केंद्रीय गृह मंत्रालय के पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) ने देश भर में पुलिस फोर्स पर अपनी रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में सभी राज्यों की पुलिस में खाली पदों, पुलिस में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व, पुलिस फोर्स के मॉर्डनाइजेशन और उनकी ट्रेनिंग के बजट जैसे अहम विषयों के 1 जनवरी 2023 तक के आंकड़े जारी किए गए हैं.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में करीब 21.41 लाख पुलिसकर्मी हैं, जिसका औसत करीब 646 लोगों पर एक पुलिसकर्मी का बैठता है. हालांकि, इसमें राज्यों के विशेष सशस्त्र पुलिस बल और रिजर्व बटालियन के पुलिसकर्मियों की संख्या भी शामिल है, जो रोजमर्रा की कानून-व्यवस्था नहीं संभालते और विशेष या आपात स्थितियों के लिए रिजर्व फोर्स के तौर पर रखे जाते हैं.
देश की कुल पुलिस फोर्स में महिलाओं का औसत 12 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है. कुछ राज्यों में पुलिस के पास अपना वाहन या स्पीडगन नहीं है तो कुछ पुलिस स्टेशनों में वायरलेस या मोबाइल फोन तक नहीं है.
हालांकि, कुछ स्तरों पर पुलिस के आंकड़ों में सुधार भी हुआ है, लेकिन अभी रास्ता काफी लंबा और चुनौतियों भरा है. ये चुनौतियां पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के खाली पदों, आधुनिकीकरण के उपकरणों की कमियों से लेकर पुलिस बलों में विविधता लाने को लेकर भी है.
5.82 लाख से ज्यादा पद खाली
सभी राज्यों में मिलाकर 27.23 लाख पदों में से कुल 5.82 लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पद खाली हैं. इनमें सबसे ज्यादा सिविल पुलिस के 18.34 लाख में से 4 लाख पद खाली हैं. बता दें कि सिविल पुलिस ही थाना क्षेत्रों में गश्त करने, मौका-ए-वारदात पर पहुंचने, किसी केस की छानबीन करने और कानून-व्यवस्था संभालने का काम करती है.
इसके अलावा, देश में जिला सशस्त्र रिजर्व पुलिस बल के 3.26 लाख पदों में करीब 87 हजार पद खाली हैं. वहीं, राज्य विशेष सशस्त्र बल के 3.95 लाख पदों में से 63 हजार और रिजर्व बटालियन के 1.69 लाख पदों में से 28.5 हजार पद भरे नहीं जा सके हैं.
'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2022' में पुलिसकर्मियों के स्वीकृत पदों और उनकी नियुक्ति के पिछले एक दशक का अध्ययन किया गया है. इसके मुताबिक इस दौरान पुलिसकर्मियों के स्वीकृत पद 18% बढ़कर 22.84 लाख से 26.89 लाख हो गए, जबकि उनकी नियुक्ति की दर 22% की तेजी से बढ़कर 17.23 लाख से 20.94 लाख हुई.
देखा जाए तो 10 साल में स्वीकृत पदों में करीब 4 लाख की बढ़ोतरी हुई और नियुक्ति करीब 3.70 लाख पुलिसकर्मियों की हुई और स्वीकृत पदों और असल नियुक्तियों में अंतर बढ़कर करीब 6 लाख का हो गया. इन खाली पदों को भरने में अब भी लंबा समय लगने वाला है.
UP में सबसे ज्यादा SI की भर्ती
2022 में देश में कुल 63,656 पुलिस कॉन्स्टेबलों की भर्तियां की गईं. इसमें से सबसे ज्यादा 10,459 कॉन्स्टेबल गुजरात में और उसके बाद 8,247 कॉन्स्टेबल बिहार में भर्ती किए गए. इसी साल 16,802 सब-इन्स्पेक्टरों की भर्ती की गई, जिसमें से सबसे ज्यादा सब-इन्स्पेक्टर 9,857 उत्तर प्रदेश में और उसके बाद 3,977 सब-इन्स्पेक्टर बिहार में भर्ती हुए.
एक जनवरी 2023 तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 4,984 IPS अफसरों के स्वीकृत पद हैं, जिसमें से 4,118 IPS अफसर नियुक्त हैं. इनमें से 458 IPS अफसर केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति पर हैं.
