी आगे चलकर फिर कानून की शरण में जा सकते हैं, और ये फिर 'दया' के पात्र बन सकते हैं. ऐसे दोषियों पर कई बार पार्टियां इसलिए भी 'दया' करती हैं, क्‍योंकि उन्‍हें जनता की 'कृपा' चाहिए होती है. 

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बिलकिस बानो केस में दोषियों के लिए अब और क्‍या रास्‍ते बचे हैं, उसमें भाजपा के लिए कितनी गुजाइश है. आइये, समझने की कोशिश करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया गुजरात सरकार का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो केस के दोषियों को दो हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश जारी किया है. कोर्ट ने 11 दोषियों की सजा में छूट दिये जाने के गुजरात सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है. 

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बिलकिस बाने का ट्रायल गुजरात से महाराष्ट्र ट्रांसफर किये जाने के कई कारण हो सकते हैं. ट्रायल में बताया माफी देने के अधिकार के जिक्र में उचित सरकार अर्थ ये है कि जहां केस की सुनवाई हो रही है. वो राज्य नहीं जहां अपराध हुआ है - और इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के फैसले को रद्द कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने फैसला सुनाते वक्त काफी सख्त टिप्पणी भी की है. 

 
1. सुप्रीम कोर्ट के 13 मई, 2022 का आदेश धोखाधड़ी से हासिल किया गया था.

2. बिलकिस बानो केस के दोषियों की सजा माफ करने का अधिकार गुजरात सरकार के पास नहीं था.

3. दोषियों को मिली सजा में छूट पर फैसला महाराष्ट्र सरकार को लेना था, गुजरात सरकार को नहीं.

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4. एक पीड़ित के तकलीफ का एहसास सभी को होना चाहिये, चाहे वो किसी भी धर्म या संप्रदाय की हो.

कब और कैसे हुई थी रिहाई 

मुंबई में सीबीआई के स्पेशल कोर्ट ने 2008 में बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. फिर बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी सजा पर मुहर लगा दी थी. 15 साल से ज्यादा की सजा काट लेने के बाद बिलकिस बानो केस के दोषियों में से एक राधेश्याम साह ने सुप्रीम कोर्ट में रियायत की गुहार लगाई थी. 

बाद में गुजरात सरकार की तरफ से माफी मंजूर होने के बाद 15 अगस्त 2022 को राधेश्याम शाह के साथ ही जसवंत नाई, गोविंद नाई, शैलेश भट्ट, विपिन चंद्र जोशी, केशरभाई वोहानिया, प्रदीप मोढ़वाडिया, बाकाभाई वोहानिया, राजूभाई सोनी, मितेश भट्ट और रमेश चांदना को गोधरा उप कारागर से रिहा कर दिया गया था - अब सभी को दो हफ्ते के भीतर जेल जाना होगा.

आगे जो भी हो, नफा किसे और नुकसान किसे होगा

बिलकिस बानो केस की कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन इसके राजनीतिक पहलू खास मायने रखते हैं. ऐसे में जबकि लोक सभा चुनाव होने में कुछ ही दिनों का वक्त बचा है, बीजेपी पूरे विपक्ष के निशाने पर आ गई है. 

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ साथ AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भी बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद बीजेपी को घेरा है. असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि बिलकिस बानो के बलात्कारियों को बीजेपी ने ही छुड़ाया था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अदालत के फैसले को बिलकिस बानो के संघर्ष की जीत बताया है. 

सोशल मीडिया साइट X पर राहुल गांधी लिखते हैं, चुनावी फायदे के लिए ‘न्याय की हत्या’ की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है... सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर देश को बता दिया कि ‘अपराधियों का संरक्षक’ कौन है... बिलकिस बानो का अथक संघर्ष, अहंकारी भाजपा सरकार के विरुद्ध न्याय की जीत का प्रतीक है.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी पोस्ट में लिखा है, कोर्ट के आदेश से बीजेपी की महिला विरोधी नीतियों पर से पर्दा हट गया है. असदुद्दीन ओवैसी का कहना है, 'बुनियादी बात ये है कि गुजरात में बीजेपी की सरकार रेपिस्ट की मदद करने का काम कर रही थी... बीजेपी के दो विधायकों ने ये सिफारिश की थी कि इन रेपिस्ट को छोड़ दिया जाये.'

बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई और सरेंडर दोनों की टाइमिंग ने मामले की राजनीति अहमियत बढ़ा दी है. राहुल गांधी और ओवैसी जैसे नेताओं के बीजेपी पर हमलावर होना भले ही रूटीन की बात हो, लेकिन फिलहाल खास वजह आने वाला आम चुनाव है. 

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रिहाई अगस्त, 2022 में हुई थी, और तब कुछ ही दिनों बाद गुजरात में विधानसभा के चुनाव होने वाले थे. और अदालत के आदेश पर सरेंडर ऐसे वक्त करना पड़ रहा है जब देश भर में आम चुनाव की तैयारी चल रही है. 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राजनीतिक विरोधियों को बीजेपी पर हमले का मौका आसानी से मिल गया है. अब चुनावों में घूम घूम कर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल बीजेपी को निशाना बनाएंगे. मोदी सरकार के 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' स्लोगन की दुहाई देंगे - और लोगों को समझाने की कोशिश करेंगे कि बीजेपी का असली चेहरा कैसा है? 

जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फर्जीवाड़े की बात कही गई है, वो तो और भी गंभीर है. बलात्कार के दोषियों को एक ऐसी सरकार जेल से रिहा करने को मंजूरी दे देती है, जो वो फैसला लेने का अधिकार ही नहीं रखती. 

रिहाई के बाद मामले ने काफी तूल पकड़ लिया था. लोगों का ध्यान ज्यादा इसलिए गया क्योंकि रिहाई के बाद दोषियों का फूल माला से स्वागत करने के बाद मिठाई खिलाई जा रही थी - फिर चुनाव का मौसम आया, और बीजेपी रिकॉर्ड वोटों से गुजरात विधानसभा का चुनाव जीत भी गई. 

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हो सकता है, मामला गुजरात का होने के कारण बीजेपी को कोई नुकसान न हुआ हो, लेकिन आम चुनाव में भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा ऐसा नहीं समझा जाना चाहिये. लेकिन अगर गुजरात दंगों के मामले को देखें तो बीजेपी के लिए राजनीतक रूप से फायदेमंद ही रहा है - और चुनावों के दौरान बीजेपी नेताओं की तरफ से 2002 के गुजरात दंगों का खास तौर पर जिक्र भी यही बताता है कि पार्टी वो वाकया लोगों के दिमाग से उतरने भी नहीं देना चाहती है. 

देश की न्याय व्यवस्था में दोषी को फांसी के फंदे पर लटकाये जाने के पहले तक अदालत में अपील का अधिकार है. ऐसे मामलों आधी रात को भी सुनवाई होते देखा गया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिलकिस केस के दोषियों के सामने अपील का अवसर तो है ही, बस गुजरात की जगह महाराष्ट्र में अपील करनी होगी. 

मुश्किल बस ये है कि आम चुनाव के नतीजे आने तक महाराष्ट्र सरकार भी ऐसे मामलों में कोई राजनीतिक फैसला नहीं लेगी. लिहाजा दोषियों को तब तक तो जेल में रहना ही होगा. लोक सभा के कुछ दिन बाद ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं - हो सकता है तब उनकी अपील पर महाराष्ट्र सरकार भी गुजरात सरकार की तरह ही फैसला ले.

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