हरियाणा कांग्रेस में कलह के दुष्परिणाम अब सामने आने शुरू हो गए हैं. हरियाणा में तमाम कांग्रेस नेताओं का आरोप रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा प्रदेश में कांग्रेस को प्राइवेट लिमिटेट कंपनी की तरह चला रहे हैं. लोकसभा चुनावों के दौरान प्रदेश में कांग्रेस नेताओं के बीच जिस तरह की गुटबंदी देखने को मिली, निश्चित ही वह पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुई है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व में हरियाणा कांग्रेस 5 सीटें जीतने में कामयाब हुई है पर यह भी सही है कि अगर टिकट बांटने में गुटबंदी को ताक पर रख दिया गया होता तो कांग्रेस कुछ और सीटें जीत सकती थी.
कम से कम महेंद्रगढ की सीट पर जीत तो निश्चित ही थी. यहां पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की बहू किरण चौधरी या उनकी बेटी श्रुति चौधरी टिकट के दावेदार थे. पर उन्हें किनारे लगाने का नतीजा ये रहा है कि पहले कांग्रेस ने यह सीट हारी दूसरे अब किरण चौधरी और श्रुति चौधरी ने पार्टी छोड़कर बीजेपी जॉइन कर ली है. किरण चौधरी अभी भिवानी के तोशाम से कांग्रेस विधायक हैं तो वहीं उनकी बेटी श्रुति भिवानी महेंद्रगढ़ सीट से सांसद रह चुकी हैं. हरियाणा में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं और महज चार महीने का वक्त बचा है. किरण चौधरी के बीजेपी में आने से करीब आधा दर्जन सीटों पर जाट वोट प्रभावित हो सकते हैं. कहा जा रहा है कांग्रेस में मची कलह के चलते अभी एक और जाट चेहरा पार्टी छोड़ कर बीजेपी में जा सकते हैं.
हरियाणा में गुटबंदी में बंटी कांग्रेस
हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय से गुटबाजी चल रही है. लोकसभा चुनावों से पहले कम से कम 4 गुट अस्तित्व में थे. इसमें भूपेंद्र सिंह हुड्डा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, कुमारी शैलजा और किरण चौधरी का गुट शामिल थे. पर लोकसभा चुनावों में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बढ़ती ताकत के चलते हुड्डा बनाम अन्य में सभी गुट बंट गए. एक तरफ भूपेंद्र सिंह हुड्डा दूसरी तरफ एसआरके (शैलजा, रणदीप और किरण चौधरी). दोनों गुटों ने चुनावों में एक दूसरे की कब्र खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. चूंकि टिकट बांटने में भूपेंद्र हुड्डा की ही चली इसलिए हर जिले में 'विपक्ष आपके द्वार' कार्यक्रम वे अकेले ही करते रहे. चुनाव के दौरान दीपेंद्र हुड्डा के नामांकन में एसआरके गुट का कोई नेता नहीं पहुंचा. तो इसी तरह एसआरके गुट के करीबियों के नामांकन में हुड्डा नहीं पहुंचे. दोनों गुटों की पीसी में भी एक दूसरे के समर्थक और नेता नहीं पहुंचते थे. फिर भी कांग्रेस राज्य की आधी लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब हुई .
कांग्रेस हाईकमान भी इन्वॉल्व
माना जाता है कि राज्य में कांग्रेस हाईकमान के लेवल पर भी लोग बंटे हुए हैं. राहुल गांधी का जिन नेताओं पर हाथ होता है उसे हुड्डा टार्गेट करते रहे हैं. अशोक तंवर का किस्सा मशहूर है राज्य में. यही कारण है हुड्डा को राहुल बिल्कुल पसंद नहीं करते. पर राज्य के लोग और कांग्रेसी मानते हैं कि हुड्डा पर राबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी का हाथ है. राजनीतिक विश्वेषक अजय दीप लाठर कहते हैं कि हरियाणा में लोग ऐसा ही समझते हैं. हमने लोकसभा चुनावों के दौरान देखा कि प्रियंका हो या राहुल रोड शो या रैली करने दोनों ही रोहतक नहीं पहुंचे. गौरतलब है कि रोहतक से भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र हुड्डा चुनाव लड़ रहे थे. प्रियंका गांधी ने सिरसा में सैलजा के लिए रोड शो किया पर दीपेंद्र के लिए टाइम नहीं निकाला. इसी तरह राहुल महेंद्रगढ़ और सोनीपत में गए पर दीपेंद्र के लिए समय नहीं निकाला. लाठर कहते हैं कि राहुल नाराज न हो जाएं शायद इसलिए प्रियंका रोहतक नहीं गईं होंगी.
जाट नेता के रूप में कितनी ताकतवर हैं किरण चौधरी?
भारतीय जनता पार्टी से जाटों की नराजगी खत्म होने का नाम ही ले रही है. शायद इस लिए ही बीजेपी की ओर से किरण चौधरी को लाया गया है. पर सवाल उठता है कि क्या किरण चौधरी इस हैसियत में हैं कि वो जाटों को बीजेपी के नजदीक ला सकेंगी? वैसे जिस तरह महेंद्रगढ़ संसदीय सीट पर कांग्रेस की हार हुई है उसका मतलब साफ है कि किरण चौधरी का महेंद्रगढ़ के जाट वोटों पर प्रभाव है. हरियाणा की राजनीति के एक्सपर्ट अजयदीप लाठर कहते हैं कि महेंद्रगढ़ संसदीय सीट के आसपास की करीब 8 से 10 सीटें जैसे भिवाड़ी, तोषाम, लोहारू, दादरी आदि पर बंसीलाल परिवार का अच्छा प्रभाव है. निश्चित ही इन सीटों पर बीजेपी को किरण चौधरी के साथ आने का फायदा मिलेगा. लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि किरण चौधरी को बीजेपी में कितनी तवज्जो मिलती है.
बीजेपी से जाटों की नाराजगी
हरियाणा में 25 प्रतिशत जाट मतदाताओं के बावजूद बीजेपी उनकी उपेक्षा करती रही है. हरियाणा में लगातार करीब 10 वर्षों से गैर जाट सीएम है. यही नहीं नवनियुक्त मंत्रिमंडल में भी हरियाणा से जिन तीन लोगों को मंत्री बनाया गया है उनमें एक भी जाट नहीं है. मनोहरलाल खट्टर (पंजाबी), कृष्णपाल सिंह (गुर्जर), राव इंद्रजीत (अहीर) ये सभी गैरजाट हैं. इस बीच महिला पहलवानों के आंदोलन, किसान आंदोलन ने लगातार बीजेपी नेताओं को जाट समुदाय से दूर किया है. इसी का नतीजा रहा कि लोकसभा चुनावों के दौरान कई ऐसी खबरें आईं कि बीजेपी नेताओं को जाट बहुल गांवों में घुसने नहीं दिया गया. जाहिर है कि बीजेपी को अगर हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतना है तो नाराज जाटों को मनाना होगा. ऐसे समय में यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि लोकसभा चुनाव जीते दीपेंद्र हुड्डा राज्यसभा से रिजाइन करेंगे, और फिर उपचुनाव में उम्मीदवार बनाकर बीजेपी किरण चौधरी को राज्यसभा भेज सकती है. ऐसा होता है तो जरूर कुछ खास क्षेत्रों में बीजेपी जाट वोटों में सेंध लगाने में कामयाब हो सकती है.