हरियाणा लोकसभा चुनावों में बीजेपी को मिली शिकस्त (2019 के मुकाबले 2024 में बीजेपी केवल आधी सीट ही जीत पाई थी) और जाटों की नाराजगी को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषक इस राज्य में कांग्रेस के लिए माहौल को अनुकूल मान रहे हैं. पर भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह शतरंज की बिसात बिछा रही है, उससे यही लगता है कि कांग्रेस का रास्ता आसान नहीं बल्कि बहुत मुश्किल है.
लोकसभा चुनावों के दौरान भी जाटों और किसानों की नाराजगी देखने को मिली, जब बीजेपी के प्रत्याशियों को कई गांवों में घुसने नहीं दिया गया. इसके बावजूद बीजेपी ने 44 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी. कांग्रेस कुल 42 सीटों पर बढ़त बना सकी थी, जबकि आम आदमी पार्टी ने भी 4 सीटों पर बढ़त बना ली थी. मतलब साफ दिख रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में यहां कांटे की टक्कर है. बंसीलाल परिवार, जिंदल परिवार और जेजेपी से आए विधायक अगर पार्टी के एक से 2 परसेंट वोटों में बढ़ोतरी करने में सफल होते हैं तो बीजेपी राज्य में तीसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रच सकती है. यही नहीं कुछ और कारण हैं जो बीजेपी को कांग्रेस पर बढ़त दिला सकते हैं. आइये देखते हैं कैसे यह संभव हो रहा है.
1-दलबदलुओं के आने से बीजेपी कितनी मजबूत होगी
हरियाणा की राजनीति आयाराम गयाराम वाली रही है. यहां अन्य राज्यों के मुकाबले जनता दूसरी पार्टियों के नेताओं को जल्दी एक्सेप्ट कर लेती है. भारतीय जनता पार्टी का यह प्रयोग 2014 और 2019 में भी खूब सफल रहा है. यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी में आज हरियाणा के तीनों लाल ( देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल) के परिवारों से पार्टी भरी पड़ी है. भजनलाल के परिवार से कुलदीप बिश्नोई ही नहीं उनकी मां, पत्नी और बेटा सभी बीजेपी में हैं. बंसीलाल की बहू किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी भी बीजेपी में सम्मानित हो चुकी हैं. देवीलाल परिवार के रणजीत चौटाला और आदित्य चौटाला भी भारतीय जनता पार्टी में ही हैं.
किरण चौधरी को बीजेपी राज्यसभा भेज रही है. किरण चौधरी पांच बार विधायक रह चुकीं हैं, 2 बार मंत्री भी रही हैं और नेता प्रतिपक्ष पद को भी संभाला है. उनकी बेटी श्रुति चौधरी सांसद रह चुकीं हैं. कांग्रेस में गुटबाजी से तंग होकर उन्होंने बीजेपी में शामिल होने का फैसला किया. बंसीलाल परिवार का जाट समुदाय पर गहरा प्रभाव रहा है. मां-बेटी के बीजेपी में आने से बीजेपी को तोशाम, लोहारू, चरखी दादरी, भिवानी, बाडढ़ा और महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल, नांगल चौधरी और अटेली सीट पर फायदा मिल सकता है.
जेजेपी के दो बागी नरवाना विधायक रामनिवास सुरजाखेड़ा और बरवाला विधायक जोगी राम सिहाग जिस तरह चौधरी के राज्यसभा उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, उससे यही लगता है कि ये सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल होने वाले हैं. काला, सुरजाखेड़ा और सिहाग के भाजपा में शामिल होने के अलावा नारनौल विधायक राम कुमार गौतम, उकलाना विधायक अनूप धानक, टोहाना विधायक देवेंद्र सिंह बबली और गुहला विधायक ईश्वर सिंह ने अभी तक अपने अगले कदम की घोषणा नहीं की है. पर समझा जा रहा है कि देवेंद्र सिंह बबली को छोड़कर अन्य सभी बीजेपी का रुख कर सकते हैं. क्योंकि गौतम और धानुक ने किरण चौधरी की राज्यसभा उम्मीदवारी का समर्थन किया है. जेजेपी के विधायक अपने चुनाव क्षेत्रों में अपनी पार्टी के बल पर नहीं बल्कि अपने बल पर चुनाव जीतकर आए थे. जाहिर है कि बीजेपी में उनके आने से पार्टी को अच्छी खासी बढ़त मिल सकती है.
जिंदल परिवार के नवीन जिंदल और सावित्री जिंदल भी हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में आए हैं. नवीन जिंदल को आते ही लोकसभा टिकट मिल गया जिसे उन्होंने जीतकर अपनी उपयोगिता साबित कर दी. विधानसभा चुनावों में भी मां-बेटा की जोड़ी कई सीटों पर प्रभाव डाल सकती है.
