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अब सबसे बड़ा सवाल- MP में शिवराज सिंह चौहान नहीं तो कौन होगा मुख्यमंत्री?

Madhya Pradesh Election result 2023 live update: कर्नाटक में बसवराज बोमई को फेस बनाकर हाथ जला बैठी बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश में सीएम फेस इसलिए नहीं बनाया था ताकि एंटी इंकंबैंसी को खत्म किया जा सका. पर यहां तो उल्टा हो गया . प्रदेश की जनता उन्हें भरपूर प्यार दिया है.

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क्या शिवराज पांचवी बार बनेंगे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री
क्या शिवराज पांचवी बार बनेंगे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री

मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी बड़ी विजय की ओर बढ़ रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कौन बनेगा. यह सवाल जटिल इसलिए हो गया है क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने इन चुनावों में जिस तरह मेहनत की है और जिस तरह उनकी महिला कल्याण वाली नीतियों की पॉपुलरिटी देखने को मिली है उससे किस तरह पार्टी उन्हें किनारे लगाएगी?  कर्नाटक में बसवराज बोमई को फेस बनाकर हाथ जला बैठी बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश में सीएम फेस इसलिए नहीं बनाया था ताकि एंटी इंकंबैंसी को खत्म किया जा सके. पर यहां तो उल्टा हो गया . जनता विशेषकर महिलाएं शिवराज चौहान की योजनाओं से इतनी प्रभावित थीं कि बीजेपी को भर-भरकर वोट दिया है.
 पर पार्टी ने जिसे सीएम फेस नहीं बनाया था, क्या पांचवी बार सीएम के लिए शिवराज सिंह का नाम प्रस्तावित करेगी ? तो फिर शिवराज नहीं तो और कौन है दावेदार? शिवराज सीएम नहीं बनते हैं तो सबसे ऊपर किसका नाम चल रहा हैं.  शिवराज अगर सीएम नहीं बनते हैं तो पार्टी ज्योतिरादित्य सिंधिया,नरेंद्र सिंह ,कैलाश विजयवर्गीय, वीडी शर्मा आदि का नाम लिया जा रहा है.आइये देखते हैं सबसे अधिक संभावना किसके मुख्यमंत्री बनने की हो सकती है. पर बीजेपी में हाल के दिनों में ऐसी परिपाटी बनी है कि ऐन मौके पर पार्टी सरप्राइज देती रही है. फिर भी आईए देखते हैं कुछ नामों को उनके प्लस और माइनस पॉइंट्स के साथ.

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अव्‍वल तो नतीजों ने शिवराज को सॉलिड बना दिया...

सीएम शिवराज सिंह चौहान की प्रदेश में लोकप्रियता को देखते हुए लगता तो नहीं है कि उन्हें पार्टी सीएम पद से महरूम रखेगी. पर अगर केंद्रीय नेतृत्व से उनके संबंध, उनका पांचवा टर्म उनके लिए मुसीबत बन सकता है. एक बात और है जैसा कि पत्रकार दिनेश गुप्ता कहते हैं कि हो सकता है पार्टी 2024 लोकसभा चुनावों तक शिवराज सिंह चौहान को सीएम बनाए रखे. उसके बाद शिवराज को केंद्र की राजनीति में भविष्य के लिए तैयार किया जा सकता है. शिवराज की उम्र अभी अपने समकक्ष नेताओं के मुकाबले कम होने से इसका फायदा उन्हें मिल सकता है. गुप्ता कहते हैं कि आरएसएस हमेशा से 20 साल आगे की सोचकर फैसले लिया करती है. इसलिए हो सकता है कि मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही हो.

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लेकिन, यदि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्‍व बदलाव के बारे में सोचेगा तो कई नाम आगे हैं...

1- ज्योतिरादित्य सिंधिया

जिस तरह आज सुबह-सुबह ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद चलकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास मिलने पहुंचे हैं उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी पार्टी में सीएम पद के लिए चल रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिंधिया की बहुत पहले से तमन्ना है कि वो प्रदेश के सीएम बनें. कांग्रेस को छोड़ने का कारण भी यही रहा कि उन्हें सीएम  नहीं बनाया गया. सिंधिया जब से बीजेपी में आएं हैं तबसे लगातार बहुत मेहनत कर रहे हैं. मध्यप्रदेश की राजनीति पर अरसे से लिख रहे वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता कहते हैं कि ग्वालियर रीजन में बीजेपी को बड़े पैमाने पर इस बार बढ़त मिल रही है. 2018 के चुनावों में बीजेपी के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण यही क्षेत्र था. पर सिंधिया के नाम के साथ 3 माइनस पॉइंट्स है 1- उनका पुराना कांग्रेसी होना 2- उनका सवर्ण होना 3-उनके नाम पर प्रदेश में गुटबाजी का बढ़ना

