हिमाचल प्रदेश से स्टेटस अपडेट तो यही है कि न तो विक्रमादित्य सिंह का मंत्री पद से इस्तीफा हुआ है, न ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का - और बात सिर्फ इतनी ही बढ़ पाई है कि सुक्खू ने विक्रमादित्य को अपना छोटा भाई बताकर उनकी बातें सुनने की हामी भरी है, और विक्रमादित्य सिंह ने भी जब तक समस्याओं का समाधान नहीं निकलता, इस्तीफे की जिद होल्ड कर लेने का वादा किया है.
लेकिन इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि विक्रमादित्य सिंह ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है. न ही विक्रमादित्य सिंह ने सुक्खू की तरह अपने इस्तीफे की बात को कोई अफवाह बताया है या इस्तीफा न देने जैसी कोई बात ही की है.
इस बीच कुई और भी बड़ी बड़ी बातें हुई हैं. हिमाचल प्रदेश विधानसभा के स्पीकर ने राज्य सभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले कांग्रेस के 6 विधायकों को अयोग्य करार दिया है. और वे विधायक हरियाणा के पंचकूला में डेरा डाले बताये जाते हैं.
एक और खास बात है, जो इस घटनाक्रम में काफी महत्वपूर्ण लगती है. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने आवास पर सभी कांग्रेस विधायकों की मीटिंग बुलाई थी. बहुत सारे विधायक आये भी, लेकिन विक्रमादित्य सिंह सहित चार विधायक मुख्यमंत्री आवास की बैठक से दूर रहे - संदेश साफ है, विक्रमादित्य सिंह ने इस्तीफे को लेकर अपनी जिद फिलहाल छोड़ दी है, लेकिन इरादा भी बदला हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं लगता. विक्रमादित्य सिंह के समर्थक उनके साथ हुई नाइंसाफी की बात करते करते यहां तक बोल जाते हैं कि वे उनको भविष्य में मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
शिमला के दोनों कांग्रेस कैंप में जो हालात समझ में आ रहे हैां, कुछ सवाल खड़े करते हैं, जिनके जवाब मिलने बाकी हैं - और इन सवालों के जवाब से ही हिमाचल प्रदेश में सत्ता की राजनीति का भविष्य तय होने वाला है.
1. डीके शिवकुमार और पर्यवेक्षक क्या क्या ऑफर कर सकते हैं?
डीके शिवकुमार और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की भूमिका बड़ी सीमित है, लेकिन वे संदेशवाहक दोनों तरफ के लिए हैं. दिल्ली की बातें शिमला पहुंचाने के लिए और शिमला की बातें दिल्ली पहुंचाने के लिए - और आखिरी शब्द कम्यूनिकेट करने की कोशिश कर सकते हैं.
वे राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे के दूत बन कर पहुंचें हैं, ऐसे में उनकी भी अपनी सीमाएं हैं. कहने को तो उनके साथ राजीव शुक्ला भी संपर्क में हैं, जिनको हवा तक नहीं लगी कि अभिषेक मनु सिंघवी के प्रस्ताव उनके साथ नाश्ता करने के बाद क्रॉस वोटिंग करेंगे, और उनकी शिकस्त हो जाएगी. हो सकता है, राजीव शुक्ला को बीसीसीआई में ओवरटाइम करना पड़ रहा हो.
ऐसे मामलों में ऑब्जर्वर बनाकर भेजे जाने वाले मध्यस्थों की पहली कोशिश तो यही रहती है कि विरोध की आवाज को समझा बुझा कर दबा दें. और कोई आगे का आश्वासन देकर अपनी बातों पर हामी भरवा लें. बाद की बाद में देखी जाएगी, टाइप - लेकिन हिमाचल प्रदेश में जो स्थिति बनी है, डीके और भूपेंद्र हुड्डा के लिए बस इतना ही स्कोप बचा है कि वे संवाद बनाये रखें, और किसी भी सूरत में बागी विधायकों से संपर्क न टूटने दें. ताकि आगे भी गुंजाइश बनी रहे.
