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क्या दिल्ली में योगी फैक्टर के चलते कांग्रेस और AAP के बीच गठबंधन में फंसा था पेच?

दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच सीट शेयरिंग पर सहमति बन गई है. पर नॉर्थ दिल्ली और पूर्वी दिल्ली की सीट लेने से दोनों ही पार्टियां बच रही थीं. ऐसा क्या था?

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कांग्रेस और आप के बीच दिल्ली की लोकसभा सीटों पर क्या था पेच
कांग्रेस और आप के बीच दिल्ली की लोकसभा सीटों पर क्या था पेच

दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन आसान नहीं था. जिस तरह पंजाब में दोनों पार्टियों की स्थानीय इकाइयां नहीं चाहती थीं कि गठबंधन हो कमोबेश यही हाल दिल्ली का भी था. दिल्ली में एक तरफ आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनावों में लोकप्रियता के नए रिकॉर्ड बना रही है वहीं दूसरी ओर नगर निगम पर भी कब्जा करके पार्टी ने अपनी अहमियत बरकरार रखी है. पर पिछले लोकसभा चुनावों मे जिस तरह आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से कम वोट मिले उससे दिल्ली को लेकर कांग्रेस बहुत उत्साहित थी.

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सामान्य तौर पर यही लग रहा था कि कांग्रेस किसी भी सूरत में आम आदमी पार्टी से कम सीटों पर दिल्ली में गठबंधन के लिए राजी नहीं होने वाली है. पर अचानक स्थितियां बदलीं और जिस तरह उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 17 सीटें देना स्वीकार कर लिया उसी तरह आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को 3 सीटें देनी स्वीकार कर ली. जिसे कांग्रेस ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया. ये कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ही के लिए किसी कुर्बानी से कम नहीं था.वैसे तो इन दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन के पीछे कम से कम ये 4 परिस्थितियां महत्वपूर्ण कारक हैं पर उनमें योगी आदित्यनाथ पेच भी कम महत्वपूर्ण नहीं है.आइये देखते हैं कि इन दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की क्यों चर्चा हो रही है. 

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दिल्ली में कांग्रेस-आप के समझौते के पीछे सातों सीटों पर बीजेपी का वर्चस्व

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीटों के वोटिंग पैटर्न का विश्वेषण करें तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मिलकर भी बीजेपी को हराने की स्थिति में दूर-दूर तक नहीं हैं. दिल्ली की सभी सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन 2019 में 2014 के मुकाबले भी काफी बेहतर हुआ. जैसे दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जहां 2014 में कांग्रेस को औसतन 15% वोट मिले थे और आम आदमी पार्टी को औसतन 33% वोट मिले थे, पर बीजेपी ने 46% वोट हासिल किया था. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों का वोट प्रतिशत बढ़ा पर आम आदमी पार्टी का घट गया. कांग्रेस का औसत वोट शेयर अगर 22% रहा और वो दूसरे स्थान पर रही.

आम आदमी पार्टी का औसत वोट शेयर 18% रहा और पार्टी की दिल्ली में सरकार होते हुए भी तीसरे स्थान पर पहुंच गई. बीजेपी ने अपना वोट शेयर 46 परसेंट से बढ़ाकर 57% तक बढ़ा लिया. मतलब साफ है कि लोकसभा चुनावों में दिल्ली की जनता का वोटिंग पैटर्न राष्ट्रीय पार्टियों के पक्ष में रहता है. फिर भी कांग्रेस ने समझदारी दिखाई कि दूसरे स्थान पर रहने का अहंकार छोड़ दिया और आम आदमी पार्टी से गठबंधन कर लिया. वैसे तो दिल्ली की सातों सीटों पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जितना भी वोट हासिल किया है उन्हें जोड़कर भी वो बीजेपी से बहुत पीछे हैं. इसलिए अकेले लड़कर बुरी तरह हारने से बेहतर है कि गठबंधन के चलते कम से कम लड़ाी तो रहेंगे.

