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चंपाई सोरेन का हाल भी मरांडी जैसा होगा, वोटकटवा बन कर रह जाएंगे

चंपाई सोरेन का नई राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला काफी जोखिम भरा हो सकता है. आगे बढ़ने से पहले उनको कम से कम दो नेताओं बाबूलाल मरांडी और कैप्टन अमरिंदर सिंह का ट्रैक रिकॉर्ड जरूर देखना चाहिये - वैसे, विकल्प तो और भी हो सकते हैं.

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चंपाई सोरेन बेशक अपनी राजनीतिक पार्टी बनायें, लेकिन विकल्प और भी है.
चंपाई सोरेन बेशक अपनी राजनीतिक पार्टी बनायें, लेकिन विकल्प और भी है.

चंपाई सोरेन ने अपने सामने तीन विकल्प बताये थे, और अब एक चुन लिया है. फाइनल है. कह रहे हैं, राजनीति से संन्यास नहीं लेंगे. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री ने तीन में से एक विकल्प राजनीति से संन्यास लेना भी बताया था. बाकी दो विकल्प थे, अपने लिए नई राजनीतिक पार्टी बनाना या फिर किसी और के साथ नया राजनीतिक सफर शुरू करना. 

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सोशल साइट X पर एक लंबी पोस्ट लिख कर झारखंड के मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने पर चंपाई सोरेन ने गहरी नाराजगी जताई थी, और जिन परिस्थितियों में ये सब हुआ उसे अपना अपमान बताया था. तभी दिल्ली का भी दौरा किया था, लेकिन लगता है काम नहीं बना.

दिल्ली दौरे के वक्त चंपाई सोरेन के बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की बात कही जा रही थी. दावे तो यहां तक किये जा रहे थे जैसे उनका बीजेपी ज्वाइन करना पक्का हो चुका हो. JMM यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा और बीजेपी दोनो ही तरफ से ऐसे रिएक्शन भी आने लगे थे. अब तो लगता है या तो सब अफवाह था, या फिर कोई डील पक्की नहीं हो पाई. 

चंपाई सोरेन के दिल्ली से बैरंग लौट जाने के बाद तो ऐसा लगता है झारखंड में भी पंजाब जैसा प्रयोग होने जा रहा है. बीजेपी के पास ये मौका तो था ही कि चंपाई सोरेन को पार्टी में शामिल कर ले, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चुनावों से पहले ये होता रहता है. हर जगह, और हर पार्टी में. अपना नफा-नुकसान देखकर नेता आते-जाते रहते हैं.

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एक बात ये भी देखी गई कि चंपाई सोरेन की नाराजगी के बाद हेमंत सोरेन की तरफ से उनको मनाने की कोशिश नहीं हुई. वो भी तब जबकि चंपाई सोरेन को हेमंत सोरेन पहले पिता जैसा सम्मान देते रहे हैं, और वो भी हेमंत सोरेन और कल्पना सोरन दोनो को बच्चों जैसा ही अपनत्व दिखाते रहे हैं. 

झारखंड से ये भी सुनने में आ रहा है कि हेमंत सोरेन की तरफ से चंपाई सोरेन को मनाये जाने की जगह उनके समर्थक विधायकों को अपने पाले में बनाये रखने पर काम किया गया, और इस मामले में वो काफी हद तक सफल भी बताये जा रहे हैं. 

ऐसा लगता है, चंपाई सोरेन अपने साथ उतने विधायकों का नंबर नहीं दिखा सके जिससे बीजेपी में उनको ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह मान सम्मान मिल सके, लिहाजा उनके साथ भी सचिन पायलट जैसा मामला हो गया. 

अब संन्यास न लेने की सूरत में तात्कालिक तौर पर, चंपाई सोरेन के पास अपनी पार्टी बनाने का ही विकल्प बचा था, लिहाजा उसी लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं - सबसे बड़ी मुश्किल है कि ये लाइन काफी जोखिमभरी है, और कम से कम ऐसे उदाहरण हैं जिनमें दोनो ही नेताओं को नाकामी मिली है. 

एक मिसाल तो बाबूलाल मरांडी ही हैं, जो झारखंड से ही आते हैं. बाबूलाल मरांडी फिलहाल झारखंड बीजेपी के अध्यक्ष भी हैं - और दूसरे नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह है, जिनका ट्रैक रिकॉर्ड चंपाई सोरेन के लिए नसीहत हो सकती है. 

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चंपाई के मामले में मरांडी सटीक मिसाल हैं

बाबूलाल मरांडी को भी चंपाई सोरेन की ही तरह मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था. बिहार से अलग झारखंड जब राज्य बना तो बाबूलाल मंराडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनको हटाकर अर्जुन मुंडा को कुर्सी पर बिठा दिया गया. 

2006 में जब बाबूलाल मरांडी ने बीजेपी छोड़ने का फैसला किया तब वो कोडरमा से सांसद थे, और 2004 के चुनाव में भी वो जीते थे जब यशवंत सिन्हा जैसे नेता अपनी सीट नहीं बचा पाये थे. ये वही साल था जब केंद्र में भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हार के कारण बीजेपी को सत्ता गंवानी पड़ी थी. 