अंदर जो भी बातें हुई हों. बाहर बस इतनी ही बात आई है कि डीके शिवकुमार और भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेस विधायकों से अलग अलग बातचीत की है. उनकी बात सुनी है, और संभव हो सका होगा अपनी तरफ से आश्वस्त करने की कोशिश भी किये ही होंगे.
जिस तरह से विक्रमादित्य सिंह और उनके समर्थक मुख्यमंत्री बदलने पर अड़े हुए हैं, पर्यवेक्षकों की तरफ से जब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिलता बात नहीं बनने वाली है - और ठोस आश्वासन का मतलब फिलहाल मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का इस्तीफा ही है, कुछ और नहीं.
जहां तक पर्यवेक्षकों की तरफ से ऑफर किये जाने की बात है, वे बीच का रास्ता निकालने के लिए सुखविंदर को हटाकर किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की बात भी कर सकते हैं. वो मुख्यमंत्री, विक्रमादित्य ही हों, कतई जरूरी नहीं है. कोई तीसरा भी हो सकता है, जो दोनों पक्षों को मंजूर हो - लेकिन आखिरी आश्वासन बस इतना ही हो सकता है कि विधायकों के मन की बात वे आलाकमान तक पहुंचाएंगे, और जब ऊपर से कोई आदेश पारित होगा तो बता सकते हैं.
2. विक्रमादित्य सिंह सीएम बनकर ही मानेंगे या कुछ कम से भी?
विक्रमादित्य सिंह खुद भी और उनके समर्थक भी नाइंसाफी की बात कर रहे हैं - और नाइंसाफी की बात से आशय सिर्फ विक्रमादित्य सिंह को मुख्यमंत्री बनाये जाने की ही नहीं है, पीड़ा और शिकायतें अभी और भी हैं.
विक्रमादित्य सिंह ने अपना स्टैंड साफ कर दिया है, हमने पर्यवेक्षकों से बात की है... स्थिति के बारे में सूचित कर दिया है... जब तक कोई निर्णय नहीं हो जाता, मैं अपने इस्तीफे पर ज़ोर नहीं दूंगा... आने वाले समय में अंतिम निर्णय लिया जाएगा.
बेटे की बात को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह थोड़ा स्पष्ट करने की कोशिश कर रही हैं, विक्रमादित्य ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया है, पार्टी से नहीं... और ये स्वीकार नहीं किया गया है... अब पर्यवेक्षकों को देखना है कि क्या करना है.
मतलब, मां-बेटे ने पर्यवेक्षकों के माध्यम से गेंद आलाकमान के पाले में डाल दी है. बात कहने का जो लहजा है, वो बता रहा है कि कैबिनेट की ही तरह कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफा दिया जा सकता है. और इस्तीफा तो विशेष परिस्थितियों में सीधे राज्यपाल को भी भेजा जा सकता है.
प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य तो चुनावों से पहले से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, नतीजे आये तो आलाकमान का फरमान आ गया. बर्दाश्त भी कर लिये. लेकिन कैबिनेट में भी बस विक्रमादित्य को शामिल किया गया, बाकी किसी भी समर्थक को मंत्री बनाने को सुक्खू तैयार नहीं हुए.
बगावत का रिमोट भले ही विक्रमादित्य के पास हो, लेकिन फील्ड में वनिधायकों की अगुवाई राजेंद्र राणा कर रहे हैं, जो सुक्खू के पास के इलाके से ही आते हैं. वो भी इंतजार ही करते रह गये लेकिन मंत्री नहीं बनाया गया - राज्य सभा चुनाव का मौका देख गुस्सा फूट पड़ा और क्रॉस वोटिंग के रूप में इजहार भी कर दिया. फिलहाल तो वो भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे हैं.
ऐसे ही 2013 में बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में आये देविंद्र भुट्टो, वीरभद्र सरकार में मंत्री रह चुके सुधीर शर्मा, लखनपाल, चैतन्य शर्मा भी है, जिनकी कॉमन पीड़ा है - और अब ये सभी बीजेपी के दवाखाने से पेन किलर की की उम्मीद में बैठे हैं.
कहां सुक्खू सरकार में प्रतिभा सिंह के समर्थकों को जगह मिलती, और कहां सुक्खू ने विक्रमादित्य सिंह से भी एक मंत्रालय वापस ले लिया था - जब इतना सब हो चुका हो, भला विक्रमादित्य सिंह मुख्यमंत्री पद से कम क्यों मानेंगे. अपने लिए न सही, अपने किसी भरोसेमंद के लिए ही सही.
