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कैलाश गहलोत का आम आदमी पार्टी छोड़ना अरविंद केजरीवाल के लिए कितना बड़ा मौका ?

अरविंद केजरीवाल अब दिल्ली की राजनीति में उस स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं जहां वो पार्टी में वन मैन शो की तरह काम करते हैं. किसी के भी पार्टी में आने और जाने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. क्या कैलाश गहलोत के साथ भी ऐसा ही है?

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इस साल रिपब्लिक डे पर झंडारोहण के बाद से ही कैलाश गहलोत के पार्टी छोड़ने की अटकलें लगनी शुरू हो गईं थीं.
इस साल रिपब्लिक डे पर झंडारोहण के बाद से ही कैलाश गहलोत के पार्टी छोड़ने की अटकलें लगनी शुरू हो गईं थीं.

दिल्ली सरकार में अहम मंत्रालयों को संभाल रहे आम आदमी पार्टी के नेता कैलाश गहलोत ने न केवल मंत्री पद छोड़ दिया है बल्कि उन्होंने पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया है. जाहिर है कैलाश के जाने के बाद अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर एक बार सवाल उठेगा. विपक्ष इसे आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा नुकसान बताएगा, पर क्या वास्तव में  केजरीवाल को परवाह है? एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक रिपोर्टर ने कैलाश गहलोत के इस्तीफे को लेकर केजरीवाल से सवाल कर दिया. पूर्व सीएम ने तुरंत अपने माइक को अपने पास में बैठे दुर्गेश पाठक की तरफ मोड़ दिया. फिर एक बार जब रिपोर्टर ने सवाल किया तो केजरीवाल ने कोई जवाब नहीं दिया. केजरीवाल का यह व्यवहार दिखाता है कि वे या तो बहुत पीड़ा में थे इसलिए गहलोत के बारे में बात भी नहीं करना चाहते थे. या फिर उन्हें गहलोत के जाने की कोई परवाह नहीं है. क्योंकि इसके पहले भी आम आदमी पार्टी से बहुत से ऐसे लोग गए जो अरविंद केजरीवाल के बहुत करीबी थे. राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल का उदाहरण सामने ही है. फिर भी अरविंद केजरीवाल को कोई फर्क नहीं पड़ता है.वो जानते हैं कि पार्टी में अब भी कई नाम हैं जो कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं. पर वे यह भी जानते हैं कि इन सब समस्याओं से कैसे निपटा जाता है. इसमें कोई 2 राय नहीं हो सकती कि केजरीवाल इस कठिन दौर को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लें जाएं. 

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1-केजरीवाल यह साबित करेंगे कि बीजेपी ईडी और सीबीआई का डर दिखाकर आप को खत्म करना चाहती है

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री कई साल से यह आरोप लगा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार मिलकर आम आदमी पार्टी को खत्म करना चाहते हैं. रविवार को एक पीसी में आम आदमी पार्टी नेता दुर्गेश पाठक ने फिर यही बात दुहराई. उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले कैलाश गहलोत पर ED और आयकर की रेड डाली गई. इससे ये साबित हो गया कि बीजेपी हार चुकी है, इसलिए बीजेपी ने ईडी और सीबीआई का सहारा लिया. यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल अब बीजेपी और मोदी सरकार पर और हमलावर होंगे. उनको अपनी बात साबित करने का बहाना मिल गया है. दरअसल कैलाश गहलोत को ईडी पूछताछ के लिए एक बार बुला चुकी है. जब दिल्ली सरकार की विवादित आबकारी नीति मामले में पॉलिसी बनाई जा रही थी उस समय दिल्ली सरकार ने एक समिति बनाई थी. उस कमेटी में तीन वरिष्ठ मंत्रियों को शामिल किया गया था, जिसमें एक मंत्री कैलाश गहलोत भी थे. शेष दो लोगों में दिल्ली के तत्कालीन पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और तत्कालीन स्वास्थ मंत्री सतेंद्र जैन भी थे. जांच एजेंसी इसी केस में मनीष सिसोदिया और जैन को पहले गिरफ्तार कर चुकी थी. उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. कैलाश गहलोत को ईडी ने इसी साल 30 मार्च को समन जारी करके पूछताछ के लिए बुलाया था.अब अगर कैलाश गहलोत बीजेपी में शामिल होते हैं तो यही कहा जाएगा कि बीजेपी की वॉशिंग मशीन में सभी भ्रष्टाचार के आरोप खत्म हो जाते हैं.