2- आम आदमी पार्टी और जेजेपी के अलग चुनाव लड़ने से भी बीजेपी को फायदा मिल सकता है
हरियाणा में कुल 90 विधानसभा सीटे हैं. मतलब कि 46 सीटें जीतने पर कोई भी पार्टी सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल कर सकती है. लोकसभा चुनावों के आधार पर बीजेपी को कुल 44 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिलती दिख रही थी. जबकि 42 पर कांग्रेस और 4 पर आम आदमी पार्टी को बढ़त हासिल हुई थी. जाहिर है कि एक-एक सीट की लड़ाई है. लोकसभा चुनावों के आधार पर बीजेपी को बहुमत हासिल करने के केवल 2 सीटें और हासिल करनी है. अगर आम आदमी पार्टी अलग चुनाव लड़ती है, तो जाहिर है कि एंटी-बीजेपी वोटों का बंटवारा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनो के बीच ही होगा. इस कारण समझा जा सकता है कि कुल 4 और सीटों पर बीजेपी बढ़त बना सकती है. इसी तरह जेजेपी के अलग चुनाव लड़ने से भी एंटी बीजेपी वोटों के बंटने से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसी दशा में बीजेपी को हर हाल में फायदा होता ही दिख रहा है.
3- एंटी जाट सेंटिमेंट भी काम बना सकता है
हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन में पंजाबी हिंदुओं और पिछड़ी जातियों के लोगों की दुकान, मकान, गाड़ियों पर जिस तरह से हमले हुए थे वह भारत के इतिहास में नया था. जाट आरक्षण आंदोलन जिस तरह कुछ खास समुदायों के खिलाफ हिंसक हुआ था, उसके बाद से बीजेपी को पंजाबी और पिछड़ी जातियों के वोट एकमुश्त मिलने लगे हैं. बीजेपी ने राज्य की बागडोर एक पंजाबी मनोहर लाल खट्टर को थमा दी थी. यही कारण रहा कि पंजाबी समुदाय जाटों के गुस्से का शिकार बना.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में लगभग 30% आबादी ओबीसी समुदाय की है. उसके बाद दूसरे नंबर पर लगभग 25% के करीब जाट और लगभग 20% अनुसूचित जाति (एससी) के लोग हैं. पंजाबी समुदाय भी राज्य में 9 प्रतिशत के करीब है. लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने का लक्ष्य रखते हुए भाजपा ने ओबीसी को रियायतें प्रदान करने की झड़ी लगा दी है. भाजपा नेताओं का मानना है कि जाट वोट आपस में बंट सकते हैं. इसलिए राज्य में बीजेपी ने अन्य सभी समुदायों को एकजुट करना शुरू किया है. राज्य का सीएम इस समय नायब सैनी हैं जो ओबीसी समुदाय से आते हैं. राज्य बीजेपी का अध्यक्ष एक ब्राह्मण नेता को बनाया गया है. सरकार बनाने के लिए बीजेपी को कुल वोटों का सिर्फ 38-40% वोट चाहिए. जो ओबीसी, ब्राह्मण, पंजाबी और बनिया मिलाकर ज्यादा ही होते हैं.
4-44 लाख बीपीएल परिवारों के लिए मुफ्त स्कीमों की भरमार
भाजपा की मनोहर लाल खट्टर और फिर नायब सिंह सैनी सरकार ने कई ऐसी लुभावनी घोषणाएं की हैं जो सीधे वोट मिलने का चांस बढ़ाते हैं. इनमें आवास, मुफ्त परिवहन, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त इलाज से लेकर अन्य योजनाएं शामिल हैं. बीजेपी की गरीबोन्मुख योजनाओं का लाभ उसे लोकसभा चुनावों में भी मिला है. हरियाणा सरकार की महत्वाकांक्षी योजना परिवार पहचान पत्र के मुताबिक, राज्य में 63 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. इसके मुताबिक दो करोड़ 86 लाख की आबादी में से करीब 1 करोड़ 80 लाख लोग बीपीएल कार्ड धारक हैं. दरअसल, बीजेपी सरकार में गरीबी रेखा से नीचे के लिए आय सीमा बढ़ाकर ऐसे परिवारों की सीमा बढ़ा दी. सरकार ने बीपीएल श्रेणी में शामिल करने के लिए परिवारों की सालाना आय सीमा एक लाख 20 हजार रुपये से बढ़ाकर एक लाख 80 हजार रुपये कर दी थी. इसी तरह से बीजेपी सरकार ने सामाजिक पेंशन लेने के लिए पेंशनधारकों की आय सीमा बढ़ा दी थी ताकि अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सके. पहले दो लाख आय वालों तक को ही वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी पर अब बुढ़ापा पेंशन की आय सीमा में एक लाख की वृद्धि करते हुए तीन लाख रुपये कर दी थी. इस फैसले से सीधे 18 लाख लाभार्थी बढ़ गए थे.