3. सुक्खू यदि सीएम पद से हटा दिये गए तो आगे उनका रवैया क्या होगा?
अगर सुक्खू को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया तो उनके मन में भी वही गुस्सा होगा, जो अभी विक्रमादित्य एंड कंपनी के मन में भरा हुआ है - और बदले की आग में जलते हुए सुक्खू वो सब कर सकते हैं, जो अब तक नहीं कर सके हैं.
कट्टर विरोधी तो वो वीरभद्र सिंह के रहे हैं, विक्रमादित्य को तो ये सब उनका वारिस होने के नाते झेलना पड़ रहा है. सुक्खू की मुश्किल ये है कि वो काफी कमजोर पड़ गये हैं. हालांकि, वो इतने ही कमजोर पड़े हैं कि बहुमत उनके साथ नहीं है, हो सकता है उनके समर्थक विधायकों की संख्या प्रतिभा सिंह गुट से ज्यादा भी हो.
रही बात विधानसभा में सुक्खू के पक्ष में नंबर की तो वो बहुत कम हो चुका है. क्रॉस वोटिंग करने वाले 6 विधायकों के खिलाफ एक्शन के बाद सदन की स्ट्रेंथ 68 से घटकर 62 रह गई है - और ऐसे में बहुमत का आंकड़ा भी 35 से 32 पर पहुंच चुका है.
राज्य सभा चुनाव तक सुक्खू के पास 34 विधायक थे, लेकिन विक्रमादित्य को हटा कर देखें तो ये संख्या 33 हो जाती है - और विक्रमादित्य सहित ब्रेकफास्ट मीटिंग में नहीं शामिल होने वाले विधायकों को जोड़ दें तो ये संख्या 30 पर पहुंच जाती है.
अब देखा जाये तो सुक्खू के पास कुल जमा 30 विधायकों का समर्थन है, जो बहुमत के आंकड़े से 2 कम ही है - ये चीज तो सार्वजनिक है, लिहाजा बीजेपी भी इसी हिसाब से रणनीति तैयार कर रही होगी.
अगर आलाकमान सुक्खू को नहीं भी हटाता है, तो हालात ऐसे हैं कि हटना ही पड़ेगा - लेकिन मुख्यमंत्री की उनकी कुर्सी तब तक बची हुई है, जब तक विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए मजबूर न होना पड़े.
4. कांग्रेस हाईकमान कितना झुकने को तैयार होगा?
हिमाचल प्रदेश की PCC अध्यक्ष प्रतिभा सिंह कह रही हैं, जब से सरकार बनी है... कुछ बातें ठीक नहीं चल रही थीं... हम हाईकमान के संज्ञान में ये बातें बार-बार ले गए... हम चाहते थे कि वो कोई फैसला करते... कोई हल निकालते तो आज हम इस स्थिति पर नहीं पहुंचते.
प्रतिभा सिंह की ये बातें तो बिलकुल वाजिब हैं. वैसे कांग्रेस नेतृत्व का रवैया भी बिलकुल वैसा ही है जैसा लेट-लतीफ बाकी मामलों में भी नजर आता है. हिमाचल प्रदेश जैसी ही मुश्किलें बाकी राज्यों में भी कांग्रेस के साथ देखी गई हैं - और ट्रैक रिकॉर्ड भी यही बताता है कि हमेशा ही फैसले में देर हुई है, और कांग्रेस को देर का खामियाजा भी भुगतना पड़ा है.
अब अगर सवाल ये है कि कांग्रेस नेतृत्व कितना झुकने को तैयार होगा?
तैयार होना न होना और बात है, लेकिन अगर झुकेगा नहीं तो टूट जाएगा, ये भी पक्की बात है. जितना जल्दी हो सके, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को ये भी तय कर लेना होगा कि सुक्खू को ही बचाये रखना है या सरकार बचाने की भी कोशिश होनी चाहिये? अब ये तो मालूम होगा ही कि दुश्मन घात लगाकर बैठा हुआ है.