अरविंद केजरीवाल को 2013 के पहले ही दिल्ली विधानसभा चुनाव से दलितों का सपोर्ट मिलने लगा था. एक धारणा बनी हुई है कि आम आदमी पार्टी ने सबसे ज्यादा कांग्रेस को डैमेज किया है, लेकिन ये भी सच है कि आम आदमी पार्टी ने तो बहुजन समाज पार्टी का दिल्ली में सफाया ही कर दिया है. नुकसान तो बीजेपी को भी हो रहा है - लेकिन अरविंद केजरीवाल के पक्ष में चले जाने से बाकी सभी दल दलित वोट गवां बैठे हैं.
अरविंद केजरीवाल के राजनीति में आने से पहले की बात करें तो 2008 के चुनाव में 14.05 फीसदी वोट शेयर के साथ मायावती की बीएसपी ने दो सीटें जीती थी, लेकिन उसके बाद सीटें मिलनी तो दूर 2020 आते आते बीएसपी का वोट शेयर घट कर 1 फीसदी से भी नीचे पहुंच गया.
और दूसरी तरफ दलित वोटों में आम आदमी पार्टी की हिस्सेदारी चुनाव दर चुनाव बढ़ती ही चली गई है. पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें तो दलित वोटर का रुझान इंडिया ब्लॉक की तरफ ज्यादा दिखा है. दिल्ली के दलित वोटर को लेकर कराये गये एक सर्वे में पाया गया है कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को भी बीजेपी के मुकाबले ज्यादा दलित वोट मिले थे, जबकि बीजेपी लगातार तीसरी बार दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस तीनो की दलित वोटर पर खास नजर है, और दिल्ली की सुरक्षित 12 सीटों के अलावा भी दलित उम्मीदवार उतारे गये हैं, हालांकि इस काम में बीएसपी ही सबसे आगे नजर आती है.
दलित वोट बैंक पर सभी की नजर
दिल्ली चुनाव में 2013 से ही सबसे ज्यादा दलित वोट आम आदमी पार्टी को मिलते रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में 74 फीसदी जाटव दलितों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया था, जबकि 2020 में भी ये आंकड़ा 72 फीसदी ही पाया गया था.
2015 के चुनाव में बीजेपी को 15 फीसदी जाटव वोट मिले थे, जबकि 2020 तक ये आंकड़ा 22 फीसदी पहुंच गया था. कांग्रेस इस मामले में काफी पीछे नजर आती है. 2015 में कांग्रेस को सिर्फ 2 फीसदी जाटव वोट मिले थे, जबकि 2020 में मामूली बढ़त के साथ उसका दलित वोट शेयर 3 फीसदी पाया गया था. तीनो राजनीतिक दलों को मिले बाल्मीकि और अन्य दलितों के वोट देखें तो वोट शेयर का अनुपात तकरीबन वैसा ही नजर आता है.
2025 के चुनाव में टिकटों के बंटवारे में दलित समाज की हिस्सेदारी की बात करें तो बीएसपी के बाद सबसे ज्यादा दलित उम्मीदवार बीजेपी के हैं. 12 सुरक्षित सीटों के अलावा बीजेपी ने सामान्य सीटों पर भी दो दलित नेताओं को टिकट दिया है. बीजेपी के बाद नंबर आता है कांग्रेस का जिसके 13 उम्मीदवार दलित कैटेगरी से हैं, जबकि एक दलित उम्मीदवार सामान्य सीट से चुनाव लड़ रहा है. आम आदमी पार्टी ने सिर्फ 12 दलित नेताओं को टिकट दिया है, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव मैदान में हैं.
भरोसा केजरीवाल पर, लेकिन रुझान कांग्रेस की तरफ
दलितों और आदिवासियों के संगठन नैकडोर और द कनवर्जेंट मीडिया के सर्वे में पाया गया है कि दिल्ली का दलित समाज अरविंद केजरीवाल को ही पसंदीदा मुख्यमंत्री बता रहा है, लेकिन 5 फरवरी को वोट देने के मामले में रुझान राहुल गांधी की कांग्रेस की तरफ दिखा रहा है.
टीवी पैनलिस्ट और सर्वे की निगरानी करने वाले प्रेम कुमार बताते हैं, 52 फीसदी दलितों ने माना है कि लोकसभा चुनाव में उनका वोट आम आदमी और कांग्रेस गठबंधन को गया था. और ऐसे ही 46 फीसदी दलित मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वोट देने की बात मानी है - लेकिन महज 2 फीसदी दलित वोटर ही बीएसपी के पक्ष में खड़े रहने की बात मान रहे हैं.
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 के मुकाबले दलितों के बीच कांग्रेस के प्रति समर्थन बढ़ा है. पिछले चुनाव में कांग्रेस को 11 फीसदी दलित वोट मिले थे, जबकि इस बार 21 फीसदी दलित कांग्रेस को वोट देने की बात कर रहे हैं. दलित महिलाओं के वोट भी 9 फीसदी से बढ़कर कांग्रेस को इस बार 21 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है.
सर्वे देखते हैं तो पता चलता है, 53 फीसदी दलित मतदाताओं ने 2020 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को वोट देने की बात मानी है, लेकिन इस बार 44 फीसदी दलित वोटर ही केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में खड़े होने की बात कर रहे हैं, जो पिछले चुनाव के मुकाबले 8 फीसदी कम है. और ऐसे ही 33 फीसदी दलित वोटर 2020 में बीजेपी को वोट देने की बात मानते हैं. जबकि आने वाले चुनाव में 32 फीसदी दलित बीजेपी को वोट देने की बात कर रहे हैं.
सबसे बड़ी बात ये है, सर्वे के मुताबिक, बतौर मुख्यमंत्री 51 फीसदी दलित वोटर अरविंद केजरीवाल को ही बेस्ट मानते हैं - अरविंद केजरीवाल के पक्ष में अब भी ये बात सबसे ज्यादा मायने रखती है.