घर भले पुरुषों का हो, लेकिन रसोई सिर्फ औरत की है. पूरे घर में ये अकेला ऐसा कमरा है, जिसमें घर के मर्द की कोई साझेदारी नहीं. तो बोलने से काम नहीं चलेगा, याद दिलाने से भी नहीं, और गुस्सा करने से तो बिल्कुल-बिल्कुल नहीं. आपको पुचकारना होगा. 10 बहाने सोचने होंगे. बिल्कुल वैसे ही जैसे नखरीले बच्चे को खाना खिलाते हुए मां नए-नए तरीके सोचती है. कुछ वैसा ही रंगारंग कीजिए ताकि खाली टाइम में पुरुष भी चावल-सब्जी से लिथड़े बर्तन धोकर चमका सकें.
467 ईसापूर्व की बात है, जब ग्रीक प्लेराइटर इस्कलस (Aeschylus) ने खूब सोचकर कहा- औरतों को घर पर रहने दो, तभी तुम शांति से रह सकोगे. इस सबक के साथ ही सिलसिला चल निकला. औरतें घर पर छोड़ दी गईं. मोटापा न आ जाए, इसलिए मजबूरी में वे हाथ-पैर भी हिलाने लगीं. गोश्त पकाना, फल-सब्जियां तराशना, रोटी-चावल पकाना. इन सबके बीच दूसरे हल्के-फुल्के काम, जैसे बर्तन मांजना, झाड़ू-पोंछा.
लंबी फिल्म के बीच एडवरटाइजमेंट की भूमिका
इधर मर्द जंगलों में शिकार करते. कस्बे की सीमा बढ़ाते. और लूटपाट से औरतों-बच्चों को बचाते. भाले-बर्छियों से छिदे जब वे घर लौटते तो बस एक ही उम्मीद होती कि ताजा खाना और साफ बिछावन मिल जाए. यहीं से रसोई संभालने का हुनर स्त्री में उतना ही जरूरी बन गया, जितना इंसान में इंसानियत.
वो औरत ही क्या, जो पल भर में दसियों किस्म के पकवान बनाकर न परोस दे.
बचपन का बड़ा हिस्सा नानीघर में बीता. इतवार की दोपहर वहां मेल-मुलाकातों के नाम रहती. मैं भी बड़ों संग टंगकर यहां से वहां जाती. आमतौर पर जहां पहुंचो, बहुएं तीर की तरह भाग-भागकर काम करतीं. पानी खत्म हो, उससे पहले नाश्ता आ जाता, और नाश्ते का पहला निवाला चुभला रहे हों, उतने में चाय आ जाती. लेकिन कुछ बहुओं की बात ही अलग थी. उनके बारे में कहा जाता- ‘चाहे 50 पहुना (मेहमान) एक साथ आ जाएं, जितनी देर में वो हाथ धोएंगे, उतने में चार किस्म की सब्जियां और दाल-भात बनकर तैयार हो जाएगा’.
‘जितनी देर में सांस लेकर छोड़ोगे, उतनी देर में खाना पककर परस भी चुका होगा’.
मैं बच्ची थी. आदर्श बहू की झांकी दिल में खौफ बनकर बैठ गई
यूनिवर्सिटी में एक अमेरिकी दोस्त अक्सर गुम रहती. दोस्ती बढ़ने पर पता लगा कि उसने ग्रीक लड़के से शादी की और लंबे समय बाद भी उनकी कोई संतान नहीं. अब सास-ससुर ताना मारते हैं कि न तो खाना बनाना जानती है, न वंश बढ़ाना. लड़की तेजतर्रार थी. पुरानी एंकर रह चुकी. लेकिन उसका असल इस्तेमाल खाना बनाना और परिवार बढ़ाना था. परेशान दोस्त खकुवाकर पढ़ने चली आई.