SC-ST और OBC का कितना प्रतिनिधित्व?
राज्यों ने पुलिस में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण की अलग-अलग सीमा तय की है. अनुसूचित जाति के लिए पुलिस में सबसे ज्यादा 25% आरक्षण पंजाब में है. इसके बाद 22% पद हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में आरक्षित हैं.
अनुसूचित जनजातियों के लिए पुलिस में आरक्षण की बात करें तो सबसे ज्यादा 85% पद मेघालय में आरक्षित हैं. इसके बाद 80% पदों के साथ अरुणाचल प्रदेश का नंबर आता है. वहीं, ओबीसी के लिए सबसे ज्यादा पद आरक्षित करने वाला राज्य नगालैंड है, जहां 100% पद आरक्षित हैं. दूसरे नंबर पर 50% पद तमिलनाडु ने आरक्षित किए हैं.
देश के चार चुनिंदा राज्यों की बात करें तो बिहार में SC पुलिसकर्मियों का औसत 19%, MP में 15.9%, राजस्थान में 15.2% और UP में 20.4% है. बिहार में ST पुलिसकर्मियों का औसत 3%, MP में 18.3%, राजस्थान में 14.5% और UP में 1.5% है. वहीं, बिहार में OBC पुलिसकर्मियों का औसत 51.4%, MP में 14.1%, राजस्थान में 16.4% और UP में 43% है.
देश भर में कॉन्स्टेबल से डिप्टी एसपी तक कुल SC पुलिसकर्मियों की संख्या 3.37 लाख है, ST पुलिसकर्मियों की संख्या 2.34 लाख और OBC पुलिसकर्मियों की संख्या 6.33 लाख है. अगर राष्ट्रीय स्तर SC, ST, OBC पुलिसकर्मियों का औसत निकाला जाए तो देश के कुल पुलिस फोर्स में 16.5% पुलिसकर्मी अनुसूचित जाति से, 11.5% पुलिसकर्मी अनुसूचित जनजाति से और 31.1% पुलिसकर्मी OBC समुदाय से आते हैं.
महिलाओं का अनुपात सिर्फ 12%
संसद और विधानमंडल में महिलाओं को भले ही 33% आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया हो, लेकिन देश के पुलिसबलों में औसतन अब भी यह आंकड़ा 12.32 प्रतिशत तक ही पहुंच सका है. महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व देने वाले पांच शीर्ष राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लद्दाख (29.65%), बिहार (23.66%), चंडीगढ़ (22.47%), आंध्र प्रदेश (21.48%) और तमिलनाडु (20.69%) हैं.
महिलाओं की आबादी पर प्रति महिला पुलिसकर्मी की बात करें तो यह औसत 2,549 है. राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस के अन्य विभागों में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या भी हतोत्साहित करने वाली है. देश भर में ट्रैफिक पुलिस में 6,694 स्पेशल ब्रांच (इंटेलिजेंस) में 4,038, उग्रवाद और आतंकवाद के लिए स्पेशल पुलिस यूनिट में 1,753 महिला पुलिसकर्मी तैनात हैं. यह बताता है कि पुलिस फोर्स में या समाज में भी महिलाओं के पुलिस में होने को लेकर सामूहिक सोच क्या है. देश में कुल महिला पुलिसकर्मियों की संख्या 2.64 लाख है और देश की पुलिस फोर्स में ट्रांसजेंडर्स की संख्या फिलहाल केवल 20 है.
6 राज्यों ने पुलिस बजट पर खर्च किया 0%
'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट' का अध्ययन बताता है कि दस साल की अवधि में प्रति पुलिसकर्मी होने वाला खर्च 445 रुपए से करीब तीन गुना बढ़कर 1,151 हो गया है. हालांकि, अब भी इसमें पुलिस की ट्रेनिंग पर होने वाला खर्च काफी कम है. BPRD के हालिया आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2022-23 में सात राज्यों में पुलिस को मिले बजट का ट्रेनिंग पर हुआ खर्च 0.00% है. ये राज्य और केंद्र शासित प्रदेश- कर्नाटक, केरल, मेघालय, लद्दाख, लक्षद्वीप, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर हैं.
छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों- नगालैंड, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, दादरा एवं नगर हवेली, चंडीगढ़, गोवा और असम ने पुलिस को मिले बजट का 0.01% से 0.49% हिस्सा ट्रेनिंग पर खर्च किया है.पुलिस ट्रेनिंग पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले टॉप-5 राज्यों में दिल्ली, उत्तराखंड, मिजोरम, मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं, जिन्होंने अपने पुलिस बजट का 1.88% से 3.88% तक हिस्सा पुलिस ट्रेनिंग में लगाया है.
282 पुलिस स्टेशनों में वायरलेस या मोबाइल नहीं
AI से वीडियो और वॉइस क्लोनिंग के जरिए अपराध के रोज नए केस सामने आ रहे हैं, लेकिन इससे निपटने के लिए पुलिस को राष्ट्रीय स्तर पर काफी समय लगने वाला है. देश के 282 पुलिस स्टेशनों में आज भी वायरलेस फोन या मोबाइल फोन नहीं है. 58 पुलिस स्टेशन आज की तारीख में बिना वाहन के ऑपरेट कर रहे हैं. हालांकि, इनमें से झारखंड के भी कुछ पुलिस स्टेशन हैं, जो रणनीतिक वजहों से पुलिस वाहनों का इस्तेमाल नहीं करते हैं.
फॉरेंसिक लैब में करीब आधे पद खाली
पुलिस जांच में अहम रोल निभाने वाली फॉरेंसिक लैब की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है. देश में कुल 711 फॉरेंसिंक साइंस लैब या मोबाइल फॉरेंसिक साइंस वैन उपलब्ध हैं. इसमें से 32 मुख्य लैब, 97 क्षेत्रीय लैब और बाकी 582 मोबाइल लैब हैं.
राज्यों की फॉरेंसिक साइंस लैब में डायरेक्टर से लेकर सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर रैंक तक 998 में से 393 पद खाली हैं. वहीं, साइंटिफिक ऑफिसर से लेकर साइंटिफिक असिस्टेंट रैंक तक 1473 में से 692 पद खाली हैं. सभी राज्यों की फॉरेंसिंक साइंस लैब के 4961 कर्मचारियों और अधिकारियों में से 2122 के पद खाली हैं. यही हाल रीजनल फॉरेंसिंक लैब का भी है, जहां 4249 में से 1957 पद खाली हैं. फॉरेंसिक यूनिट या डिस्ट्रिक्ट मोबाइल फॉरेंसिंक यूनिट में भी 1057 में से 687 पद खाली हैं.
3 राज्यों के पुलिस स्टेशन में CCTV-स्पीडगन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में 'परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह केस' में सभी पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के संबंध में कई निर्देश पारित किए. हालांकि, कई राज्य अब भी इस फैसले को पूरी तरह से लागू नहीं कर सके हैं.
सिक्किम, लक्षद्वीप और पुडुचेरी के पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं तो मणिपुर, नगालैंड और लक्षद्वीप पुलिस के पास स्पीडगन नहीं हैं. सिक्किम और पुडुचेरी पुलिस के पास 1-1 स्पीडगन है. देश के सभी पुलिस स्टेशनों की बात करें तो उनमें कुल 5.49 लाख सीसीटीवी कैमरे और 3,085 स्पीड गन हैं.
BPRD की रिपोर्ट हमारे सामने पुलिस फोर्स के आंकड़े पेश करती है. वहीं, 'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट' अलग-अलग राज्यों के न्याय देने की क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन करती है. इस रिपोर्ट में राज्यों की पुलिस भी एक अहम हिस्सा है. BPRD के 1 जनवरी 2023 तक के आंकड़े और 'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2022' का विश्लेषण बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस विभाग में खाली पदों की संख्या काफी ज्यादा है, पुलिस बजट का काफी कम हिस्सा इसके आधुनिकीकरण पर खर्च हो रहा है.
देश भर की फॉरेंसिक लैब में करीब आधे पद खाली हैं और पुलिस में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी काफी कम है. इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए पुलिस विभाग को अपनी नीतियां बनानी होंगी तभी पुलिस विभाग आम लोगों तक न्याय पहुंचाने के एक अहम टूल के रूप में सही मायनों में सफल हो सकेगा.
(ये विश्लेषण इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के वलय सिंह और भारत सिंह ने aajtak.in के लिए किया है.)