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बीजेपी के खिलाफ INDI गठबंधन एक उम्मीदवार तय कर ले तो भी 'खेला' हो जाएगा

भारत की चुनावी राजनीति में अगला पड़ाव 2024 का लोक सभा चुनाव है, जिसमें बीजेपी को INDI गठबंधन चैलेंज करने जा रहा है. तीन राज्यों में चुनावी जीत के जोश से लबालब बीजेपी मोदी की लोकप्रियता को भुनाने निकल पड़ी है, जबकि विपक्षी गठबंधन की गाड़ी सीटों के बंटवारे पर रुकी हुई है.

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2024 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष के पास एक ही ब्रह्मास्त्र है, बशर्ते वो चलाने पर सहमति बन जाये
2024 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष के पास एक ही ब्रह्मास्त्र है, बशर्ते वो चलाने पर सहमति बन जाये

लोक सभा चुनाव 2024 से पहले बीजेपी का जोश हाई है. हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की हार के बाद झटका जरूर लगा था, लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने के बाद हार का हिसाब बराबर हो गया है. बल्कि, बीजेपी चार कदम आगे ही बढ़ गयी है. 

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निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश की जीत में शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना का महत्वपूर्ण योगदान रहा, लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे तो मोदी लहर की ही देन माने जाएंगे. 

एग्जिट पोल के नतीजे आये तो चर्चा यहां तक होने लगी थी कि मोदी मैजिक हर जगह काम नहीं कर सकता, 2024 के लोक सभा चुनाव में भले ही मोदी लहर फिर से देखने को मिले, लेकिन विधानसभा चुनावों में तो ये बेअसर होने लगा है - लेकिन असली नतीजों ने ऐसी सारी चर्चाओं का मुंह बंद करा दिया. 

चुनाव नतीजों वाले दिन मोदी की लोकप्रियता का जो नमूना समझ में आया, उसके कुछ ही दिन बाद एक सर्वे से मालूम हुआ कि सिर्फ भारत ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया भर के नेताओं के लोकप्रियता चार्ट में भी सबसे आगे हैं. 

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आने वाली चुनावी तैयारियों की बात करें तो केंद्र की सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी मोदी की लोकप्रियता को भुनाने अभी से निकल पड़ी है. दूसरी तरफ, विपक्षी INDI गठबंधन में सीटों को बंटवारे पर गतिरोध बना हुआ है. मान कर चलना होगा, बीजेपी मौजूदा हालात का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगी. 

चुनाव विश्लेषकों की माने तो विपक्षी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी दो ही समस्याएं हैं - एक, सीटों का आपस में बंटवारा और दूसरा, एक दूसरे के वोटों का ट्रांसफर. अगर ऐसी समस्याओं का जल्दी हल नहीं खोजा गया, तो बीजेपी बड़े आराम से बिखरे विपक्ष का फायदा उठा लेगी. 

एजेंडा आज तक में हिस्सा लेने वाले देश के जाने माने चुनाव विश्लेषकों का कहना है, बीजेपी के खिलाफ विपक्ष तभी टिक सकता है, जब सारे दलों में बीजेपी के मुकाबले में हर सीट पर अपना एक उम्मीदवार देने पर आम सहमति बना सके, वरना ममता बनर्जी के शब्दों में 'खेला' होते देर नहीं लगेगी.

विपक्ष के एक उम्मीदवार से बीजेपी को मुश्किल हो सकती है

एजेंडा आजतक 2023 के 'कौन जीतेगा 2024?' सेशन में हिस्सा ले रहे ज्यादातर चुनाव विश्लेषकों की राय यही रही कि हाल फिलहाल बीजेपी के सामने खुला मैदान ही नजर आ रहा है. लेकिन विपक्ष किन तैयारियों के साथ 2024 के लोक सभा चुनाव में उतर रहा है, वो देखना भी जरूरी होगा. 

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एक्सिस माई इंडिया के चेयरमैन और डायरेक्टर प्रदीप गुप्ता का कहना है कि बिहार, झारखंड, तमिलनाडु, पुद्दुचेरी, महाराष्ट्र, कर्नाटक और लद्दाख की 168 सीटों पर विपक्ष चाहे तो एक सीट पर INDI गठबंधन की तरफ से एक ही उम्मीदवार खड़ा करने पर सहमति बन सकती है - और ऐसा हुआ तो ये स्थिति बीजेपी के लिए काफी मुश्किल भी हो सकती है. 

19 दिसंबर की प्रस्तावित विपक्षी गठबंधन की मीटिंग को लेकर आम आदमी पार्टी नेता राघव चड्ढा भी एक उम्मीदवार को लेकर चुनाव विश्लेषकों की राय से पूरी तरह इत्तेफाक जता रहे हैं. एजेंडा आज तक के ही एक अलग सेशन में राघव चड्ढा कहते हैं, 'मेरा मानना है कि विपक्षी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ एक सीट पर एक उम्मीदवार उतारें तो तस्वीर अलग हो सकती है.' 

चुनाव नतीजों के इतिहास की तरफ ध्यान दिलाते हुए राघव चड्ढा का कहना रहा, गठबंधन को लेकर कहा कि पहले भी लेफ्ट और जनसंघ जैसी पार्टियां एक छतरी के नीचे आई हैं, और उस वक्त की एक शक्तिशाली सरकार को हराया जा चुका है. 