2- कैलाश विजयवर्गीय

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के माहौल के बीच भाजपा के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय भी सीएम पद के उम्मीदवारी के चलते सुर्खियों में हैं. इंदौर-1 सीट से टिकट मिलने के बाद से विजयवर्गीय लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं जैसे ये लगता है कि बस उन्हें ही सीएम बनना है. विजयवर्गीय ने एक बार इंदौर में कहा कि मैं भोपाल में बैठकर इशारा करूंगा उससे ही आपका काम हो जाएगा. इससे पहले भी उन्होंने एक बार कहा कि मैं सिर्फ विधायक बनने नहीं आया हूं. पार्टी की ओर से मुझे कुछ और बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी तो काम भी बड़ा करूंगा. पर स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि पार्टी में उन्हें सीएम मटिरीयल कभी नहीं समझा. हालांकि राजनीति संभावनाओं का खेल है और कभी भी कुछ भी हो सकता है. इसलिए इंतजार करना ही बेहतर है.

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3- नरेंद्र सिंह तोमर

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का नाम भी सीएम पद के दावेदारों में लिया जा रहा है. तोमर को एमपी में चुनाव प्रबंधन समिति के संयोजक बनाए जाने के बाद से ही इनके नाम की चर्चा थी. केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद उन्हें चुनाव लड़ने के लिए केंद्र ने भेजा तब तो ऐसा लगा जैसे उनके नाम पर मुहर ही लग गया हो. हालांकि तोमर इससे इनकार करते रहे हैं. पर इनकार तो सिंधिया भी कर रहे हैं. मुरैना में एक बार प्रेस से तोमर ने कहा कि भाजपा सामूहिक नेतृत्व वाला दल है. सबने मिलकर चुनाव लड़ा है. परिणाम आने के बाद मुख्यमंत्री चयन की तय प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा. हालांकि जिस तरह उनके बेटे का वसूली वाला विडियो वायरल हुआ है उनकी छवि कमजोर हुई है. पर हाईकमान की वो हमेशा से पसंद रहे हैं इसलिए उनकी चर्चा से इनकार नहीं किया जा सकता. 

4- वीडी शर्मा 

प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. वो एमपी की राजनीति में छुपा रुस्तम साबित हो सकते हैं. हालांकि उन्हें विधानसभा चुनाव नहीं लड़ाया गया है. पर चुनाव प्रचार के दौरान कई ऐसे संकेत मिले हैं, जिसकी वजह से उनके नाम की चर्चा होती है. प्रचार के दौरान वीडी शर्मा के साथ पीएम मोदी की कानाफूसी से एमपी की राजनीति के कई महारथियों के कान खड़े हो गए हैं. इंदौर में रोड शो के दौरान पीएम के साथ सिर्फ वीडी शर्मा को देखकर उनके सीएम बनने की कयासबाजी लगाई जा रही है.पर 2024 की रणनीति में उनका ब्राह्णण होना उनका सबसे बड़ा ड्रॉबैक हो जा रहा है. पिछड़ों की राजनीति का कार्ड जिस तरह कांग्रेस खेल रही है उसके लिए बीजेपी किसी सवर्ण को सीएम बनाएगी ऐसा लगता तो नहीं है. पत्रकार दिनेश गुप्ता का कहना है कि शर्मा की उम्र , शिवराज  की शैली और नड्डा की नजदीकी उनके नाम को वजनदार बनाती है.

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5- कुलस्ते, प्रह्लाद पटेल के  नाम भी

मध्य प्रदेश में बीजेपी ने इस बार केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल को मैदान में उतारा है.अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी की सरकार तक में वह मंत्री रहे हैं. शिवराज सिंह चौहान के बाद प्रदेश में वह सबसे बड़े ओबीसी नेता हैं. यह उनके लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है. इसी तरह आदिवासी वोटरों को साधने के लिए भी बीजेपी एमपी में नया दांव खेल सकती है. मध्य प्रदेश में 47 विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व है. केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को सीएम बनाकर छत्तीसगढ़ और झारखंड और आसपास कई राज्यों के आदिवासी वोटों पर बढ़त ले सकती है.इसी तरह प्रदेश की गृहमंत्री नरोत्तम मिस्रा के कट्टर हिंदुत्व वाले तेवरों के चलते उनका नाम भी आगे बढ़ सकता है.

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