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'इमरजेंसी' में इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक महिमामंडन, कंगना तो न बीजेपी की हुईं और न कांग्रेस की!

कंगना रनौत ने आम चुनावों के पहले ही इमरजेंसी मूवी रिलीज करने की कोशिश की थी. आम तौर पर लोग यह समझ रहे थे कि फिल्म इमरजेंसी में इंदिरा गांधी को विलेन की तरह पेश किया गया होगा. पर हुआ इसके विपरीत. चुनाव के पहले फिल्म रिलीज होती तो कांग्रेस के पक्ष में ही हवा बनाती. सवाल उठता है कि कंगना ने ऐसा क्यों किया?

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कंगना रनौत फिल्म इमरजेंसी में
कंगना रनौत फिल्म इमरजेंसी में

बॉलीवुड अभिनेत्री और तेजतर्रार नेता बन चुकी भारतीय जनता पार्टी की सांसद की इमरजेंसी फिल्म रिलीज होकर फ्लॉप होने की कगार पर है. फिल्म चूंकि राजनीतिक है और बनाने वाली शख्सियत बीजेपी से जुड़ी हुईं हैं इसलिए उम्मीद की जा रही थी यह फिल्म इमरजेंसी के दौरान हुए अत्याचारों पर फोकस्ड होगी. पर यहां तो कहानी उल्टी है. बीजेपी के समर्थक, जिन्होंने पिछले साल से ही आपातकाल लागू होने वाले दिन (25 जून) को संविधान हत्या दिवस मनाने का संकल्प लिया हो उनके लिए यह फिल्म उसी तरह हो गई कि 'गए थे रोजा छुड़ाने नमाज गले पड़ गई'. उम्मीद के विपरीत कंगना रनौत ने एक ऐसी मूवी बनाई जिसका इमरजेंसी केवल नाम भर है पर फिल्म की कहानी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश का हीरो बनाकर पेश करती है. फिल्म देखने के बाद जब आप निकलते हैं तो आपके दिमाग में इंदिरा गांधी के साहसिक फैसलों की गूंज ही सुनाई देती है. आप यह मानने को विवश हो जाएंगे की इंदिरा गांधी देश की सबसे महान नेत्री थीं. पर इतना सब होने के बावजूद आखिर ऐसा क्यों हुआ कि कंगना न बीजेपी समर्थकों को ही खुश कर सकीं और न ही कांग्रेस से उन्हें तारीफ मिल रही है.

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इंदिरा गांधी को महान बताने की हर कोशिश हुई फिल्म में

इमरजेंसी मूवी देखते हुए ऐसा लगता है कि फिल्म का डायरेक्टर और स्क्रिप्ट लेखक एक एजेंडे के तहत इंदिरा गांधी को महान बताना चाहता है. इंदिरा गांधी की हर वो कदम जो उनकी छवि को धक्का पहुंचाता हो उसे दिखाया ही नहीं गया है. इसके ठीक विपरीत उनके व्यक्तित्व के नकारात्मक पहलुओं के पीछे ऐसे कारण ढूंढें गए हैं जिससे आप उनके द्वारा की गई गलतियों को माफ कर सकें. इंदिरा गांधी के बचपन में उन्हें अपनी बुआ विजयलक्ष्मी पंडित से बहुत प्रताड़ित होते दिखाया गया है. उनकी मां को उनके सामने बेइज्जत किया जाता है. बड़ा होने पर पिता नेहरू भी उनके इस स्वभाव के चलते उनसे दूर दिखाई देते हैं.इंदिरा को लगता है कि उन्हें नेहरू इसलिए ही अपना उत्तराधिकारी नहीं बना रहे हैं. पति से भी उन्हें प्यार नहीं मिलता है. इस तरह उनके प्रति सिंपैथी निर्मित करने की कोशिश की गई है. इंदिरा अपने करीबियों से एक बार कहती हैं कि उन्हें जीवन में जो प्यार अपने पिता और पति से मिलना चाहिए था नहीं मिला. उनकी कमी उनकी जिंदगी में संजय ने ही पूरी की है.यही नहीं कुछ और घटनाएं ऐसी दिखाई गईं है जो साबित करती हैं कि इंदिरा दिल और दिमाग से बहुत अच्छी थीं.
 
