2000 की शुरुआत में बीजेपी के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन से पूछा गया था कि उनकी पार्टी ने महाराष्ट्र में शिवसेना का छोटा भाई बनना क्यों स्वीकार किया, वो भी ऐसे समय में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार थी.
इस पर महाजन ने जवाब दिया था कि राजनीति में टाइमिंग सही होनी चाहिए. आज अटल बिहारी वाजपेयी देश के सबसे बड़े नेता हैं लेकिन महाराष्ट्र में हमें अभी भी बालासाहेब ठाकरे की जरूरत है. एक दिन, एक दिन शायद हमें शिवसेना की जरूरत नहीं होगी और उस दिन हम अपने बूते चलने की स्थिति में होंगे.
आज लगभग दो दशक बाद और बालासाहेब ठाकरे के निधन के 12 साल बाद बीजेपी ने आखिरकार प्रमोद महाजन का सपना पूरा कर लिया है. इसमें कोई शक नहीं है कि आज बीजेपी महाराष्ट्र की नंबर एक पार्टी है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी की उल्लेखनीय परफॉर्मेंस ने उसे ताकत दी है.
2014 में बीजेपी और शिवसेना ने 1988 में गठबंधन होने के बाद से पहली बार विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ा. नरेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी ने 122 और शिवसेना ने 63 सीटें जीती. यह स्पष्ट संकेत था कि महाराष्ट्र में अब कौन सी पार्टी हिंदुत्व की राजनीति का केंद्र बिंदु है.
2019 के चुनाव के बाद शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में शामिल होने का फैसला लिया. 2022 में शिवसेना को तोड़कर बीजेपी ने उसे कमजोर कर दिया. अब विधानसभा चुनाव में लगभग 90 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ बीजेपी ने संभावित रूप से महाराष्ट्र में एकाधिकार की स्थिति बना ली है.
बीजेपी बखूबी जानती थी कि महाराष्ट्र में दबदबा बनाने के लिए सबसे बड़ी बाधा कांग्रेस नहीं बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां हैं. ऐसे में एनसीपी ने पश्चिमी महाराष्ट्र में अपना प्रभाव बनाए रखा तो शिवसेना मराठी अस्मिता की झंडाबरदार रही. राज्य में सहयोगी पार्टियां होने के बावजूद हिंदू वोटों के लिए दोनों पार्टियां एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी भी हैं. लेकिन 25 सालों तक यह भगवा गठबंधन एक साथ रहा क्योंकि बीजेपी को महाराष्ट्र में स्थानीय स्तर पर लोगों से जुड़ाव के लिए शिवसेना की जरूरत थी. आरएसएस की पहचान दशकों से महाराष्ट्र में एक उच्च जाति यानी ब्राह्मणवादी समूह के रूप में थी लेकिन शिवसेना के साथ गठबंधन ने संघ परिवार को अधिक लोकप्रिय बनाया.
शरद पवार की एनसीपी के धनी नेताओं को एक-एक कर ईडी की रडार पर लाया गया, जिससे पार्टी कमजोर हो गई. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है जब 2023 में एनसीपी में टूट हुई तो पाला बदलने वाले कई नेताओं को ईडी की जांच का सामना करना पड़ा. दूसरी तरफ शिवेसना में टूट निजी महत्वाकांक्षा, ईडी के दबाव और वैचारिक दूरियों की वजह से हुई थी. कांग्रेस के साथ शिवसेना का गठबंधन एक ऐसा गठबंधन था जो आंतरिक विरोधाभासों से भरा हुआ था, जिससे शिवसैनिकों को भ्रमित और यहां तक कि विश्वासघात का अहसास हुआ. इससे यह सवाल उठा कि क्या वह पार्टी जिसने बाबरी मस्जिद को गिराने का श्रेय लिया था, अब उस पार्टी के साथ गठबंधन कर सकती है जिस पर राम के अस्तित्व पर सवाल उठाने का आरोप है? बीजेपी द्वारा उकसाए गए महत्वाकांक्षी एकनाथ शिंदे ने इस वैचारिक असंगति का इस्तेमाल खुद को बालासाहेब की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने के लिए किया, जबकि उद्धव ठाकरे खुद को संगठित ही करते रहे.
बीजेपी के लिए शिवसेना में टूट एक ऐसा अवसर था, जिसे वह भुनाना चाहते थे. मोदी और शाह के युग में बीजेपी ने क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन में भी केंद्र बिंदु के तौर पर स्थापित करने पर जोर दिया. लगातार दो लोकसभा चुनावों में बहुमत की वजह से पार्टी को यह विश्वास मिला कि वे अब क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन की शर्तें तय कर सकते हैं. असम में असम गण परिषद बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार में नंबर दो नजर आती है. गोवा में कभी दबदबा रखने वाली महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी अब बीजेपी सरकार का छोटा सा हिस्सा है. कर्नाटक में जेडीएस पार्टी सत्तारूढ़ सरकार में शामिल है. यहां तक कि बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, बीजेपी सही समय का इंतजार कर रही है. एनडीए के सहयोगी दल फिर चाहे वह चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी हो या फिर चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम, वे विचारधारा की वजह से नहीं बल्कि किसी न किसी मजबूरी की वजह से बने हुए हैं.
यहां तक कि एकनाथ शिंदे और अजित पवार दोनों अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि महाराष्ट्र में बिग बॉस कौन है. शिंदे ने खुद को आम आदमी के कल्याणकारी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने के लिए महिलाओं को नकद राशि ट्रांसफर की लाडकी बहिण योजना का इस्तेमाल किया. लेकिन शिंदे की लोकप्रियता बढ़ने के बाद भी वह बीजेपी पर निर्भर है. ठीक इसी तरह अजित पवार भले ही अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया से बाहर निकल आए हो लेकिन वह जानते हैं कि शॉर्टलिस्टिंग करते वक्त बीजेपी उनका पत्ता काट सकती है. एक तरह से क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय बटालियन की तरह हैं, जिन्हें हर कीमत पर अपने जनरल की आज्ञा का पालन करना है.
इससे यह सवाल उठता है कि क्या अब हम विपक्ष मुक्त महाराष्ट्र देखेंगे जैसा कि गुजरात में देखने को मिल रहा है? गुजरात में बीजेपी की जीत आसान थाी क्योंकि वहां विरोध में कोई क्षेत्रीय पार्टी नहीं थी. महाराष्ट्र में साहू-फूले-आंबेडकर जैसे समाज सुधारकों की विरासत ने बीजेपी के हिंदुत्व की विचारधारा को चुनौती दी. यहां पिछड़ी जाति और दलितों की राजनीति के केंद्र में वामपंथी राजनीतिक ताकतें हैं, जिससे संघ परिवार के लिए अपना प्रभाव बनाए रखना मुश्किल हो गया था.
आज शरद पवार और उद्धव ठाकरे दोनों ही अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहे हैं, क्योंकि दोनों ही अपनी पार्टियों पर अपनी पकड़ खो चुके हैं. कांग्रेस ने लोकसभा में मिली सफलता से जो गति पकड़ी थी, वह भी महाराष्ट्र में खो दी है. इसके विपरीत बीजेपी अब अगले पांच सालों का इस्तेमाल महाराष्ट्र की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कर सकती है. महाराष्ट्र बेशक गुजरात की तरह हिंदुत्व की प्रयोगशाला नहीं बन पाया है, लेकिन एक नई व्यवस्था जरूर स्थापित हो गई है. आरएसएस के लिए इससे बेहतर तोहफा और क्या हो सकता है, क्योंकि वह अगले साल अपना शताब्दी वर्ष मनाने की तैयारी कर रहा है.