scorecardresearch
 

देवरिया सामूहिक हत्याकांड में हैं जातिगत संघर्ष के निशान, यह महज जमीन विवाद नहीं

बिहार में जातिगत जनगणना (caste census) जारी होने वाले दिन ही यूपी से देवरिया में दुबे परिवार के सामूहिक हत्याकांड की खबर आती है. इसे जो लोग जमीन विवाद का नाम दे रहे हैं, दरअसल वे मूल समस्या से मुंह मोड़ रहे हैं. यह हत्याकांड एक जाति के प्रति दूसरी जाति के नफरत का परिणाम है. जातियों के प्रति नफरत की भावना क्यों पैदा हो रही है, इसे समझने की कोशिश करते हैं...

Advertisement
X
देवरिया हत्याकांड
देवरिया हत्याकांड

एक तरफ बिहार के बाद पूरे देश में जातिगत जनगणना (caste census) को लेकर माहौल बन रहा है. तो दूसरी तरफ देवरिया हत्याकांड हो जाता है. जिसमें एक ब्राह्मण परिवार के 5 सदस्यों को करीब 77 लोग एकजुट होकर लिंच कर देते हैं. हमलावर यादव समुदाय से आते हैं. इस हत्याकांड को सामान्य जमीन विवाद का परिणाम मान लेना नीति नियंताओं के लिए भारी भूल साबित होने वाला है. जमीन विवाद में एक हत्या के बदले एक परिवार आरोपी परिवार के सभी लोगों को गोलियों से भून देता या तलवारों से काट डालता तो बात समझ में आती कि ये बदला लेने के लिए किया गया कृत्य है. पर यहां तो करीब 77 लोगों की भीड़ (पुलिस एफआईआर में 27 नामजद आरोपी और 50 अज्ञात) एक परिवार को, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी हैं, को पीट-पीट कर मार डालती है. मृतक प्रेम यादव का परिवार 77 लोगों का परिवार नहीं था. इसे परिवार कहकर केस को हल्का कर दिया जा रहा है. ये जीता जागता नफरत का एक नमूना है. जिसमें एक जाति दूसरे जाति के लोगों से इतना नफरत करती है कि उसे हर हाल में मिटा देना चाहती है.
गांव में बसे एक ब्राह्णण परिवार को कुछ लोग एक जुटकर मार डालते हैं ये रिवेंज जरूर है पर एक परिवार का दूसरे परिवार से नहीं है. ये रिवेंज है एक जाति का दूसरी जाति से. इसलिए ही ये जाति संघर्ष है. बिहार तो जातियों के सामूहिक हत्याकांड के लिए बदनाम रहा है पर यूपी में इस तरह की घटना पहली बार हुई है.

Advertisement

देवरिया की सामाजिक पृष्ठभूमि

बिहार के बॉर्डर पर स्थित देवरिया जिले और आसपास के गोरखपुर और कुशीनगर आदि ब्राह्णण वर्चस्व वाले जिले हैं. मंडल के बाद की राजनीति में भी यहां का लोकसभा सांसद ब्राह्णण ही होता रहा है.कांग्रेस, बीजेपी या समाजवादी पार्टी के भी एमएलए अधिकतर यहां ब्राह्णण ही होते रहै हैं. गोरखपुर बेल्ट (देवरिया भी कभी गोरखपुर का हिस्सा हुआ करता था) के ब्राह्णण पंडिताई जरूर करते रहे हैं पर हथियार उठाने में उन्हें कभी डर नहीं रहा. यही कारण रहा कि यहां की माटी में कुख्यात हरिशंकर तिवारी, अमर मणि त्रिपाठी, श्रीप्रकाश शुक्ला और राजन तिवारी जैसे माफिया पैदा होते रहे हैं. दूसरी तरफ आजादी के बाद यादव जाति का पुनर्जागरण हुआ है. यादव कभी बड़ी जातियों के लठैत हुआ करते थे , पर बाद में खुद सामंत बन गए. गोरखपुर से सटे आजमगढ़ जिले में मंडल की राजनीति की शुरुआत के पहले ही वे सामंत बन चुके थे. इस जिले के यादवों में आज 3 दशक पहले ही इतनी ताकत हो चुकी थी कि वे ठाकुरों के खेत काट लेने की हिम्मत रखने लगे थे. गोरखपुर के आस पास के जिलों में कभी सबसे बड़ा संघर्ष ब्राह्णण बनाम ठाकुर का हुआ करता था. पर अब इन जिलों में यादव जाति ब्राह्णण और ठाकुर दोनों को चैलेंज कर रही है.योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजपूतों पर सरकारी जाति बन जाने का आरोप है. बच गए पंडित जो अब कमजोर पड़ गए हैं.

