बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय राजनीति की वह शख्सियत हैं जिनका दशकों से विरोधी कुछ नुकसान नहीं कर पाए हैं. विपक्ष में रहना उन्होंने सीखा ही नहीं है. बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर वो करीब सात बार शपथ ग्रहण कर चुके हैं. यह तब है जबकि उनकी पार्टी पिछले सात सालों से बिहार में अल्पमत में है. उनकी यह खासियत ही है कि एनडीए हो या महागठबंधन, कम सीटों के बावजूद उन्हें मुख्य भूमिका (सीएम) में उन्हीं को रखती है. अब हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम और जेजेपी नेता दुष्यंत चौटाला ने भी हरियाणा की राजनीति का नीतीश कुमार बनने की इच्छा जाहिर की है. जाहिर है कि यह बात उन्होंने यूं ही नहीं की होगी. कुछ सोचकर ही दुष्यंत ऐसी बातें कर रहे होंगे. पर क्या 2024 के विधानसभा चुनावों में ऐसा लगता है कि वो नीतीश कुमार की तरह कम सीटें हासिल करने के बावजूद भी किंगमेकर बन सकते हैं.आइये देखते हैं उनके बयान के 4 मायने क्या-क्या हो सकते हैं?
नीतीश कुमार जैसा बनने की कितनी उम्मीद
हरियाणा में कुल 90 सीटों पर मतदान हो रहा है. आम तौर पर यह माना जा रहा है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है. पर यह बात भी सभी जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी अंतिम दिन तक गेम पलटने की हैसियत रखती है. बीजेपी की यही खासियत है कि अंतिम दौर के चुनाव तक वह मेहनत करती है.अभी इसी साल लोकसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी करीब 44 विधानसभाओं में लीड कर रही थी. जबकि कांग्रेस 42 सीटों पर आगे थी. आम आदमी पार्टी को भी करीब 4 सीटों पर बढ़त मिल रही थी. इस हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस और बीजेपी में नैक टु नैक टक्कर होती दिख रही थी. हरियाणा की राजनीति को समझने वालों का भी यही कहना है कि कुल कांग्रेस और बीजेपी में कुल 4 से 5 सीटों का ही अंतर रहेगा. अगर इस कांटे की लड़ाई में हंग असेंबली सामने आती है और जेजेपी को कुल 4 से 5 सीटें भी मिल जाती हैं तो दुष्यंत का नीतीश कुमार बनने का सपना पूरा हो सकता है.
फिलहाल नीतीश कुमार बनना मुश्किल ही दिख रहा है
पर लोकसभा चुनावों में जेजेपी उम्मीदवारों की जो दुर्गति हुई है उसे देखकर तो ऐसा लगता नहीं है कि जेजेपी को कुछ सीटें मिल भी रही हैं. यही नहीं जिस तरह जेजेपी विधायकों ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस और बीजेपी की शरण ली है उससे तो यही लगता है कि दुष्यंत के लिए राज्य में माहौल ठीक नहीं है. दुष्यंत चौटाला के कोर वोटर्स जाट भी उनसे इसलिए नाराज हैं कि किसान आंदोलन के समय उन्होंने बीजेपी का साथ नहीं छोड़ा. फिलहाल राज्य में जाटों का वोट एकमुश्त कांग्रेस को मिलता दिख रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हरियाणा में जेजेपी की स्थिति ऐसी नहीं है कि वो आम आदमी पार्टी से भी आगे बढ़ सके. यह सही है कि भीम आर्मी वाले चंद्रेशखर की पार्टी आजाद समाज पार्टी के साथ जेजेपी का राज्य में गठबंधन हुआ है पर दलित वोट जेजेपी-आसपा को जाएंगे इसमें संदेह ही है .
दूसरी बात यह भी है कि नीतीश कुमार के साथ बिहार का अति पिछड़ा वर्ग परमानेंट साथ रहता है. कुमार का ये वोट बैंक जहां वो चाहते हैं वो ट्रांसफर भी होता है. जबकि दुष्यंत के साथ ऐसा नहीं है. जाट वोटों पर आज कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और इनेलो में भी बंटने वाला है. तीसरे बिहार में नीतीश बहुत पुराने नेता हैं. बीजेपी या आरजेडी को लोग उन्हें अपना बॉस खुशी खुशी स्वीकार कर लेते हैं. दुष्यंत चौटाला की एक तो उम्र कम है दूसरे उनका राजनीतिक कद भी राज्य में नीतिश के मुकाबले बहुत छोटा है. इसलिए यह कहना दूर की कौड़ी है कि दुष्यंत चौटाला इन विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार जैसा कद हासिल कर सकें.