देश के मौजूदा समीकरणों के बीच देखें तो वक्फ संशोधन बिल भी जम्मू कश्मीर के धारा 370 जैसा ही है. फिर तो आने वाले चुनावों पर असर भी करीब करीब वैसा ही होना चाहिये.
फिर भी, केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी और INDIA ब्लॉक के भीतर और बाहर वाले विपक्षी दल, वक्फ बिल को भी उसी तरह ले रहे हैं, जैसे अयोध्या आंदोलन को.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव, दोनो में से कोई भी वक्फ बिल को धारा 370 के मुद्दे की तरह नहीं ले रहा है. कांग्रेस नेतृत्व तो जैसे बगलें झांक रहा है, समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी वक्फ बिल पर फोकस रहने के बजाय नोटबंदी से लेकर कुंभ तक डूबकी लगाते नजर आते हैं.
पूरे देश में न सही, लेकिन आने वाले बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव में तो वक्फ बिल का साफ असर देखने को मिल सकता है - चुनाव की तारीख आते आते तो वक्फ बिल बतौर कानून लागू हो चुका होगा, ऐसा मानकर चलना चाहिये.
वक्फ कानून का 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में असर तो दिखेगा, और ऐसा ही 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में भी होगा. बशर्ते, चुनावों तक ये मुद्दा यूं ही बना रहे, क्योंकि कोई और मसला आया और छा गया, तो कुछ खास नहीं होने वाला है.
वक्फ कानून के कारण आने वाले चुनावों में ध्रुवीकरण तो बढ़ेगा, लेकिन बीजेपी को फायदा मिलेगा या नहीं, अभी देखना होगा - लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राम मंदिर उद्घाटन मिसाल है.
बिहार के बाद बंगाल के साथ साथ केरल, असम और तमिलनाडु में भी विधानभा के चुनाव होंगे - और उसके बाद 2027 में यूपी, उत्तराखंड और फिर गुजरात, हिमाचल में विधानसभा चुनाव होने हैं - लेकिन, तब तक मालूम नहीं चुनावी दरिया में कितना पानी बह चुका होगा.
मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जे की लड़ाई
वक्फ कानून का पहला चुनावी परीक्षण तो बिहार में ही होना है. बिहार में चुनावी मुकाबला, एनडीए बनाम महागठबंधन या इंडिया ब्लॉक होना है. और, अलग अलग छोर से प्रशांत किशोर की जनसुराज जैसी पार्टियां भी कुलांचे भर रही हैं.
बिहार में अच्छी खासी मुस्लिम आबादी है, 18 फीसदी. और, सीमांचल इलाके में तो हार जीत का फैसला भी करती है.
मुस्लिम वोटों का बंटवारा बिहार में बीजेपी छोड़कर सभी दलों के बीच होता रहा है, जनसुराज पार्टी इस बार नई खिलाड़ी होगी. पहले के चुनावों में लालू यादव की आरजेडी और कांग्रेस के अलावा नीतीश कुमार भी एक दावेदार हुआ करते थे, लेकिन बीजेपी के साथ हो जाने और वक्फ बिल का सपोर्ट कर देने के बाद नीतीश कुमार से मुस्लिम पक्ष का मोहभंग हो गया है. नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का मुस्लिम संगठनों की तरफ से बहिष्कार उदाहरण है.
लेकिन, जेडीयू की तरफ से वक्फ बिल में बीजेपी पर दबाव डालकर मुस्लिम समुदाय के हित में बदलाव के जो दावे किये जा रहे हैं, उसका भी कुछ न कुछ असर देखने को मिल सकता है. अगर नीतीश कुमार और उनके साथी अपनी बात समझाने में कामयाब हुए, तो फर्क तो पड़ेगा ही. ज्यादा फर्क न सही, लेकिन पूरी तरह खिलाफ जाती हुई चीजों को न्यूट्रलाइज तो किया ही जा सकता है.
बिहार के बाद होने जा रहे पश्चिम बंगाल चुनाव की बात करें, तो कहीं ज्यादा असर देखने को मिल सकता है.
ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने वक्फ बिल पर भी वैसा ही स्टैंड लिया है, जैसा राम मंदिर उद्घाटन समारोह और महाकुंभ पर लिया था. ममता बनर्जी ने एक पॉलिटिकल लाइन तय कर रखी है - और उसी पर चल रही हैं. सीधा, स्पष्ट और सटीक.
आने वाले चुनावों के लिए बीजेपी और टीएमसी आमने सामने एक दूसरे को चैलेंज कर रहे हैं, और रामनवमी पर ही टकराव की मजबूत झलक देखने को मिलने वाली है.
बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद
अयोध्या आंदोलन ने भले ही बीजेपी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाया हो, लेकिन राम मंदिर उद्घाटन समारोह का फायदा तो बिल्कुल नहीं ही मिला. लोकसभा चुनाव के नतीजे तो यही बताते हैं, खास तौर पर अयोध्या का रिजल्ट. न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू चला, न जय श्रीराम का स्लोगन.
जब अयोध्या पर फैसला आया था, तब झारखंड में 2019 के विधानसभा चुनाव हो रहे थे, और उसके बाद 2020 के दिल्ली चुनाव में भी कोई फायदा नहीं मिला.
1. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM या प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के वोट काटने की वजह से बीजेपी को चाहे जितना फायदा मिले, लेकिन ये तो है ही कि हिंदू वोटर तो एकजुट हो ही सकता है.
2. पश्चिम बंगाल में तो बीजेपी के लिए आर पार की ही लड़ाई रहेगी, लेकिन बिहार में तस्वीर काफी अलग देखने को मिल सकती है.
3. तीन तलाक की तरह बीजेपी अपनी तरफ से समझाने की कोशिश कर रही है कि वक्फ बिल से पारदर्शिता आएगी, और गरीब मुसलमानों को फायदा होगा. ऐसा करने से मुस्लिम वोटर बंटे न बंटे, हिंदू वोटर तो एकजुट होता लग ही रहा है.
ध्यान देने वाली बात ये है कि जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) जैसे बीजेपी के सहयोगी चुनावों में कैसा प्रदर्शन करते हैं.