संजय सिंह के रूप में भारतीय कुश्ती संघ को नया अध्यक्ष मिल गया है, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह का दबदबा वैसे ही कायम है - चुनाव नतीजा आने के बाद बीजेपी सांसद के पक्ष में ये बात डंके की चोट पर कही जाने लगी है.
बीजेपी सांसद बृजभूषण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण ने सोशल साइट X एक तस्वीर शेयर की है. तस्वीर में प्रतीक भूषण अपने पिता बृजभूषण शरण सिंह के आवास के गेट पर खड़े हैं, और हाथों में पोस्टर लहरा रहे हैं. पोस्टर में बृजभूषण शरण सिंह के साथ कुश्ती संघ के नये अध्यक्ष संजय सिंह की भी तस्वीर है - और पोस्टर पर लिखा है, 'दबदबा तो है... दबदबा तो रहेगा... ये तो भगवान ने दे रखा है.'
ये तो सही बात है. बृजभूषण शरण सिंह डंके की चोट पर ऐलान करके चुनाव जीते हैं. बृजभूषण सिंह के करीबी और कुश्ती संघ के पदाधिकारी संजय सिंह को 40 वोट मिले हैं, जबकि उनके खिलाफ मैदान में उतरीं अनिता श्योराण को महज सात वोट मिले हैं. अनिता श्योराण भी पहलवान रह चुकी हैं.
अनिता श्योराण की उम्मीदवारी पर भी ये कहते हुए सवाल उठाया गया था कि वो बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मामले में गवाह भी हैं. हरियाणा से आने वाली अनिता श्योराण राज्य की पुलिस सेवा में कार्यरत हैं, लेकिन अपना नामंकन उन्होंने ओडिशा इकाई के प्रतिनिधि के तौर पर दाखिल किया था.
बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगाने के बाद महिला पहलवान सड़क पर उतर आये थे. काफी दिनों तक जंतर मंतर पर धरना भी दिया था, जो केंद्र सरकार के आश्वासन के बाद खत्म हुआ था. महिला पहलवानों की शिकायत पर बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली पुलिस जांच और चार्जशीट फाइल करने के बाद केस की सुनवाई लगातार चल रही थी. लेकिन दूसरे जज को मामला ट्रांसफर किये जाने के बाद अब नये सिरे से अगले साल जनवरी से मामले की सुनवाई होगी.
कानूनी लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन उससे पहले बृजभूषण शरण सिंह ने अपने करीबी संजय सिंह को चुनाव जिता कर साबित कर दिया है कि यूपी की राजनीति में ही नहीं, कुश्ती की राजनीति में भी वो काफी ताकतवर हैं.
क्या पहलवानों ने हार मान ली?
भारतीय कुश्ती संघ का चुनाव तो खत्म हो चुका है, लेकिन राजनीति अब शुरू हुई है. कुश्ती संघ की राजनीति भी, और लोक सभा चुनावों की राजनीति के भी संकेत समझे जा सकते हैं.
भारतीय कुश्ती संघ का चुनाव जीतने के बाद संजय सिंह ने मीडिया से कहा, ‘ये देश के हजारों पहलवानों की जीत है... पिछले 7-8 महीनों में उनको नुकसान उठाना पड़ा है.'
और चुनाव हारने के बाद अनिता श्योराण का कहना था, "इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी... मुश्किल लग रहा था... उम्मीदें तो सबकी थीं... हम बच्चियों के लिए लड़ रहे थे.'
लेकिन जो कुछ संजय सिंह ने कहा उसमें मैसेज तो बृजभूषण सिंह के विरोधियों के लिए ही है. संजय सिंह का कहना था, 'अब कैंप आयोजित किए जाएंगे... जिनको कुश्ती करनी है वो कुश्ती कर रहे हैं... जो राजनीति करना चाहते हैं वे राजनीति करें!'
कुश्ती संघ के चुनाव नतीजे का असर तो 2024 के लोक सभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है. फिलहाल तो साक्षी मलिक ने विरोध जताते हुए कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी है, लेकिन क्या विरोध की वो आवाज भी शांत हो जाएगी?
बृजभूषण शरण सिंह अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बता कर आरोपों का काउंटर कर रहे थे. उनका कहना था कि पहलवानों का एक छोटा सा ग्रुप उनके खिलाफ खड़ा हुआ है, और उसके पीछे राजनीतिक सपोर्ट है. बाद में पहलवानों के विरोध प्रदर्शन में नेताओं की भी शिरकत नजर आने लगी थी. और ये बात भी होने लगी थी कि ये यूपी बनाम हरियाणा की लड़ाई है.
चूंकि एक तरफ बीजेपी के सांसद थे, इसलिए पहलवानों के पीछे हरियाणा के कांग्रेस नेताओं का समर्थन माना जाने लगा था - लेकिन चुनाव नतीजों को देखें तो यही लगता है कि पहलवानों के समर्थन में कोई खड़ा ही नहीं हुआ. यौन शोषण के आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन चुनाव नतीजे तो बृजभूषण शरण सिंह का ही पक्ष मजबूत कर रहे हैं.
अगर ये लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच की रही तो लोक सभा चुनाव 2024 में भी असर देखने को मिल सकता है - फिर तो ये भी देखना होगा क्या अखाड़े की तरह चुनावी मैदान में उतरने जा रही हैं? और क्या बीजेपी सांसद के खिलाफ साक्षी मलिक को कांग्रेस का समर्थन और सबूत के रूप में लोक सभा का टिकट भी मिलता है?
