अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी दिल्ली की राजनीति में भले ही आमने सामने लड़ते हों, लेकिन वक्फ बिल पर दोनो नेताओं के रुख में कोई खास फर्क नहीं लगता.
वक्फ बिल का विरोध तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनो ने किया है, लेकिन न तो अरविंद केजरीवाल ने कुछ कहा है, न ही राहुल गांधी ने ही कुछ खास बोला है - कॉमन बात ये है कि दोनो ही ने अपने नेताओं को मोर्चे पर तैनात कर दिया है, और खुद लगभग चुप्पी साध लिये हैं.
एक ही फर्क है, जो काम राहुल गांधी ने दिल्ली में रहकर किया है, अरविंद केजरीवाल ने उसके लिए दिल्ली से ही दूरी बना ली है. विपश्यना के लिए दिल्ली से निकले अरविंद केजरीवाल काफी दिन से पंजाब के लुधियाना में डेरा डाले हुए हैं.
फर्ज कीजिये अरविंद केजरीवाल अगर दिल्ली में होते तो क्या वक्फ बिल पर चुप रह पाते, मजबूरन ही सही, कुछ न कुछ तो बोलना ही पड़ता. या फिर राहुल गांधी की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ बढ़ाने के मुद्दे पर कोई बयान जारी कर देते - राहुल गांधी की तरह अरविंद केजरीवाल के पास संसद जाकर वोट देने जैसी कोई मजबूरी तो थी नहीं.
परिस्थितियां ऐसे सवाल क्यों उठा रही हैं कि अरविंद केजरीवाल कहीं वक्फ बिल की वजह से ही पंजाब में डेरा तो नहीं डाले हुए हैं?
वक्फ बिल के मुद्दे पर चुप रहना मुश्किल होता
फर्ज कीजिये अरविंद केजरीवाल दिल्ली में होते. वो तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी ज्यादा असमंजस की स्थिति में होते. नीतीश कुमार ने तो पुरानी छवि की परवाह नहीं करते हुए वक्फ बिल का विरोध करने का फैसला किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल क्या खुलकर और आगे बढ़कर विरोध कर पाते? वैसे तो आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सांसदों के लिए व्हिप भी जारी कर रखा था, और सांसदों ने वक्फ बिल का विरोध भी किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल के लिए तो ये करना काफी मुश्किल होता.
ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई जय श्रीराम के नारे भी लगाये, नोटो की वैल्यू बढ़ाने के लिए लक्ष्मी और गणेश की तस्वीर लगाने के भी सुझाव दे, रामलला के दर्शन के लिए पूरे परिवार के साथ अयोध्या भी जाये - और वही नेता वक्फ बिल का विरोध भी करे.
दिल्ली में मौजूद संजय सिंह ने वक्फ बिल के विरोध की रस्मअदायगी पूरी कर दी है, लेकिन संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल के कुछ कहने और न कहने में फर्क तो बहुत बड़ा होता है - स्वाति मालीवाल केस सबसे बड़ा उदाहरण है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास में मारपीट की घटना के बाद संजय सिंह कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल के संज्ञान में है, और वो एक्शन लेंगे. बाद में मालूम होता है कि अरविंद केजरीवाल तो बिभव कुमार को लखनऊ घुमा रहे हैं - और फिर उसके सपोर्ट में खड़े हो जाते हैं.
संजय सिंह वक्फ बिल के विरोध की बात और है, लेकिन अरविंद केजरीवाल के सामने आकर स्टैंड साफ करने की बात और होती.
वक्फ बोर्ड के बड़े हिमायती रहे हैं केजरीवाल
दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी विधायक अमानतुल्ला खां को दिल्ली वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनाया था - और 2019 के आम चुनाव के पहले के एक वीडियो में वो उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ते देखे जाते हैं.
वीडियो देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल वक्फ बोर्ड के कितने बड़े हिमायती हैं. वो वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार की तरफ भी इशारा करते हैं, लेकिन ये भी दावा करते हैं कि अमानतुल्ला खां ने उसे प्रॉफिट में ला दिया. बोर्ड में उनका भरोसा दोगुणा-चौगुणा कर डाला.
वो मुकेश अंबानी का नाम तो नहीं लेते लेकिन कह रहे हैं कि मुंबई में देश के सबसे बड़े आदमी का बंगला भी वक्फ की जमीन पर बना है. लगे हाथ ये भी बोल जाते हैं कि वहां की सरकार की हिम्मत नहीं कि उसके खिलाफ कोई कदम उठाये, लेकिन अगर उनकी सरकार होती तो कब का तोड़वा चुके होते.
वीडियो से बना एक रील भी वायरल है, जिसमें अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं, ‘तन मन धन से केजरीवाल और दिल्ली सरकार (तब की) वक्फ बोर्ड के साथ है.’
क्या मुमकिन है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली में होते तो वक्फ बिल का सपोर्ट कर पाते?