बीजेपी के कुछ नेताओं से अनबन के कारण बाबूलाल मरांडी ने संसद की सदस्यता और पार्टी छोड़ कर अपनी नई पार्टी बना ली थी. उनके इस्तीफे के कारण उपचुनाव हुए तो वो निर्दल चुनाव लड़े और फिर जीत गये. 2009 का भी लोकसभा चुनाव जीता था. 

लोकसभा चुनाव में तो वो जीत जाते, लेकिन विधानसभा चुनाव में वो कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये. बाबूलाल मरांडी ने जब अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा बनाई तो बीजेपी के पांच विधायक उनके साथ बने रहे. तालमेल के साथ चुनाव लड़कर भी बाबूलाल मरांडी 2009 के झारखंड विधानसभा में 11 सीटें ही जीत पाये. 2014 में बाबूलाल मरांडी की पार्टी को महज 8 सीटें मिलीं, लेकिन वो अपनी सीट भी हार गये थे - जो रही सही कसर थी वो 6 विधायकों ने बीजेपी में जाकर पूरी कर दी. 

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ये बड़ा सवाल रहा है कि जो नेता बीजेपी को राज्य में सत्ता दिला देता हो, निर्दल चुनाव लड़ कर भी जीत जाता हो, वो विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की जीत क्यों नहीं सुनिश्चित कर पाता? 

ऐसे तो तमाम कारण हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर एक ही बात समझ में आती है, वो ये कि लोग बाबूलाल मरांडी को लेकर कन्फ्यूज रहे. चुनावों में झारखंड के लोग बाबूलाल मरांडी को बीजेपी से अलग करके देख ही नहीं पाये - लोगों को शायद कभी लगा ही नहीं कि बीजेपी और JMM के अलावा झारखंड में बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा भी एक विकल्प हो सकती है. थक हार कर बाबूलाल मरांडी ने 2020 में झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी में विलय कर लिया - और लगता नहीं कि चंपाई सोरेन का बीजेपी में आना उनको जरा भी अच्छा लगेगा. 

लोग बाबूलाल मरांडी में हमेशा बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री की छवि ही देखते रहे, और अलग से उनके बारे में कोई राय बना ही नहीं पाये - चंपाई सोरेन के मामले में तो एक और भी दिक्कत है, उनके नाम में भी 'सोरेन' होना. 

चंपाई ने अलग पार्टी बनाई तो वोटकटवा बन कर रह जाएंगे

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वक्त की अहमियत सबसे ज्यादा होती है. और चंपाई सोरेन के मामले में मुश्किल ये है कि चुनावी तैयारी के लिए उनके पास बिलकुल भी वक्त नहीं है. करीब करीब ऐसी ही परिस्थितियां 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान भी बनी थीं. 

कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी कांग्रेस ने पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया था. उनकी जगह चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया. कैप्टन अमरिंदर सिंह तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहते भी बीजेपी नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलते रहते थे, लेकिन आखिर तक बात नहीं बनी. बीजेपी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके परिवार को पार्टी में शामिल तो किया, लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद ही. 

चुनावों से ठीक पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी पार्टी बनाई थी. पंजाब लोक कांग्रेस. जैसे तैसे चुनाव भी लड़े, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. न ही वो बीजेपी को ही कोई फायदा दिला सके. फायदा तो कांग्रेस को भी नहीं हुआ, क्योंकि पंजाब में भी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की तरफ बंपर जीत हासिल कर सरकार बना ली. कैप्टन अमरिंदर सिंह का अक्स चंपाई सोरेन चाहें तो जम्मू-कश्मीर के नेता गुलाम नबी आजाद में भी देख सकते हैं, क्योंकि उनकी राजनीति में करीब करीब उसी मोड़ पर खड़ी है. कहने को तो वो भी अपनी पार्टी बनाये हुए हैं. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा के चुनाव भी होने जा रहे हैं. 

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देखें तो झारखंड में JMM का हाल वैसा तो बिलकुल नहीं है, जैसा 2022 में कांग्रेस का हो गया था. हो सकता है, अपनी पुरानी पार्टी, जिसके संस्थापकों में वो शामिल है, को अपने कोल्हान क्षेत्र में कुछ नुकसान पहुंचाकर चंपाई सोरेन बीजेपी को कुछ फायदा पहुंचा दें - लेकिन खुद तो वो वोटकटवा बन कर ही रह जाएंगे. 

और ऐसा भी नहीं है कि चंपाई सोरेन के पास कोई चौथा विकल्प नहीं है. बाबूलाल मरांडी की तरह निर्दल चुनाव लड़कर वो भी जीत सकते हैं. उनके समर्थक भी उनकी किसी पसंदीदा पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत सकते हैं, और ऐसा करके किंगमेकर की भूमिका में तो आ ही सकते हैं. 

झारखंड में ही मधु कोड़ा का मुख्यमंत्री बनना, और तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास को हराकर सरयू राय का बदला लेने जैसी मिसालें कायम हैं - चंपाई सोरेन के लिए ये बातें सबसे बड़ा सबक भी हैं, और नसीहत भी.

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