-नेहरू चीन से युद्ध हारने के पहले ही मान लेते हैं कि आसाम अब इंडिया में नहीं रह सकेगा.पर इंदिरा गांधी अपने पिता नेहरू से बिना बताए आसाम चलीं जाती हैं.और वहां की जनता को भरोसा दिलाती हैं कि ऐसा नहीं होगा.  इस बीच संयुक्त राष्ट्र की पहल युद्ध विराम हो जाता है.चीन की सेना वापस लौट जाती है. पूरे देश में इंदिरा के शौर्य की तारीफ होती है. नेहरू अपनी बेटी से नाराज हो जाते हैं.यानि कि अपने पिता से नाराजगी मोल लेकर भी इंदिरा आसाम को बचा लेती है.

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-बांग्लादेश युद्ध में भारतीय सेना को झोंकने के पहले अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर जाकर उनसे मदद मांगती हैं. यह जाहिर कराने की कोशिश होती है कि वो तानाशाह नहीं थीं और सबको साथ लेकर चलतीं हैं

-इमरजेंसी खत्म करने के बाद संजय गांधी के मना करने के बावजूद देश में चुनाव करवाती हैं.हारने के बाद जेल जाती हैं . जेल से वापस होने पर अपने घर नहीं जाती हैं ,पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण से मिलने जाती हैं. यह दिखाने की कोशिश होती है कि इंदिरा अगर गलती करती थीं वो पश्चाताप भी करती हैं.

-जयप्रकाश नारायण के घर से सीधे बेलछी चली जाती हैं. जहां दलितों पर अत्याचार हुआ है. लोगों को कई दिनों से खाना नहीं मिला है. इंदिरा गांधी को सड़क मार्ग से जाने से मना कर दिया जाता है. इंदिरा गांधी हाथी पर सवार होकर दलितों से मिलने बेलछी पहुंचती हैं. जनता नारा लगाती है कि आधी रोटी खाएंगे -इंदिरा को वापस लाएंगे.

-1980 में चुनाव जीतने के बाद वो अपने बेटे संजय गांधी से मिलना बंद कर देती हैं.

इमरजेंसी का ठीकरा संजय गांधी पर फोड़ दिया

भारतीय जनता पार्टी जिस इमरजेंसी को काला अध्याय बताती रही है उसके पीछे असली वजह इंदिरा गांधी नहीं थीं, असली विलेन तो संजय गांधी थे. ऐसा इस फिल्म में दिखाया गया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि संजय गांधी ने उस दौर में काफी उदंडता की थी. पर इमरजेंसी के लिए संजय गांधी को विलेन की तरह खड़ा करना भी गलत है. फिल्म में इंदिरा गांधी को उस मानसिक रूप से बीमार दिखा दिया गया है. ऐसा दिखाया गया है कि वो नहीं चाहती थीं कि नेताओं की गिरफ्तारी हो या किसी तरह का अत्याचार हो . संजय गांधी कार से पुरानी दिल्ली में कहीं जा रहे हैं. रेडियो पर किशोर कुमार का गाना बज रहा है. संजय गांधी अपने पीए से कहते हैं कि ये कैसे हो रहा है. जो कलाकार हमारी सरकार की आलोचना करता है उसका गाना सरकारी रेडियो स्टेशन से कैसे बज रहा है. इसी तरह नसबंदी के समय हुए अत्याचारों के लिए संजय गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है. संजय गांधी के मना करने के बाद भी इंदिरा गांधी इमरजेंसी अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर न केवल वापस लेती हैं बल्कि देश में आम चुनावों की घोषणा भी करती हैं.

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कांग्रेस भी तारीफ करने से बच रही है 

कंगना रनौत के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्होंने पार्टी लाइन के हिसाब से फिल्म नहीं बनाई.और उससे भी बुरी बात यह है कि कांग्रेस भी इस मूवी की तारीफ नहीं कर रही है. कांग्रेस को लगता है कि इंदिरा के बचपन की बातें गलत तरीके से दिखाईं गईं हैं. फिल्म में इंदिरा गांधी को खुद अपने आपको इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा कहते हुए दिखाया गया है. कांग्रेस नेताओं को इस पर भी एतराज हो सकता है. कांग्रेस अभी धर्म संकट में है कि एक बीजेपी सांसद की बनाई हुई फिल्म की तारीफ वो कैसे करे? यह बीजेपी की रणनीति ही है कि इतना ब़ड़ा ब्लंडर करने के बाद भी कंगना की आलोचना पार्टी लेवल पर नहीं हो रही है. क्योंकि इससे कंगना को विपक्ष हाथों हाथ ले लेगा. कंगना जहां विक्टिम के रूप में नजर आईं विपक्ष के लिए यह फिल्म सोना बन जाएगी.

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