2019 के आम चुनाव से पहले भी ऐसी कोशिशें हुई थीं. और ऐसी सलाह भी बीजेपी के ही हाशिये पर भेज दिये गये नेताओं की तरफ से आए थे, लेकिन विपक्ष के कई सीनियर नेताओं के गंभीर प्रयासों के बावजूद कांग्रेस गठबंधन के लिए ही तैयार नहीं हुई, सीट शेयरिंग की तो बात ही दीगर है.  

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सीटों के बंटवारे में सबसे बड़ी बाधा कांग्रेस है

NITTE एजुकेशन ट्रस्ट के अकादमिक निदेशक संदीप शास्त्री के मुताबिक, इंडिया गठबंधन की मुख्य रूप से दो ही समस्याएं हैं - एक है विपक्षी दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति और दूसरी, एक दूसरे बीच वोटों का ट्रांसफर.

वोट ट्रांसफर का मामला तो काफी मुश्किल है, लेकिन सीटों के बंटवारे को तो सुलझाया ही जा सकता है. 2019 के आम चुनाव में जब अखिलेश यादव और मायावती एक दूसरे को वोट ट्रांसफर के मुद्दे पर संतुष्ट नहीं कर सके, तो पांच साल बाद पूरे देश में ये संभव हो पाएगा, कहना मुश्किल है.

प्रदीप गुप्ता सीटों के बंटवारे को लेकर इन तीन स्थितियों की तरफ ध्यान दिला रहे हैं - 

1. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट रोड़े अटका सकती है, और वैसे ही पंजाब, दिल्ली और गुजरात में आम आदमी पार्टी दावा कर सकती है. इन राज्यों की 88 सीटों पर क्या एक उम्मीदवार पर सहमति बन सकेगी? सवाल ये भी है कि क्या कांग्रेस ये सब आसानी से सुलझा पाएगी. 

2. ऐसे ही उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा की 153 सीटों पर बंटवारा संभव नहीं लग रहा है. इन पांचों राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच सीधा टकराव है. राहुल गांधी की मानें तो विचारधारा का ही टकराव है. कांग्रेस नेता ये टकराव बताते तो बीजेपी के खिलाफ हैं, लेकिन टकराव क्षेत्रीय दलों के साथ भी है.

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3. प्रदीप गुप्ता के अनुसार, देश में 134 सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस और बीजेपी का सीधा मुकाबला है. इनमें नॉर्थ ईस्ट और असम की करीब 25 सीटों पर कुछ कह पाना संभव नहीं है. 


संदीप शास्त्री का कहना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्य ही सीटों का फैसला करेंगे. मतलब, इन राज्यों में भी तय होगा कि किसके खाते में कितनी सीटें आती हैं.

2024 के संभावित चुनावी मुद्दे

बीजेपी नेता अमित शाह तो विधानसभा चुनावों में ही तीन बार दिवाली मनाये जाने के बहाने राम मंदिर को बड़े चुनावी मुद्दे के तौर पर पेश कर चुके हैं. दूसरी तरफ, राहुल गांधी और विपक्ष के तमाम नेताओं की कोशिश 90 के दशक की तरह चुनावी मुद्दा मंडल बनाम कमंडल बनाने का है.

संदीप शास्त्री कहते हैं, विधानसभा और लोकसभा चुनाव में लोग साफ तौर पर फर्क करते हैं. दोनों ही चुनावों में अलग अलग मुद्दे होते हैं - और इसके आधार पर ये भी कहा जा सकता है कि हाल के विधानसभा चुनाव के नतीजे लोक सभा का रिजल्ट नहीं तय करने जा रहे हैं. वैसे भी 2018 के विधानसभा चुनाव और उन्हीं राज्यों में 2019 के लोक सभा चुनाव के नतीजों का फर्क देखा ही जा चुका है.

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संदीप शास्त्री एक और महत्वपूर्ण बात कहते हैं, 2024 के लोक सभा चुनाव में लोग चार M यानी 'म' के बारे में चर्चा जरूर करेंगे - मोदी, महिला, मजबूरी और मंदिर. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में महिलाओं के सपोर्ट का परिणाम सब लोग देख ही चुके हैं. 

मोदी की लोकप्रियता से बीजेपी का जोश हाई है

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ सबसे ऊंचा चल रहा है, और ये 2014 से लगातार बरकरार है. सर्वे एजेंसी मॉर्निंग कंसल्ट के अनुसार, मोदी दुनिया भर के नेताओं में सबसे लोकप्रिय बने हुए हैं. 

सर्वे के मुताबिक, 76 फीसदी अप्रूवल रेटिंग के साथ नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं. खास बात ये है कि दुनिया का जो नेता दूसरे पायदान पर है, वो मोदी से 10 अंक पीछे है. मैक्सिको के राष्ट्रपति ओब्राडोर 66 फीसदी रेटिंग के साथ सूची में दूसरे स्थान पर हैं. 

यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की अप्रूवल रेटिंग मोदी के मुकाबले आधे से भी कम है. जो बाइडेन की अप्रूवल रेटिंग 37 फीसदी बतायी गयी है. पॉलिटिकल रिसर्च एजेंसी ने दुनिया के 22 नेताओं को लेकर ये सर्वे किया है. इस सर्वे का डाटा 29 नवंबर से 5 दिसंबर 2023 के बीच लिया गया है. ध्यान रहे 3 दिसंबर, 2023 को चार राज्यों के चुनावों के नतीजे आये थे. 

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