वो खुशकिस्मत थी, लेकिन हरेक औरत न अमेरिकी होती है, न एंकर और न ही हिम्मती. वो बस औरत होती है, जो हर हाल में खुद को उपयोगी साबित करना चाहती है.
सास खुद को बहू से उपयोगी साबित करेगी, बहू खुद को ननद से जरूरी दिखाएगी
दूसरों की क्या कहूं, दो-चार दिन पहले मैं खुद हैक्स देख रही थी कि घर के काम जल्दी से जल्दी कैसे निबटाएं. यूट्यूबर बता रही थी कि ब्रश करते हुए ही वो वॉशबेसिन धो देती, और टीवी देखते हुए सब्जी तराश लेती है. इससे टाइम बचता है जिसमें वो और नए काम कर (पढ़ें- खोज) लेती है.
ऐसा वीडियो मैं (या कोई भी कामकाजी औरत) क्यों देखती है, ये लिखने की शायद जरूरत नहीं!
साल 2019 में टाइम यूज सर्वे (TUS) ने पाया कि हिंदुस्तानी औरतें रोज औसतन 299 मिनट घर के कामों में, और 134 मिनट बच्चों या बूढ़ों की देखभाल में बिताती हैं. डेटा ये भी कहता है कि औरतों के हिस्से 82 प्रतिशत घरेलू काम आते हैं, फिर चाहे वे घर पर रहती हों, या दफ्तर जाएं. बल्कि पाया ये गया कि दफ्तर-वालियों पर घरेलू काम का ज्यादा दबाव रहता है क्योंकि वे जज की जाएंगी.
जी हां, बिखरा हुआ घर पूरी तरह से औरत की गलती है.
साल 2020 में एक स्टडी आई, जिसमें बताया गया कि महिलाओं को ही गंदे घर के लिए जिम्मेदार माना जाता है. इसके तहत लगभग साढ़े 6 सौ लोगों को एक तस्वीर दिखाई गई, जहां किचन से लेकर बाकी कमरे भी बिखरे हुए थे.
तस्वीर का एक साफ-सुथरा वर्जन भी था. देखने वालों ने गंदे को कम गंदा माना, जब उन्हें बताया गया कि फलां घर किसी पुरुष का है. वहीं साफ-सुथरी तस्वीर में भी कमियां खोजकर निकाली गईं. स्टडी ‘गुड हाउसकीपिंग, ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’ शीर्षक से सोशयोलॉजिकल मैथड्स एंड रिसर्च में छपी.
देसी-विदेशी, नए-पुराने, हिंदी-अंग्रेजी में कितने ही उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि भले दुनिया मंगल पर बस जाए, लेकिन बर्तन (अगर धोने पड़े) तो वहां भी औरतें ही धोएंगी. पिछले साल कोविड की सेकंड वेव के दौरान अमेरिका में एक विज्ञापन आया. एड सरकारी था, जिसमें लिखा था- ‘स्टे होम. सेव लाइव्स’. साथ में दो तस्वीरें थीं. एक में- सफाई, इस्तरी करती और खाना पकाती औरतें. दूसरी में- सोफे पर बैठा हुआ पुरुष. गुल-गपाड़ा मचा और रीत के मुताबिक विज्ञापन गायब हो गया.
औरतों के खिलाफ और हैं ऐड
विम लिक्विड का विज्ञापन कुछ नया नहीं. सिवाय इसके कि ट्रोल होने पर ब्रांड ने इसे ‘मजाक’ बता दिया. मिलिंद सोमन जैसे महंगे मॉडल के हाथ में एक नया प्रोडक्ट थमाकर किया गया मजाक!
प्रिय पुरुषों!
टिकिया चाहे काली हो, या नीली- झाग से नींबू की महक आए, या गुलाब की- बर्तनों में तो आप भी खाते हैं, तो सफाई का जिम्मा अकेला उनका क्यों? खाना साझा है तो रसोई साझी क्यों नहीं!