Advertisement

बढ़ता जा रहा है प्रॉपर्टी डीलरों का खेल

देश में प्रॉपर्टी का धंधा सबसे चोखा बन गया है. इस धंधे में चमकने के लिए ताकत सबसे जरूरी है. यूपी के हर गांव कस्बे में प्रॉपर्टी डीलर सक्रिय हैं. जिस यादव परिवार का एक सदस्य जिला पंचायत का मेंबर है जाहिर है दबंग तो रहा ही होगा. इस घर का एक लड़का प्रॉपर्टी डीलर बन गया. उसका यही काम था झगड़े की जमीन कम कीमत पर खरीद लो, या किसी परिवार में कोई कमजोर हो तो उसे फोड़कर जमीन लिखवा लो.पंडित जी के परिवार में भी एक भाई मंदबुद्धि थे उनकी शादी नहीं हुई थी. प्रेम यादव ने उन्हें बहला फुसलाकर 10 बीघा जमीन औने पौने रकम देकर लिखवा ली और उन्हें गुजरात भेज दिया. बाद में पता चला कि उसे अपने ही घर में रखा हुआ था. पंडित परिवार के दूसरे भाई थे सत्यप्रकाश दुबे जिनकी शादी हुई थी और बाल बच्चे भी थे. घर चलाने के लिए कहीं गाड़ी वगैरह चलाते थे. एक बेटी भी घर चलाने के लिए ही कहीं छोटा मोटा काम करती थी.एक बेटा पुरोहिती करने लगा था. प्रेम यादव ने धोखे से जमीन लिखवाया ही था सड़क किनारे वाली जमीन हथियाना चाहता था. इसी बात का मुकदमा करीब 7 साल से चल रहा था. गरीब पंडित के पास मुकदमा तक लड़ने की औकात नहीं थी. प्रेम यादव को किसी ने भड़का दिया कि सत्यप्रकाश तुम्हारे कब्जा किए हुए खेत का मेढ़ गिरा रहे हैं. गुस्से में प्रेम यादव पंडित के घर पहुंचते हैं और गाली गलौज करते हैं. कमजोर सत्यदेव दुबे की जब पिटाई होने लगती है तो बचाने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हो जाता है. और प्रेम यादव की मौत हो जाती है. फिर पूरा गांव इकट्ठा होकर पंडित परिवार का खात्मा कर देता है.

Advertisement

योगी सरकार के सिस्टम का फेल्योर!
 
बताया जा रहा है कि मृतक परिवार ने अपनी पीड़ा और समस्या मुख्यमंत्री पोर्टल पर डाली थी. यह भी कहा जा रहा है कि एक बार नहीं कई बार मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत की गई थी. पोर्टल में क्लियर बताया गया था कि उनके परिवार को उक्त यादव परिवार से खतरा है. पोर्टल में यादव परिवार के और गुनाहों की भी जानकारी दी गई थी कि इसके बावजूद कोई एक्शन नहीं हुआ. ताकतवर लोग पूरी मशीनरी को अपने खिलाफ नहीं जाने देते बल्कि अपनी सुरक्षा में लगा लेते हैं.ऐसा ही यहां भी हुआ. यूपी सरकार अब तक करीब 16 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है. हो सकता है कि यादव परिवार के घर पर बुलडोजर भी चल जाए पर सत्यदेव पंडित का परिवार तो नहीं वापस आएगा.

पूर्वांचल में ब्राह्णण अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं

पूर्वी यूपी में कभी राजनीतिक रसूख ब्राह्णणों के हाथ में रहा है. अब हालत ये हो गई है कि न राजनीतिक रसूख है न सामाजिक ही. प्रेम यादव का परिवार भी बदला लेने के लिए पूरे पंडित परिवार का कत्ल कभी नहीं करता. क्योंकि सभी जानते हैं कि सामूहिक हत्याकांड को नरसंहार मान लिया जाएगा और पूरी मशीनरी आरोपी के परिवार के खिलाफ लग जाएगी और इसके बाद बरबादी तय हो जाती है. ये तो पंडित परिवार के खिलाफ फैला जहर था जिस पर गांव के लोग बिना कुछ सोचे समझे टूट पड़ते हैं और अपना जहर उड़ेल देते हैं. इसके लिए जिम्मेदार है जातियों की राजनीति . जातिगत सर्वे इस तरह के नफरत के लिए खाद बीज का काम करने वाला है.

Advertisement

पूरे प्रदेश में लगातार ब्राह्णणों पर हमले बढ़ रहे हैं. देवरिया के रहने वाले शैलेष बताते हैं कि सुल्तानपुर में ब्राह्णण डॉक्टर को भी प्रताड़ित करके एक प्रॉपर्टी डीलर ने मार दिया. उनका कहना है कि यूपी में ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं क्योंकि उन पर एक्शन नहीं हो रहा है. यूपी में फिर एक बार ऐसा हो गया है कि अफसर पीडि़त व्यक्ति की टाइटिल देखकर न्याय करते हैं. ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं तो निश्चित है कि ब्राह्मण फिर से एक बार गोलबंद होंगे.

Live TV

Advertisement
Advertisement