देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी के शानदार प्रदर्शन के साथ महाराष्ट्र की सत्ता में लौटी महायुति में सत्ता के समीकरण बदले हुए लग रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे अजित पवार को बीजेपी नेतृत्व हाथोंहाथ ले रहा है, और एकनाथ शिंदे को नजरअंदाज किया जाने लगा है.
बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद तो नहीं ही दिया, पोर्टफोलियो में भी अब तो लगता है उनके मनमाफिक मिलने से रहा. अजित पवार ने तो जैसे सरेंडर ही कर दिया है, शायद इसीलिए तकरार सिर्फ बीजेपी और एकनाथ शिंदे के बीच ही हो रही है.
नंबर के मामले में अजित पवार पहले भी एकनाथ शिंदे से पीछे थे, अब भी हैं. लेकिन, अजित पवार को भी एकनाथ शिंदे के बराबर ही अहमियत मिल रही है, और कभी कभी तो लगता है एकनाथ शिंदे से ज्यादा महत्व मिल रहा है.
महाराष्ट्र कैबिनेट में मुख्यमंत्री सहित ज्यादा से ज्यादा 43 मंत्री हो सकते हैं. विधानसभा की कुल 288 सीटें हैं, जिनमें बीजेपी 132 सीटें जीत चुकी है. महायुति में 57 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर शिवसेना है, और एनसीपी को 41 सीटें मिली हैं - लेकिन अजित पवार की दलील है कि उनका स्ट्राइक रेट अच्छा है, क्योंकि गठबंधन में अपने हिस्से की ज्यादा सीटें एनसीपी ने जीती है.
एकनाथ शिंदे की पूछ घटने का एक उदाहरण तो दिल्ली में अमित शाह के साथ हुई बैठक में उनका न होना ही है. मीटिंग में देवेंद्र फडणवीस के साथ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी शामिल थे - हैरानी की बात ये है कि मीटिंग के लिए एकनाथ शिंदे को बुलाया ही नहीं गया था.
एकनाथ शिंदे को जो मिलना था मिल चुका
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 11 दिसंबर को देर रात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनके आवास पर बैठक की. ये बैठक बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी के बीच महाराष्ट्र सरकार के विभागों के आवंटन को लेकर चल रही अटकलों के बीच हुई है.
एकनाथ शिंदे की गैरमौजूदगी काफी हैरान करती है. एकनाथ शिंदे के ऑफिस के सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि उनको दिल्ली की मीटिंग के लिए बुलाया ही नहीं गया था. 5 दिसंबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने देवेंद्र फडणवीस और डिप्टी सीएम अजित पवार दिल्ली में शिष्टाचार मुलाकातें कर रहे हैं - और यही वजह है कि एकनाथ शिंदे की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
शिंदे के दिल्ली न आने पर उठते सवालों पर अजित पवार कहते हैं, आप चिंता मत कीजिये... हम सब साथ-साथ हैं.
सुनने में आ रहा है कि एकनाथ शिंदे विभागों के संभावित बंटवारे को लेकर नाराज हैं. असल में एकनाथ शिंदे गृह और राजस्व विभाग चाहते थे, लेकिन बीजेपी नेतृत्व न देने के मूड में है. हुआ ये था कि जब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री थे, तो गृह विभाग डिप्टी सीएम रहे देवेंद्र फडणवीस के पास हुआ करता था - और अब एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम बनने के बाद वही व्यवस्था चाह रहे हैं, लेकिन बीजेपी है कि मान ही नहीं रही है.
सवाल ये है कि एकनाथ शिंदे के साथ ये बर्ताव क्यों हो रहा है? क्या बीजेपी की निगाह में एकनाथ शिंदे की आवश्यक उपयोगिता समाप्त हो चुकी है?
मौजूदा परिस्थितियों को देखने से तो ऐसा ही लग रहा है. एकनाथ शिंद से जो मिलना था, बीजेपी को पूरा मिल चुका है - और मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी भी ये मानकर चल रही है कि एकनाथ शिंदे को भी जो मिलना था मिल चुका है.
एकनाथ शिंदे का जरूरी इस्तेमाल इतना ही था कि उद्धव ठाकरे के पैरों के नीचे की जमीन खींच ली जाये. एकनाथ शिंदे ने ये टास्क अंजाम तक पहुंचा दिया है.
अब तो लगता है बीजेपी बस बची खुची चीजों पर काबिज होने के लिए ही एकनाथ शिंदे को ढो रही है. अभी बीएमसी का चुनाव होना है. उद्धव ठाकरे के लिए उसे आखिरी इम्तिहान समझा जा रहा है.
एकनाथ शिंदे की भी मजबूरी है. ज्यादा जिद वो कर भी नहीं सकते. जिद पर उतरे तो बीजेपी को नया 'एकनाथ शिंदे' खोजते देर भी नहीं लगेगी. एकनाथ शिंदे ये बात अच्छी तरह समझते हैं.
अजित पवार पर बीजेपी ज्यादा मेहरबान क्यों
पहले सुनने में आ रहा था कि बीजेपी कैबिनेट में 22-23 विभाग अपने पास रखेगी, और एकनाथ शिंदे से कुछ कम अजित पवार को मिलेंगे. लेकिन अब सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार के बीच नया फॉर्मूला तय हुआ है 20-10-10. नये फॉर्मूले के तहत बीजेपी 20 मंत्रालय अपने पास रखेगी, एकनाथ शिंदे और अजित पवार के खाते से 10-10 मंत्री बनेंगे.
मतलब साफ है, महायुति की नई सरकार में एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी से बराबर मंत्री होंगे. पिछली सरकार में शिवसेना के पास एनसीपी से एक ज्यादा विभाग था.
अजित पवार को मिल रही ज्यादा तवज्जो की खास वजह भी है. पहली बात तो ये कि एकनाथ शिंदे से पहले ही अजित पवार ने बीजेपी का खुलकर सपोर्ट कर दिया था.
जब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनने पर अड़े हुए थे, तभी अजित पवार ने सार्वजनिक तौर पर बोल दिया था कि वो बीजेपी के मुख्यमंत्री का सपोर्ट करेंगे. एकनाथ शिंदे अब भी विभागों को लेकर खफा बताये जा रहे हैं, और अजित पवार को पूरी महफिल लूट रहे हैं.
एकनाथ शिंदे जो टास्क पूरा कर चुके हैं, अजित पवार को उसे अंजाम तक पहुंचाना है. बीजेपी को एकनाथ शिंदे की जरूरत शिवसेना के वोट बैंक पर काबिज होने तक ही है, और तभी तक एकनाथ शिंदे की थोड़ी बहुत बातें मानी जानी हैं.
अजित पवार ने भी एनसीपी-कांग्रेस को बर्बाद करने का बीड़ा उठा रखा है, लेकिन अभी अंजाम तक पहुंचाना बाकी है. अजित पवार को भी ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है, ये आवभगत और अहमियत तभी तक है जब तक वो काम के हैं. एक दिन वो भी आएगा जब अजित पवार भी 'एकनाथ शिंदे' बन जाएंगे.