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गहलोत सरकार में बने 9 जिलों को खारिज कर आफत मोल क्यों ले रहे हैं सीएम भजनलाल शर्मा? | Opinion

अशोक गहलोत सरकार के दौर में बने 9 जिलों और तीन संभागों को रद्द कर राजस्थान की भाजपा सरकार ने कांग्रेस को हमला करने का मौका दे दिया है. सरकार का दावा है कि ये न तो व्यावहारिक थे और न ही जनहित में. लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर इन जिलों को रद्द करना ही था मुख्यमंत्री बनते ही भजनलाल ने पहला काम यही क्यों नहीं किया?

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अशोक गहलोत और भजनलाल शर्मा
अशोक गहलोत और भजनलाल शर्मा

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा अपने पिछले एक साल के कार्यकाल में पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ के अलावा कोई बड़ी उपलब्धि नहीं हासिल कर सके हैं. पिछले साल दिसंबर में सत्ता संभालने के बाद से अब तक का सबसे बड़ा फैसला है कि उन्‍होंंने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार द्वारा बनाए गए जिलों में आधे से अधिक को रद्द कर दिया है. ये जिले पिछले साल विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले बनाए गए थे. इनमें 17 जिलों में से 9 और तीन संभागों को रद्द कर दिया है. सरकार का दावा है कि ये न तो व्यावहारिक थे और न ही जनहित में. जाहिर है कि तमाम सवाल उठेंगे. सबसे बड़ा सवाल तो ये ही है कि अगर रद्द करना ही थे मुख्यमंत्री बनते ही पहला काम यही करते. करीब एक साल बाद फैसला लेना कि पूर्व कांग्रेस सरकार का फैसला ही गलत था,लोगों के गले नहीं उतर रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि नए जिले बनने से तमाम लोगों के रोजी रोजगार के साधन तो बढ़ते ही, रोजमर्रा के तमाम काम के अलावा विकास कार्यों को भी बल मिलता.

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कांग्रेस एक्शन में

भजनलाल सरकार ने पिछले 13 महीनों के कार्यकाल में अभी तक कोई एक फैसला ऐसा नहीं ले सके हैं जिसे यादगार माना जा सके. 2021 की सब-इंस्पेक्टर भर्ती रद्द करने या मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के इस्तीफे पर फैसला लेने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सीएम फैसला जल्दी नहीं ले सके. भजनलाल सरकार पहले ही टालमटोल करने वाली सरकार का आरोप लगता रहा है. अब सरकार के 9 नये बने जिलों को रद्द करने के फैसले ने कांग्रेस को सीएम भजनलाल को घेरने का एक और मौका दे दिया है. इस फैसले के बाद से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. बड़ी संख्या में लोगों ने राज्य सरकार के फैसले का विरोध किया है. बड़ी बड़ी रैलियां हो रही है. इन रैलियों में जुटने वाली भीड़ बता रही है कि राज्य सरकार ये फैसला उसके लिए राजनीतिक भूल साबित होने वाला है. कांग्रेस पार्टी भी तुरंत एक्शन मोड में आ गई है. प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में विपक्ष के नेता टीका राम जूली ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का काम शुरू कर दिया है.

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रद्द हुए जिलों का राजनीतिक समीकरण 

भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे खास बात यह है कि अभी तुरंत कोई उपचुनाव, विधानसभा चुनाव, स्थानीय निकाय चुनाव या नगर निकाय चुनाव नहीं होने वाले हैं. नहीं तो भजनलाल सरकार के इस फैसले का एसिड टेस्ट तुरंत हो जाता. इसलिए पार्टी के लिए यह राहत की बात है कि इस फैसले से उत्पन्न नाराजगी को दूर करने के लिए उसके पास पर्याप्त समय है. राजस्थान के कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहते हैं कि हम इस फैसले को राजनीतिक रूप से नहीं देखते. हम जनता और राष्ट्र के हित को प्राथमिकता देते हैं, हम राजस्थान के हित को देखते हैं.