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2-अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी को वन मैन शो वाली पार्टी बना चुके हैं

अरविंद केजरीवाल ने जब आम आदमी पार्टी का गठन किया था तो देश के कई कद्दावर लोग उनके साथ थे. पर धीरे-धीरे सभी उनका साथ छोड़ते गए. दर्जनों बड़े किरदारों ने पार्टी को छोड़ा पर पार्टी की लोकप्रियता और वर्चस्व में कोई कमी नहीं आई. यहां तक कि अभी हाल ही में उनसे दूर हुईं स्वाति मालीवाल के जाने का भी कोई असर पार्टी पर नहीं है. हालांकि टेक्निकल रूप से वो अभी भी पार्टी में ही हैं. दरअसल देश की अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की तरह आम आदमी पार्टी भी अब वन मैन शो चलता है. यहां कार्यकर्ता और नेता केवल अरविंद केजरीवाल के नाम पर आते हैं और उन्हीं के चलते पार्टी छोड़कर जाते भी हैं. जब कोई पार्टी छोड़कर जाता है तो अरविंद केजरीवाल जनता के बीच में विक्टिम कार्ड खेलते हैं और अपनी लोकप्रियता बरकरार रखते हैं. पार्टी में किसी के भी आने और जाने से उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

3- पर शीशमहल और अन्य भ्रष्टाचार पर जनता को क्या यकीन आएगा?

पार्टी छोड़ते समय गहलोत ने  केंद्र के साथ आप की लगातार लड़ाई, जनता से किए गए वादों को पूरा करने पर कम ध्यान, राजनीतिक एजेंडा और मुख्यमंत्री आवास की मरम्मत को लेकर अजीब स्थिति को अपने इस्तीफे के कारण बताया. दरअसल मुख्यमंत्री आवास जिसे विपक्ष ने शीशमहल का नाम दिया है. दिल्ली में विपक्ष इस शीशमहल पर बेतहाशा खर्च के बहाने अरविंद केजरीवाल पर दिल्ली के खजाने को चपत लगाने का आरोप लगाता है.जाहिर है कि ये बातें जब सरकार में रहा कोई मंत्री बताएगा तो जनता पर सीधे असर पड़ेगा. पर कैलाश गहलोत ने सीधे-सीधे किसी भी भ्रष्टाचार की बात नहीं कही है. इसका लाभ अरविंद केजरीवाल को मिलेगा.दूसरी बात अरविंद केजरीवाल यह भी बताएंगे कि गहलोत काफी समय से नाराज और असंतुष्ट थे. खासकर जब उन्हें नजरअंदाज कर आतिशी को सीएम बनाया गया और उनके महत्वपूर्ण विभाग, जैसे कानून और राजस्व, आतिशी को दे दिए गए.

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4-इससे इनकार नहीं कर सकते कि एक महत्वपूर्ण सहयोगी खो दिया

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी से कैलाश गहलोत के जाने से सबसे बड़ा सेटबैक एक ऐसे आदमी के जाने का होगा जो एक अनुभवी प्रशासक था. दरअसल आम आदमी पार्टी में अब ऐसे लोगों की कमी हो गई है जो विश्वसनीय भी हों कार्यकुशल भी हों. आप के भीतर इस बात को लेकर चिंता है कि गहलोत के जाने से कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर असर पड़ेगा. वे महिला सम्मान राशि परियोजना की देखरेख कर रहे थे, जो इस साल के बजट की मुख्य घोषणा थी और आप के चुनाव प्रचार की एक महत्वपूर्ण योजना बनने वाली थी.

इस योजना के तहत, 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये दिए जाएंगे. इंडियन एक्सप्रेस अखबार लिखता है कि गहलोत इस योजना को तेज़ी से लागू करने के लिए अधिकारियों के साथ कई बैठकें कर रहे थे.इसके साथ ही गहलोत कई अहम योजनाओं, जैसे पिंक पास, मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना, इलेक्ट्रिक वाहन नीति, और बसों में महिला सुरक्षा के लिए बस मार्शल और हाई-टेक सुरक्षा प्रणाली की शुरुआत के पीछे भी थे.

5-जाटों के बीच में पार्टी कितनी कमजोर होगी

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कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश गहलोत के जाने के बाद आम आदमी पार्टी का जाट वोटर्स के बीच पकड़ कमजोर होगी. पर आम आदमी पार्टी का बेस किसी भी जाति से संबंधित नहीं है. देश में जितनी भी क्षेत्रिय पार्टियां हैं उनका आधार कोई न कोई जातिगत आधार रहा है. पर आम आदमी पार्टी से लोग एक नई व्यवस्था बनाने के नाम पर जुड़े. बाद में पार्टी का आधार फ्रीबीज बना. अब पीएम नरेंद्र मोदी का हार्डकोर विरोध इस पार्टी का बेस बन चुका है. किसी भी जाति या धर्म के नेता के आने जाने से पार्टी पर कोई प्रभाव शायद इसलिए ही नहीं पड़ता है.दूसरी बात जाट वोटर्स वैसे भी आजकल बीजेपी से नाराज चल रहा है.

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