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क्या है दिल्‍ली का योगी आदित्यनाथ फैक्टर

इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जिन सीटों पर पेच फंसा हुआ था उसमें योगी फैक्टर महत्वपूर्ण था. दोनों पार्टियां दिल्ली की नॉर्थ ईस्ट और ईस्ट डेलही को लेकर असमंजस में थीं. इन दोनों सीटों को दोनों पार्टियों अपने पाले में नहीं रखना चाहतीं थीं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के हवाले से एक्सप्रेस लिखता है कि आम आदमी पार्टी शुरू से ही राष्ट्रीय राजधानी में एक साथ आने के पक्ष में थी. पर कुछ  सीटों को लेकर मतभेद था जिन पर कांग्रेस दावा कर रही थी.पर आम आदमी पार्टी के प्रस्ताव में तीन सीटें शामिल थीं, नॉर्थ ईस्ट, चांदनी चौक और ईस्ट. लेकिन यह हमें स्वीकार्य नहीं था क्योंकि उत्तर पूर्व और पूर्वी दिल्ली की सीमा उत्तर प्रदेश से लगती है; इनमें से एक को तो मैनेज किया जा सकेगा लेकिन दोनों को नहीं. 

कांग्रेसी नेता के अनुसार हमारे जमीनी सर्वेक्षणों और 2019 के लोकसभा, 2020 के दिल्ली विधानसभा और 2022 के एमसीडी चुनावों में हमारे प्रदर्शन के विश्लेषण के अलावा, हमें पता चला कि उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की एक रैली उत्तर पूर्व और पूर्वी दिल्ली में ध्रुवीकरण को गति देने के लिए पर्याप्त थी.यही डर दूसरे तरफ भी था.मतलब कि आम आदमी पार्टी भी यही सोच रही थी. एक्सप्रेस लिखता है कि आप और कांग्रेस दोनों के अंदरूनी सूत्रों ने स्वीकार किया कि उत्तर पूर्वी दिल्ली का समीकरण उतना ही ख़राब है जितना गुजरात के भरूच का. 

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नॉर्थ ईस्ट और ईस्ट डेलही में क्यों डर रहीं थीं दोनों पार्टियां

दिल्ली की नॉर्थ ईस्ट और ईस्ट डेलही सीट बीजेपी की मजबूत सीट बन चुकीं हैं. पिछले चुनावों में दोनों ही जगहों से बीजेपी के प्रत्याशियों ने 3 लाख से अधिक वोट से चुनाव जीता था. नॉर्थ ईस्ट से मनोज तिवारी तो ईस्ट डेलही गौतम गंभीर यहां से सांसद बनें. ये दोनों लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएं उत्तर प्रदेश की सीमाओं से मिल रही हैं. उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति जो सुधार हुआ है उससे यहां के लोग अपनी आंखों से देख रहे हैं. कभी बदमाशों की शरण स्थली यूपी हुआ करता था. दिल्ली से भागकर यूपी में शरण लेते थे गुनहगार अब स्थितियां उल्टा हो चुकीं हैं. दिल्ली में अपराधी सुकून महसूस करते हैं. बिजवी और सड़क की स्थितियां भी बेहतर हुईं हैं. ठीक इसके उलट दिल्ली की तरफ परेशानियां बढ़ी हैं. इसके साथ ही इन क्षेत्रों में यूपी के लोग काफी आकर बस गए हैं जिनके आना जाना यूपी में लगा रहता है.  पिछले चुनावों का वोटिंग ट्रेंड भी यही कहता है कि बीजेपी की अब ये दोनों मजबूत सीट बन चुकी हैं.

उत्तर पूर्वी दिल्ली में पिछले लोकसभी चुनावों में कांग्रेस को 29% वोट मिले थे. आम आदमी पार्टी महज 13% वोट प्राप्त कर पायी थी. दोनों को मिला देने पर भी इनका वोट शेयर 42% ही होता है. जबकि, बीजेपी ने यहां 53% वोट कब्जा करने में कामयाब हुई थी. 
उत्तर-पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के तहत सीमापुरी, घोंडा, सीलमपुर, गोकलपुर, रोहतास नगर, बाबरपुर, करावल नगर, बुराड़ी, तिमारपुर और मुस्तफाबाद जैसे विधानसभा क्षेत्र आते हैं. यहां पर कई घनी मुस्लिम बस्तियां भी हैं जिनके चलते वोटिंग के दिन तक वोटों का ध्रुवीकरण हो जाता है. इसका फायदा भी बीजेपी को मिलता है.

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यही हाल पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट का भी है. 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली में कांग्रेस को 24% और आम आदमी पार्टी को 17% वोट मिले थे. यानी इन दोनों दलों का वोट शेयर जोड़कर बीजेपी के 55% वोट से 14 परसेंट कम था. 

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