मतलब साफ है कि जोगाराम को भी लगता है कि आम जनता इस फैसले को सही नहीं समझ रही है. पटेल का कहना है कि कांग्रेस ने ज्यादातर नए बने जिलों में हार का सामना किया. जो नए जिले बनाए गए हैं वहां 51 विधानसभा सीटें हैं.जिसमें बीजेपी ने 29 सीटें जीतीं हैं, जो 2018 की 15 सीटों से लगभग दोगुनी हैं. 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की माने तो रद्द किए गए नौ जिलों में, जोधपुर और जयपुर ग्रामीण सीटों को छोड़कर, तीन-तीन सीटें बीजेपी और कांग्रेस के पास थीं, जबकि सांचोर को एक निर्दलीय ने जीता था. आठ नए जिलों को जो बरकरार रखा गया है, उनमें से लगभग सभी केंद्र विधानसभा क्षेत्रों - बालोतरा (पचपदरा विधानसभा), ब्यावर, डीग, खैरथल-तिजारा, फलोदी, सलूम्बर और कोटपूतली-बहरोड़ - पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि बीजेपी के बागी युनूस खान, जो निर्दलीय विधायक हैं, दीदवाना-कुचामन जिले के अंतर्गत आते हैं.

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भजनलाल का जवाब देना क्यों हुआ मुश्किल

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिन नए जिलों को रद्द नहीं किया गया है उसमें खुद मुख्यमंत्री शर्मा का पैतृक जिला डीग और महंत बालकनाथ का तिजारा भी शामिल है. मुख्यमंत्री को अपने नवनिर्मित गृह जिले को भी रद्द करके मिसाल बनानी चाहिए थी. इससे तो यही लगता है कि नए जिले बनाने का बोझ सीएम खुद अपने जिले को नहीं मानते हैं. हालांकि उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा का डूंगरपुर रद्द कर दिया गया है. पर जिस तरह बैरवा ने इस फैसले पर मुहर लगाने वाली कैबिनेट बैठक से किनारा कर लिया उससे यही संदेश गया है कि वो इस फैसले से नाखुश हैं. डूंगरपुर का रद्द किया जाना बीजेपी के लिए खराब छवि साबित हो सकता है, क्योंकि बैरवा दलित समुदाय से आते हैं और विपक्ष इसे यह साबित करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है कि सरकार में दिखने वाले शक्तिशाली नेता भी वास्तव में शक्तिहीन हैं. 

सीएम के नवनिर्मित जिले को रद्द न करने का मामला पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने भी उठाया है. शर्मा सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने पूछा है कि डीग को जिला क्यों रखा गया, जबकि भरतपुर (इसके पूर्व जिला मुख्यालय) केवल 38 किमी दूर है, जबकि सांचोर और अनूपगढ़ को रद्द कर दिया गया, जबकि सांचोर-जालोर और अनूपगढ़-गंगानगर की दूरी क्रमशः 135 किमी और 125 किमी है. गहलोत के सवालों में दम तो है , इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.

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फलोदी और पचपदरा को जिला बनाने की मांग लंबे समय से चल रही थी. 2022 में कांग्रेस के तत्कालीन पचपदरा विधायक मदन प्रजापत ने यह घोषणा की थी कि जब तक यह मांग पूरी नहीं होती, वह जूते-चप्पल नहीं पहनेंगे. इसलिए सरकार का यह भी तर्क कि नए जिलों की डिमांड ही नहीं थी , यह भी गलत साबित होता है.

गहलोत मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हैं कि मध्यप्रदेश में राजस्थान से छोटे क्षेत्रफल के बावजूद 55 जिले हैं. गहलोत कहते हैं कि प्रशासन की पहुंच, सुविधाओं और योजनाओं की आपूर्ति, समस्याओं का त्वरित निवारण और कानून-व्यवस्था का प्रबंधन छोटे क्षेत्र वाले जिलों में अधिक कार्य कुशल बनाता है.
 

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