साक्षी मलिक के बाद बजरंग पूनिया ने भी विरोध में पद्मश्री लौटाने की घोषणा कर डाली है. सोशल मीडिया पर बजरंग पूनिया ने लिखा है, 'मैं अपना पद्मश्री पुरस्कार प्रधानमंत्री जी को वापस लौटा रहा हूं. कहने के लिए बस मेरा यह पत्र है. यही मेरा स्टेटमेंट है.' पहलवानों ने दिल्ली में धरने के दौरान हरिद्वार जाकर नदी में अपना मेडल बहाने का भी ऐलान किया था, लेकिन बाद में किसान नेता नरेश टिकैत के कहने पर वे मान गये थे.
कुश्ती संघ का चुनाव ऐसे वक्त हुआ है जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री को लेकर देश में जाट राजनीति शुरू हो गई है. साक्षी मलिक के संन्यास को लेकर अब कांग्रेस भी बीजेपी से पूछने लगी है कि क्या वो जाट की बेटी नहीं है?
बृजभूषण शरण सिंह के ताकतवर होने के मायने
एक बार एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में बृजभूषण शरण सिंह से हरियाणा से उनके चुनाव लड़ने को लेकर सवाल पूछा गया था. बृजभूषण शरण सिंह का जवाब था, हरियाणा मेरा प्रिय क्षेत्र है और अब तो मेरा और भी प्रिय क्षेत्र हो चुका है.
बृजभूषण शरण सिंह का दबदबा तो कानूनी लड़ाई में भी देखा ही जा चुका है. उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट न लगाया जाना और दिल्ली पुलिस का अदालत में जमानत का विरोध न करना तो ऐसे ही इशारे कर रहा है?
कानूनी लड़ाई लंबी चलेगी, लेकिन उससे पहले बृजभूषण शरण सिंह ने उनके खास समझे जाने वाले संजय सिंह को चुनाव जिता कर साबित कर दिया है कि कुश्ती की राजनीति में तो वो ताकतवर हैं ही, यूपी की राजनीति में भी उनकी हनक कायम रहने वाली है.
बृजभूषण शरण सिंह फिलहाल यूपी के कैसरगंज से लोक सभा सांसद हैं, और माना जाता है कि आस पास की कई सीटों पर उनका जबरदस्त प्रभाव है. बुरी तरह फंसने के बावजूद बीजेपी ने अपने सांसद के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया, जो उनकी ताकत का ही नमूना है.
ऐसा ही सपोर्ट यूपी से ही आने वाले केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी को भी मिला था. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के ताबड़तोड़ विरोध प्रदर्शनों के बावजूद उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. अजय मिश्रा को 2022 के यूपी विधानसभा की चुनावी रैलियों में भी देखा जा रहा था. शुरू में विरोध जताने के बावजूद तत्कालीन यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह भी खामोश हो गये. जब अजय मिश्रा की चुनावी मंचों पर मौजूदगी की तस्वीरें मीडिया में आईं, तब जाकर उनको छुपाया जाने लगा. चुनावों में उनको अमित शाह के साथ देखा गया था.
पहलवानों के आंदोलन के दौरान अखिलेश यादव और बृजभूषण शरण सिंह की नजदीकियां भी महसूस की गईं. बेशक अखिलेश यादव ने पहलवानों का सपोर्ट किया था, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह का कभी विरोध भी नहीं किया.
तब जो माहौल बना था, बृजभूषण शरण सिंह ने बीजेपी नेतृत्व को भी ये संकेत देने की कोशिश की कि अगर उनको साथ न मिला तो पाला बदलते उनको देर नहीं लगेगी. उनके इलाके में तो उनकी ही चलेगी, और जो साथ नहीं रहेगा उसे नुकसान भी उठाना ही पड़ेगा.
यौन शोषण के आरोपों के बावजूद बृजभूषण शरण सिंह ने अपनी ताकत तो दिखा ही दी है - ये बात अलग है कि पहलवानों के लिए लड़ाई मुश्किल हो गई है. महिला पहलवानों ने यौन शोषण के आरोप के कुश्ती संघ में व्यक्ति विशेष के दबदबे का मुद्दा भी उठाया था. उनकी एक मांग ये भी थी कि कुश्ती महासंघ के पैनल में महिलाएं भी सदस्य हों, लेकिन चुनाव जीतने वाले 15 सदस्यों में एक भी महिला नहीं है.
कुश्ती संघ के चुनाव नतीजे आने के बाद पहलवानों ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की, और उसी दौरान साक्षी मलिक ने कुश्ती छोड़ने की घोषणा की, 'अगर प्रेसीडेंट बृजभूषण जैसा आदमी ही रहता है... जो उसका सहयोगी है, उसका बिजनेस पार्टनर है... वो अगर फेडरेशन में रहेगा तो मैं अपनी कुश्ती को त्यागती हूं. मैं आज के बाद आपको कभी भी वहां नहीं दिखूंगी.'
ये कहते हुए साक्षी मलिक ने अपने जूते टेबल पर रख दिये और बोलीं, 'लड़ाई लड़ी... पूरे दिल से लड़ी... हम 40 दिनों तक सड़कों पर सोये और देश के कई हिस्सों से बहुत सारे लोग हमारा समर्थन करने आये... सभी को धन्यवाद जिन्होंने आज तक मेरा इतना सपोर्ट किया.'