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हरियाणा विधानसभा चुनाव : क्या बीजेपी में मनोहर लाल खट्टर का खेल खत्म हो चुका है?

Manohar Lal Khattar: लोकसभा चुनावों में ही नहीं, विधानसभा चुनावों में भी टिकट वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की राजनीतिक चमक मद्धम पड़ रही है. क्या हरियाणा बीजेपी की राजनीति में उनका प्रभाव खत्म हो चुका है?

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हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर

हरियाणा चुनाव प्रचार चरम पर है. पर पिछले 9 साल सीएम की गद्दी पर रहा व्यक्ति न पीएम की सभाओं में दिख रहा है, न पोस्टरों में. बात हो रही है मनोहर लाल खट्टर की. जिनकी हालत यह हो गई है कि पीएम नरेंद्र मोदी हरियाणा में पिछले दिनों 2 बार आए और दोनों ही बार खट्टर को उनकी सभा में नहीं देखा गया. यही नहीं गृह मंत्री अमित शाह की सभाओं से भी वो नदारद रहे. जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे. ये वही खट्टर हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास दोस्त हुआ करते थे. यही कारण था कि 2014 में जब हरियाणा में भारी बहुमत से बीजेपी की सरकार बनी तो सीएम के रूप में अचानक वो ध्रुवतारे की तरह उगे और फिर हरियाणा की राजनीति में छा गए. उनके कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के तो आरोप नहीं लगे पर कई बार उनके खिलाफ असंतोष गहराया और ऐसा लगा कि अब कुर्सी गई. पर हर बार वो किसी बाजीगर की तरह अपनी कुर्सी बचा लिया करते थे. इसके पीछे पीएम का विश्वासपात्र होना ही बताया जाता था. फिर अचानक क्या हुआ कि उन्हें पीएम मोदी उनसे दूरी बनाने लगे हैं. क्या बीजेपी में उनके खराब दिनों की शुरूआत होने वाली है. या सिर्फ एक रणनीति के तहत पार्टी उनसे कुछ दिनों मसलन चुनावों तक के लिए दूरी बना रही है. 

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1- ओबीसी वोटर्स में गलत मैसेज न जाए इसलिए खट्टर को दूर किया गया है?

दरअसल, केंद्र में मंत्री बनने के बाद भी हरियाणा में मनोहरलाल जिस तरह एक्टिव रहे, उससे ये मैसेज गया कि हरियाणा के सुपर सीएम तो खट्टर साहब ही हैं.जाहिर है कि मुख्यमंत्री नायब सैनी के लिए ये बातें ठीक नहीं थीं. दूसरे पार्टी ने जिन उद्दैश्यों के चलते नायब सैनी को सीएम बनाया था वो भी पूरी नहीं हो रहीं थीं. पार्टी  नायब सैनी को सीएम बनाकर चाहती थी कि ओबीसी वोटर्स को बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकृत किया जा सके. पार्टी की गणित ही यही है कि अगर ओबीसी ( करीब 30 प्रतिशत), पंजाबी (करीब 8 से 9 प्रतिशत), ब्राह्मण ( करीब 10 प्रतिशत) और बनिया वोट बीजेपी को मिल गए तो हरियाणा में लगातार तीसरी बार बीजेपी सरकार बनाने में सफल हो जाती. पर टिकट बंटवारे तक में नायब सैनी के बजाय खट्टर भारी पड़ गए. यहां तक कहा गया कि सीएम सैनी करनाल से विधानसभा टिकट चाहते थे पर खट्टर वहां से अपने खासम खास को टिकट दिलाने में सफल हो गए. इन सब कारणों से पिछड़े वोटर्स में ये संदेश जा रहा था कि अगर बीजेपी फिर से सरकार बनाती है तो कोई जरूरी नहीं है कि नायब सैनी फिर से सीएम बने. हो सकता है कि बीजेपी इसी कारण खट्टर से परहेज कर रही हो.  

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2- क्या जाटों को नापसंद हैं खट्टर?

हरियाणा में जाट बनाम पंजाबी के बीच प्रतिस्पर्धा रही है. बीजेपी ने जब से एक पंजाबी मनोहर लाल खट्टर को सीएम बना दिया जाटों में बीजेपी को लेकर नाराजगी बढ़ती गई. ये नाराजगी पार्टी से आगे निकलकर पंजाबी समुदाय तक पहुंच गई. हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान पंजाबियों के प्रति जो नफरत जाटों में दिखी वह पहले कभी नहीं थी. कम से कम प्रतिस्पर्धा कभी हिंसा में नहीं बदली थी. आरक्षण आंदोलन के दौरान जाटों का गुस्सा पंजाबियों के घर और दुकान , कारों आदि पर निकला. बड़े पैमाने पर आगजनी हुई. 
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कई भाजपा नेताओं ने बताया कि हरियाणा के सोनीपत, झज्जर और चरखी दादरी जैसे जाट बहुल क्षेत्रों में पार्टी से नाराजगी का कारण खट्टर हैं. 

मनोहरलाल खट्टर के बयान भी हरियाणा चुनाव में बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं. हाल ही में एक सभा के दौरान मनोहरलाल खट्टर ने कहा कि शंभू बॉर्डर पर आंदोलन करने वाले लोग किसानों के नाम पर एक मुखौटा हैं. इसके बाद जब वो हिसार में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे तो वहां मौजूद युवक ने उनके सामने ही कहा कि इस बार हिसार में बीजेपी का विधायक हारेगा, जिसपर खट्टर भड़क गए और कहा कि इसकी हिम्मत कैसे हुई. 

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3-क्या बीजेपी में उनका खेल खत्म हो चुका है?

पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि मनोहर लाल को ओबीसी और दलितों पर केंद्रित अभियान पर उन्हें लगाया गया है ताकि इन वर्गों में पार्टी कमजोर न पड़ जाए. पर यह बात हजम नहीं होती है. किसी भी राज्य में जब पीएम या किसी भी पार्टी का अध्यक्ष पहुंचता है तो उस पार्टी के सभी छोटे-बड़े नेता उस रैली में पहुंचते हैं. खट्टर की ऐसी कौन सी व्यस्तता है कि उन्हें मोदी और शाह की सभा में भी आने के लिए टाइम नहीं मिल रहा है. 

सत्ता की राजनीति में समय में कभी भी खराब हो सकता है. इसके लिए कोई किंतु-परंतु नहीं होता है. इसके पहले भी हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी में कितने नेता साइडलाइन हो चुके हैं. एक भाजपा नेता के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि खट्टर के प्रति नाराजगी थी क्योंकि उन्होंने कार्यकर्ताओं से मिलने में अनिच्छा दिखाई थी. सैनी ने कार्यभार संभालने के बाद कार्यकर्ताओं से मिलना शुरू किया और सभी को आश्वासन दिया कि उनकी शिकायतों का समाधान किया जाएगा. इससे कार्यकर्ता चुनाव प्रक्रिया में तन, मन, धन (शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से) के साथ भाग लेने के लिए प्रेरित हुए.

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