आज के दौर में, जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की मौजूदगी में हर जानकारी सिर्फ वन टच, वन टैप की दूरी पर है ऐसे में भारत के छोटे शहरों में रहने वाले लोगों को भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए “टैरिफ तांडव” के बारे में खूब जानकारी है. जैसे ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने लगभग सभी देशों के आयात पर जवाबी टैरिफ लगाए, दुनिया भर के शेयर बाजारों में अप्रत्याशित रूप से गिरावट आई. सभी प्रमुख राजधानियों में घबराहट है और इस बात का एक अवास्तविक निराशा का भाव है कि ट्रंप ने ग्लोबल बिजनेस के बीच बाजार में बिना पगहा के बैल को यूं ही छोड़ दिया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कदम विनाशकारी हो सकता है.
लेकिन यह कदम, जितना खतरनाक और समस्या से भरा है, पिछले तीन दशकों से वैश्वीकरण के प्रभाव को ध्यान से देखने वालों के लिए आश्चर्यजनक नहीं है. सोवियत संघ के पतन के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका, विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समर्थन और प्रोत्साहन के साथ, वैश्वीकरण के एजेंडे का नेतृत्व कर रहा है. उस महत्वपूर्ण क्षण तक, जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अपने संरक्षक अमेरिका की कृपादृष्टि के तहत सालाना अरबों डॉलर के सामानों का निर्यात करके बहुत लाभान्वित हुए, जबकि उन्होंने अमेरिकी सामानों को बाहर रखने के लिए ऊंची टैरिफ दीवारों का इस्तेमाल किया.
हालांकि, जो लोग पिछले 30 साल से वैश्वीकरण को देख रहे हैं, उनके लिए यह चौंकाने वाला नहीं है. सोवियत संघ के टूटने के बाद से अमेरिका ने बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया. उस समय जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अमेरिका की मदद से खूब सामान बेचा. वे अरबों डॉलर का माल अमेरिका को भेजते थे, लेकिन अपने यहां अमेरिकी सामानों पर ऊंचे टैरिफ लगाकर उन्हें रोकते थे.
लोगों ने इसे वैश्वीकरण का शानदार दौर कहा. अमेरिकी ग्राहकों को सस्ते गैजेट्स और कारें मिलीं, और ये निर्यात करने वाले देश अमीर हो गए. लेकिन यह पूरी तरह से निष्पक्ष व्यापार नहीं था. ज्यादातर सामान सिर्फ अमेरिका की ओर जा रहा था.
जब तक जापान और दक्षिण कोरिया जैसे कुछ देश ऐसा कर रहे थे, अमेरिका के लिए व्यापार घाटा और सस्ता आयात झेलना आसान था. लेकिन जब बिल क्लिंटन ने कनाडा और मैक्सिको के साथ नाफ्टा समझौता किया, तो अमेरिका की हजारों फैक्ट्रियां और लाखों नौकरियां मैक्सिको चली गईं, जहां मजदूरी सस्ती थी. वैश्वीकरण के समर्थक खुश थे, लेकिन अमेरिका के साधारण मजदूर नाराज थे. उनकी अच्छी जिंदगी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी, क्योंकि फैक्ट्रियां बंद हो रही थीं.
वैश्वीकरण के पक्षधर कहते थे कि मजदूरों को दूसरी नौकरियां मिल जाएंगी. लेकिन ऐसी नौकरियां नहीं थीं, जो अच्छी कमाई दें. 1994 में मैक्सिको ने अमेरिका को 50 अरब डॉलर का सामान बेचा था. 2024 तक यह 551 अरब डॉलर हो गया. अमेरिकी ग्राहकों को सस्ता सामान मिला, लेकिन मजदूरों को अच्छी नौकरियां नहीं मिलीं.
जब चीन को विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने दिया गया, तो हालात और बिगड़ गए. नाइकी और एप्पल जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने अपना उत्पादन चीन में शुरू कर दिया. अमेरिका में फैक्ट्रियां बंद हो गईं और कई शहर वीरान हो गए.
1999 में चीन ने अमेरिका को 44 अरब डॉलर का सामान बेचा था. 2024 में यह 3577 अरब डॉलर हो गया. अमेरिका का व्यापार घाटा भी बढ़ता गया—1990 के दशक में 34 अरब डॉलर से 2024 में 1200 अरब डॉलर. अकेले चीन के साथ 300 अरब डॉलर का घाटा था. भारत का इस व्यापार में बहुत छोटा हिस्सा है.
ये आंकड़े लंबे समय तक चल नहीं सकते. अमेरिका के साधारण मजदूर अपने नेताओं से नाराज हैं, जो वैश्वीकरण की तारीफ करते रहे. एक मजदूर से यह कहना बेकार है कि वह सस्ता सामान खरीदे, जब उसे 10 डॉलर प्रति घंटे की मजदूरी मिलती है और गुजारा करने के लिए दो नौकरियां करनी पड़ती हैं.
पिछले दस साल से लोग इसका विरोध कर रहे थे. अब यह गुस्सा डोनाल्ड ट्रंप के रूप में सामने आया है, जो कुछ भी कर सकते हैं. क्या इससे व्यापार युद्ध शुरू होगा? क्या 1929 की तरह महामंदी आएगी, जब अर्थव्यवस्था बहुत सिकुड़ गई थी? कोई नहीं जानता. हो सकता है समझदार लोग हालात सुधार लें. या फिर वैश्विक व्यापार हमेशा के लिए बदल जाए. लेकिन इतना तय है कि वैश्वीकरण की कोई सीमा नहीं मानने की नीति अब नहीं चल सकती. अब इसका हिसाब देने का वक्त आ गया है.